भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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भूमिका १३

अ० प्रथम शती का मध्य हो सकता है। इस काल की पुष्टि अन्तःसाक्ष्य और बाह्य साक्ष्य दोनों से होती है। इस वक्तव्य में M.R. काले के विचार ध्यान देने योग्य हैं —

(१) इस नाटक के कथानक के अनुसार उस समय बौद्ध धर्म उन्नत अवस्था में था। जनता में बौद्ध भिक्षुओं का सम्मान था। भिक्षु भी अपने धर्म का पालन सावधानी से करते थे। ईसा की पहली शती से ही बौद्धधर्म ह्रासोन्मुख हो चला था। अतः इसकी रचना इस काल के पहले की होनी चाहिये, जैसा कि भण्डारकर ने बताया है कि आन्ध्रवंशीय राजाओं के समय बौद्ध धर्म उन्नत अवस्था में था।$^१$

(२) नवम अंक में अधिकरणिक ने 'अङ्गारकविरुद्धस्य' [ ९।३३ ] इस श्लोक में मंगल को वृहस्पति का शत्रु ग्रह बताया गया है। यह मान्यता वराहमिहिर से पहले की थी। वराहमिहिर का काल ई० ५०० के लगभग माना जाता है। अतः इससे काफी पहले ही इस मृच्छकटिक की रचना हो जानी चाहिये।

(३) "वैशिकी कला"$^२$ का उल्लेख तथा किसी वेश्या के नायिका बनने की कल्पना वात्स्यायन के कामसूत्र की रचना के समकालीन या उसके बाद होनी चाहिये। कामसूत्र की रचना ई० १०० के अनन्तर नहीं मानी जा सकती। अतः मृच्छकटिक भी इसी के समीप का होना चाहिये।

(४) नाट्यकला के ऐसे अनेक नियम बाद में प्रचलित हुये जिनसे मृच्छकटिक का कर्ता परिचित नहीं प्रतीत होता है। उदाहरणार्थ—किसी पात्र के विशेष प्राकृत बोलने का नियम, रसों की प्रधानता का नियम आदि। इसके अतिरिक्त मृच्छकटिक में भास के समान सादगी और सरलता है। इसकी शैली कालिदास के समान न तो परिष्कृत है और न भवभूति के समान कलापूर्ण। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि मृच्छकटिक की रचना संस्कृत नाटकों के आरम्भिक काल की है।

(५) मृच्छकटिक की प्राकृत भाषायें व्याकरण के नियमों के सर्वथा अनुकूल नहीं प्रतीत होती हैं। वे प्राकृत भाषा के प्रारम्भिक विकास को सूचित करती हैं। इससे कालिदास की अपेक्षा शूद्रक की प्राचीनता सिद्ध होती है।

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि शूद्रक कालिदास से प्राचीन हैं। क्योंकि रामिल तथा सोमिल ने 'शूद्रककथा' लिखी थी और कालिदास ने सोमिल का उल्लेख किया है। यहाँ शंका हो सकती है कि कालिदास


१. मृच्छकटिक भूमिका M.R. काले पृ० ३२ में। २. मृच्छकटिक १।४।