मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ मृच्छकटिक
ने शूद्रक का उल्लेख क्यों नहीं किया ? उत्तर है कि उस समय तक शायद शूद्रक की उतनी अधिक प्रसिद्धि नहीं हो पायी होगी।
(ख) ३०० ई० से लेकर ७०० ई० के मध्य :
कुछ विद्वान उपर्युक्त प्राचीनता नहीं मानते हैं। उनका तर्क यह है कि भास के 'चारुदत्त' नाटक की खोज के बाद यह सिद्ध हो गया है कि 'मृच्छकटिक' की रचना 'चारुदत्त' के आधार पर हुई है। अतः मृच्छकटिक के कर्ता शूद्रक की सीमा भास का समय हो सकती है और भास का समय अभी तक अनिर्णीत है। उनका समय ई० पू० ३०० से लेकर ई० अ० ६०० के मध्य माना जा सकता है। मृच्छकटिक के नवमं अंक में अधिकरणिक ने चारुदत्त को दण्ड देने के लिये मनु का यह आदेश उद्धृत किया है।
“अयं हि पातकी विप्रो न वध्यो मनुरब्रवीत् । राष्ट्रादस्मात्तु निर्वास्यो विभवैरक्षतः सह ॥”१
मनु का काल ई० पू० २०० है। अतः मृच्छकटिक की पूर्व सीमा ई० पू २०० के लगभग हो सकती है।२
डा० कीथ का मत है कि यह सन्देहास्पद है कि मृच्छकटिक कालिदास से प्राचीन है या अर्वाचीन। जैकोबी का मत है कि मृच्छकटिक कालिदास से अर्वाचीन है। कुछ समालोचकों का यह मत है कि कालिदास के नाटकों पर मृच्छकटिक का कोई प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं होता है, अतः कालिदास मृच्छकटिक की अपर सीमा नहीं हो सकते।
इनकी अपर सीमा क्या है ? वामन ने अपनी काव्यालंकार-सूत्र-वृत्ति में शूद्रक का कवि के रूप में उल्लेख किया है और मृच्छकटिक के कई पद्य भी उद्धृत किये हैं। अतः मृच्छकटिक की अपर सीमा वही है। दण्डी के काव्यादर्श में “लिम्पतीव” (१.३४) यह पद्य मिलता है। अतः ई० ७०० अपर सीमा है, ऐसा भी कुछ लोग मानते हैं। डा० देवस्थली के अनुसार पंचतन्त्र के दो पद्य मृच्छकटिक में हैं और पंचतन्त्र का समय ई० अ० ५०० है। अतः यह अपर सीमा हो सकती है। किन्तु इसका खण्डन कुछ विद्वानों ने किया है। उनके अनुसार पंचतन्त्र का काल अभी तक अनिर्णीत है।३ अतः दण्डी ही इसके अपर सीमा हो सकते हैं।
१. मृच्छकटिक ९।३९ । २. मृच्छकटिक-भूमिका श्री कान्तानाथ शास्त्री तैलंग पृ० १७ । ३. मृच्छकटिक-भूमिका श्री कान्तानाथ शास्त्री तैलंग पृ० १६ ।