भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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भूमिका १५

मृच्छकटिक के अन्तःसाक्ष्य भी इसी की पुष्टि करते हैं। गुप्त-साम्राज्य के बाद हर्षवर्धन ही एक सार्वभौम सम्राट् हुये। उनके बाद की पतन-अवस्था का चित्रण इसमें सम्भव है। अतः इसका समय पांचवीं या छठी शती हो सकता है।

ऊपर यह स्पष्ट किया गया है कि मृच्छकटिक के कर्ता की पूर्व सीमा ई० पू० ३०० है और अपर सीमा ई० अ० ३०० से लेकर ७०० तक है। यह कष्ट का विषय है कि अभी तक एक सर्वसम्मत काल का निर्णय नहीं हो सका है।

शूद्रक का परिचय :

ऊपर यह दिखाया जा चुका है कि संस्कृत-साहित्य में कई शूद्रक हैं। उनमें से मृच्छकटिक का रचयिता कोई ‘शूद्रक नृप’ है यही जानकारी प्रस्तावना से होती है। वह बड़ा विद्वान और शक्तिशाली योद्धा था। उसने एक सौ वर्ष और दश दिन की आयु व्यतीत की। अपने पुत्र का राज्याभिषेक करके अग्नि में प्रवेश किया।¹ इस उल्लेख के विषय में पैदा होने वाली शंकाओं का संकेत पहले किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त कोई जानकारी नहीं प्राप्त होती है।

शूद्रक का निवास स्थान :

मृच्छकटिक का कर्ता दाक्षिणात्य था। कुछ के अनुसार महाराष्ट्रीय था। कुछ लोग उज्जैन का मानते हैं। इस विषय में पहले लिखा जा चुका है।

शूद्रक की रचनायें :

दण्डी तथा वामन के उल्लेख से ऐसा प्रतीत होता है कि शूद्रक ने कुछ और भी रचनायें कीं थीं। परन्तु आजकल एकमात्र मृच्छकटिक ही उनकी रचना उपलब्ध होती है। इसी पर कीर्तिपताका फहरा रही है।

मृच्छकटिक का मूल-स्रोत :

संस्कृत-साहित्य में कई ऐसे ग्रन्थ हैं जिनका घटनाचक्र मृच्छकटिक से मिलता जुलता है। इस प्रकार के ग्रन्थों में भास का ‘दरिद्रचारुदत्त’ दण्डी का ‘दशकुमार-चरित’ सोमदेव का ‘कथासरित्सागर’ है। कालिदास के ‘शाकुन्तल’ और विशाखदत्त के ‘मुद्राराक्षस’ की भी कुछ घटनाओं में समानता है। अतः इसका मूलस्रोत निश्चित करना आवश्यक है।

मृच्छकटिक की कथावस्तु को दो भागों में बाँटा जा सकता है—(१) चारुदत्त और वसन्तसेना का प्रेम और (२) आर्यक की राज्यप्राप्ति।


१. द्र० मृच्छकटिक-प्रस्तावना श्लोक ३-७ ।