भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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१६मृच्छकटिक

भास के 'चारुदत्त' नाटक की कथा को देखने पर यह स्पष्ट प्रतीत हो जाता है प्रथम भाग की कथा इसी से प्रभावित है। चारुदत्त में केवल चार अंक हैं। मृच्छकटिक की प्रारम्भिक कथा इससे बहुत अधिक मिलती जुलती है। दोनों की सूक्ष्मता से तुलना करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि 'मृच्छकटिक' के कर्ता ने 'दरिद्रचारुदत्त' को देखा और बड़ी सावधानी से उसे कुछ परिवर्तित करके और अधिक आकर्षक रूप दे दिया। इसीलिये अधिकांश विद्वान यह मानते हैं कि 'मृच्छकटिक' 'दरिद्रचारुदत्त' का ही परिवर्द्धित और परिष्कृत संस्करण है। भाषा शैली की दृष्टि से भी 'मृच्छकटिक' अधिक परिष्कृत है। उदाहरणार्थ—

दरिद्रचारुदत्तमृच्छकटिक
१—शृणोमि गन्धं श्रवणाभ्याम् ।<br>अन्धकारपूरिताभ्यां नासापुटाभ्यां सुष्ठु न पश्यामि ।शृणोमि माल्यगन्धम् ।<br>अन्धकारपूरितया पुनर्नासिकया न सुव्यक्तं पश्यामि भूषणशब्दम् ।
२—स्वरान्तरेण हि दक्षा व्याहर्तुं तन्न मुच्यताम् ।वंचनापण्डितत्वेन स्वरनैपुण्यमाश्रिता ।
३—तव मम च दारुणः क्षोभो भविष्यति ।मरणान्तिकं वैरं भविष्यति ।
४—उत्कण्ठितस्य हृदयानगुता सखीव ।उत्कण्ठितस्य हृदयानुगुणा वयस्या ।
५—शतसहस्रमूल्या ।चतुःसमुद्रसारभूता ।
६—कोऽप्युच्चारोऽपि नैतया भणितः ।अहो गणिकाया लोभोऽदक्षिणता च यतो न कथापि कृतान्या ।

इसी प्रकार के और भी अनेक उदाहरण देखे जा सकते हैं। उनसे यह प्रतीत हो जाता है कि शूद्रक को भाषा शैली पर पूरा अधिकार है। साधारण बात भी इस रूप में प्रस्तुत है कि पाठक आकृष्ट हुये बिना नहीं रहता। किसी वस्तु के वर्णन-विस्तार में इनकी दक्षता देखने योग्य है। चाहे वसन्तसेना के भवन का वर्णन हो या वर्षा ऋतु का, शूद्रक की कल्पना अव्याहत रूप से उड़ती है।

मृच्छकटिक नामकरण का अभिप्राय :

किसी भी ग्रन्थ के आकर्षक नाम से अध्येता पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। इसीलिये साहित्यदर्पण में यह लिखा "नाम कार्य नाटकस्य गर्भितार्थप्रकाशकम् ।" (सा० द० ६।१४२)। प्रकरण के नामकरण के विषय में यह लिखा है "नायिका-नायकाख्यानात् संख्या प्रकरणादिषु । (सा० द० ६।१४३) इसके अनुसार यहाँ वसन्तसेना या चारुदत्त के आधार पर नाम होना चाहिये था। परन्तु ऐसा न