मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका १७
करके षष्ठ अंक की एक घटना के आधार पर नाम रखने का औचित्य विचारणीय है ।
घटना इस प्रकार है—चारुदत्त का पुत्र अपने किसी पड़ोसी के पुत्र की सोने की गाड़ी से खेल कर आया है और अपने घर पर उसी प्रकार की सोने की गाड़ी से खेलने की जिद कर रहा है। रदनिका उसे बहलाने के लिये मिट्टी की गाड़ी देती है । वह लेने से इनकार कर देता है । तब वह उसे वसन्तसेना के पास ले जाती है। वसन्तसेना को जब उसके रोदन का कारण मालूम होता है और उससे बातें करती है तब प्रेमार्द्र होकर अपने सारे गहने उतार कर दे देती है और कहती है कि इनसे गाड़ी बनवा लो । [ मृत्=मिट्टी की शकटिका=छोटी गाड़ी है वर्णित जिसमें—इस प्रकार का अर्थ 'मृच्छकटिकम्' का होता है । ]
प्रस्तुत प्रकरण का घटनाचक्र इन गहनों से अधिक प्रभावशाली बन जाता है । जब चारुदत्त को इस घटना का ज्ञान होता है । तब वह विदूषक द्वारा गहने वापस भेज देता है । किन्तु किन्हीं कारणों से विदूषक उन्हें वसन्तसेना के पास नहीं ले जा पाता है । उधर चारुदत्त को न्यायाधिकरण में बुला लिया जाता है । यह जानकारी मिलने पर विदूषक पहले न्यायाधिकरण ही पहुँचता है । वहाँ शकार के साथ उसका झगड़ा होने पर वे गहने उसके पास से जमीन पर गिर जाते हैं और चारुदत्त अपराधी सिद्ध हो जाता है । उसे मृत्युदण्ड दे दिया जाता है । इस प्रकार यह एक महत्त्वपूर्ण घटना बन जाती है ।
यह कहा जाय कि उक्त आधार पर तो 'सुवर्णशकटिकम्' यह नाम रखना चाहिये था ? इसका उत्तर यह है कि नाम आकर्षक और उत्कण्ठाजनक होना चाहिये । 'मिट्टी की गाड़ी' यह नाम 'सोने की गाड़ी' से अधिक उत्कण्ठा पैदा करने वाला है ।
इस नामकरण के औचित्य को सिद्ध करने के लिये कुछ¹ विद्वानों ने कई तर्क प्रस्तुत किये हैं—(१) इस नाम के द्वारा कवि जीवन के लिये शिक्षा देना चाहता है । रोहसेन अपनी मिट्टी की गाड़ी से सन्तुष्ट नहीं है । वह पड़ोसी के पुत्र की सोने की गाड़ी लेना चाहता है । परन्तु अपनी वास्तविक परिस्थिति से असन्तोष और दूसरों की उन्नत अवस्था से ईर्ष्या करना दोष है । ऐसे दोषों के कारण मनुष्य को आपत्ति का सामना करना पड़ता है । इसी प्रकार चारुदत्त भी अपनी पत्नी धूता से पूर्णतया सन्तुष्ट नहीं हो पाता है वह वसन्तसेना की ओर भी आकृष्ट होता है । इसी कारण उसका जीवन कष्टमय हो जाता है । (२) दो प्रकार की
१. द्र० मृच्छकटिकभूमिका कान्तानाथ शास्त्री तेलङ्ग पृ० ३२ ।
मृ० भू० २