भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

भूमिका १७

करके षष्ठ अंक की एक घटना के आधार पर नाम रखने का औचित्य विचारणीय है ।

घटना इस प्रकार है—चारुदत्त का पुत्र अपने किसी पड़ोसी के पुत्र की सोने की गाड़ी से खेल कर आया है और अपने घर पर उसी प्रकार की सोने की गाड़ी से खेलने की जिद कर रहा है। रदनिका उसे बहलाने के लिये मिट्टी की गाड़ी देती है । वह लेने से इनकार कर देता है । तब वह उसे वसन्तसेना के पास ले जाती है। वसन्तसेना को जब उसके रोदन का कारण मालूम होता है और उससे बातें करती है तब प्रेमार्द्र होकर अपने सारे गहने उतार कर दे देती है और कहती है कि इनसे गाड़ी बनवा लो । [ मृत्=मिट्टी की शकटिका=छोटी गाड़ी है वर्णित जिसमें—इस प्रकार का अर्थ 'मृच्छकटिकम्' का होता है । ]

प्रस्तुत प्रकरण का घटनाचक्र इन गहनों से अधिक प्रभावशाली बन जाता है । जब चारुदत्त को इस घटना का ज्ञान होता है । तब वह विदूषक द्वारा गहने वापस भेज देता है । किन्तु किन्हीं कारणों से विदूषक उन्हें वसन्तसेना के पास नहीं ले जा पाता है । उधर चारुदत्त को न्यायाधिकरण में बुला लिया जाता है । यह जानकारी मिलने पर विदूषक पहले न्यायाधिकरण ही पहुँचता है । वहाँ शकार के साथ उसका झगड़ा होने पर वे गहने उसके पास से जमीन पर गिर जाते हैं और चारुदत्त अपराधी सिद्ध हो जाता है । उसे मृत्युदण्ड दे दिया जाता है । इस प्रकार यह एक महत्त्वपूर्ण घटना बन जाती है ।

यह कहा जाय कि उक्त आधार पर तो 'सुवर्णशकटिकम्' यह नाम रखना चाहिये था ? इसका उत्तर यह है कि नाम आकर्षक और उत्कण्ठाजनक होना चाहिये । 'मिट्टी की गाड़ी' यह नाम 'सोने की गाड़ी' से अधिक उत्कण्ठा पैदा करने वाला है ।

इस नामकरण के औचित्य को सिद्ध करने के लिये कुछ¹ विद्वानों ने कई तर्क प्रस्तुत किये हैं—(१) इस नाम के द्वारा कवि जीवन के लिये शिक्षा देना चाहता है । रोहसेन अपनी मिट्टी की गाड़ी से सन्तुष्ट नहीं है । वह पड़ोसी के पुत्र की सोने की गाड़ी लेना चाहता है । परन्तु अपनी वास्तविक परिस्थिति से असन्तोष और दूसरों की उन्नत अवस्था से ईर्ष्या करना दोष है । ऐसे दोषों के कारण मनुष्य को आपत्ति का सामना करना पड़ता है । इसी प्रकार चारुदत्त भी अपनी पत्नी धूता से पूर्णतया सन्तुष्ट नहीं हो पाता है वह वसन्तसेना की ओर भी आकृष्ट होता है । इसी कारण उसका जीवन कष्टमय हो जाता है । (२) दो प्रकार की


१. द्र० मृच्छकटिकभूमिका कान्तानाथ शास्त्री तेलङ्ग पृ० ३२ ।
मृ० भू० २

१८ मृच्छकटिक

गाड़ियों की घटना आगामी प्रवहणविपर्यय की घटना को सूचित करती है जो इस प्रकार की एक अति महत्त्वपूर्ण घटना है। (३) भासकृत 'चारुदत्त' नाटक 'मृच्छकटिक' का मूल स्रोत है। इस समय उसमें केवल चार अंक ही मिलते हैं। वसन्तसेना चारुदत्त से मिलने के लिये उद्यत है—इतनी कथा से ही नाटक समाप्त हो जाता है। कुछ विद्वानों के अनुसार यह नाटक अपूर्ण है। इसमें कम से कम एक अंक और रहा होगा। इसकी कथा मृच्छकटिक के पंचम अंक तक की कथा के बराबर रही होगी। यदि यह स्थिति मान ली जाय तो कहा जा सकता है कि इससे आगे की कथा शूद्रक द्वारा कल्पित है। षष्ठ अंक में ही मिट्टी की गाड़ी वाली घटना आती है। इसलिये कवि ने अपनी कल्पना के आरम्भ को प्रकट करने की अभिलाषा से इस घटना के नाम पर ही 'प्रकरण' का नाम रख दिया।

अब एक ही प्रश्न है लक्षणग्रन्थों से विरोध? इसका सीधा समाधान यह है कि नाटकादि के जो भी लक्षण बनाये गये हैं वे इनकी रचना को देखकर ही बाद में बनाये गये। सम्भव है मृच्छकटिक की ओर इन लक्षणकारों की दृष्टि न गयी हो। अतः इस प्रकरण का नाम 'मृच्छकटिकम्' उचित प्रतीत होता है। नायक या नायिका का नाम आधार बनाने पर श्रोता को अधिक उत्कण्ठा नहीं हो पाती, क्योंकि पहले से ही 'चारुदत्त' नाटक प्रसिद्ध था। अतः प्रस्तुत नाम की कल्पना उचित है।

मृच्छकटिक एक प्रकरण (रूपकविशेष) है :—

पहले रूपक के दश भेद लिखे जा चुके हैं। इनमें 'नाटक' के बाद 'प्रकरण' आता है। मृच्छकटिक भी एक प्रकरण है। प्रकरण के लक्षण साहित्यदर्पण में इस प्रकार हैं—

'भवेत् प्रकरणे वृत्तं लौकिकं कविकल्पितम्।
शृङ्गारोऽङ्गी नायकस्तु विप्रोऽमात्योऽथवा वणिक् ॥
सापायधर्मकामार्थपरो धीरप्रशान्तकः ।
नायिका कुलजा क्वापि, वेश्या, क्वापि द्वयं क्वचित् ।।
तेन भेदास्त्रयस्तस्य तत्र भेदस्तृतीयकः ।
कितवद्यूतकारादि - विट - चेटक - संकुलः ॥
[ अस्य नाटकप्रकृतित्वात् शेषं नाटकवत् ...... । ]¹

रूपकों में 'प्रकरण' का वृत्त (कथानक) लौकिक तथा कविकल्पित होता है। शृङ्गार मुख्य रस होता है, ब्राह्मण, अमात्य या वणिक् में से कोई एक नायक होता


१. साहित्यदर्पण ६।२४१-४३

भूमिका १६

है। वह नायक धीरप्रशान्त होता है तथा विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म, अर्थ तथा काम में परायण होता है। प्रकरण की नायिका कुलस्त्री या वेश्या होती है। कभी-कहीं दोनों नायिकायें होती हैं। इस प्रकार नायिकाभेद से इसके भी तीन भेद बन जाते हैं। इसमें धूर्त, विट और चेट आदि रहते हैं। यह प्रकरण नाटक का ही परिवर्तित रूप है। अतः सन्धि, प्रवेशक इत्यादि शेष बातें नाटक के समान ही होती हैं।

**मृच्छकटिक में समन्वयः—**प्रस्तुत प्रकरण का कथानक लोकाश्रित है। इसमें कवि की कल्पना अधिक है। इसका मुख्य रस शृङ्गार है। करुण, हास्य, बीभत्स रस अङ्ग रस के रूप में हैं। इसका नायक चारुदत्त ब्राह्मण है। वह अति दरिद्र होने पर भी धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि में लगा रहता है। इसमें दो नायिकायें हैं—वेश्या (वसन्त्तसेना) और कुलस्त्री (धर्मपत्नी धूता)। इसलिए यह तीसरा भेद है। यहाँ धूर्त, द्यूतकर, विट, चेट आदि भी हैं। इस कारण यह 'संकीर्ण प्रकरण' समझना चाहिये।

यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि 'मृच्छकटिक' में लक्षणग्रन्थों के सभी नियम पूरी तरह लागू नहीं होते हैं। कारण स्पष्ट है कि इसकी रचना के समय तक ये नियम मान्यताप्राप्त रूप नहीं ले सके होंगे। सामान्यतया नायक या नायिका के नाम पर ही इस प्रकरण का नाम होना चाहिये था। परन्तु ऐसा नहीं है। यहाँ षष्ठ अंक की घटना को ही महत्त्व दिया गया है। इसके प्रत्येक अंक में नायक 'चारुदत्त' की उपस्थिति नहीं है। नाट्यशास्त्र और दशरूपक के अनुसार कुलस्त्री और वेश्या एक साथ रंगमंच पर नहीं आनी चाहिये, परन्तु इसमें ऐसा नहीं है। दशम अंक में दोनों आमने सामने आती हैं और एक दूसरे का स्वागत करती हैं। परस्पर मिलती हैं। ऐसी ही कुछ और भी अनियमिततायें हैं। फिर भी, विद्वानों का मत है कि मृच्छकटिक को छोड़कर संकीर्ण-प्रकरण का दूसरा अच्छा उदाहरण मिलना कठिन है।

मृच्छकटिक का संक्षिप्त कथानक

**प्रस्तावना—**मृच्छकटिक एक 'प्रकरण' है। इसका प्रारम्भ नान्दी-पाठ के बाद प्रस्तावना से होता है। चिरकाल तक संगीत का अभ्यास करने से क्षुधार्त्त सूत्रधार अपने घर पहुँचकर वहाँ होने वाली अभूतपूर्व तैयारी देख कर आश्चर्यचकित हो जाता है। इसका रहस्य जानने के लिये वह अपनी पत्नी से पूछता है। वह उसे 'अभिरूपपति' नामक व्रत के अनुष्ठान की तैयारी बताती है। इसे सुनकर वह क्रुद्ध हो जाता है। परन्तु वस्तुस्थिति जानकर बह भी उस अनुष्ठान में सहयोग देने के

२० मृच्छकटिक

लिये ब्राह्मण को निमन्त्रित करने के विचार से चल पड़ता है। वह उज्जयिनी-वासियों की सम्पन्नता और अपनी निर्धनता से चिन्तित है कि उसके यहाँ भोजन करने के लिये किसी भी ब्राह्मण का तैयार होना कठिन है। उस समय अकस्मात् उसे आता हुआ मैत्रेय दिखाई देता है किन्तु उसके घर भोजन के लिये मैत्रेय किसी भी प्रकार नहीं तैयार होता है। दुःखी होकर सूत्रधार दूसरे ब्राह्मण की खोज में निकल जाता है। और इस प्रकार रंगमंच पर मैत्रेय के आने की सूचना के साथ प्रस्तावना समाप्त हो जाती है।

प्रथम अङ्कः—

प्रथम अंक के प्रथम दृश्य में मैत्रेय (विदूषक) रंगमंच पर आता है। वह चारुदत्त की बीती हुई सम्पन्नता और वर्तमान अतिनिर्धनता को याद करके दुखी हो जाता है। वह प्रिय मित्र जूर्णवृद्ध द्वारा दिया गया जातीकुसुमवासित दुपट्टा देने के लिये चारुदत्त के पास जाता है। चारुदत्त अपने घर की दशा देखकर दुखी होकर बैठा है। विदूषक को आया देखकर चारुदत्त उसका स्वागत करता है। विदूषक वह दुपट्टा उसे दे देता है। चारुदत्त अपनी निर्धनता के कारण लोगों के परिवर्तित व्यवहार को देखकर बहुत दुःख प्रकट करता है। वह विदूषक को मातृदेवियों के लिये बलि समर्पित करने को कहता है। किन्तु वह जाने से कतराता है। तब चारुदत्त उसे वहाँ ठहरने के लिये कह कर समाधि सम्पन्न करने लगता है।

दूसरे दृश्य में वसन्तसेना का पीछा करते हुये विट, चेट और शकार का प्रवेश होता है। वसन्तसेना भागती है। ये तीनों उसका पीछा करते हैं। तेज चलने से वह आगे निकल जाती है उसके परिजन पीछे छूट जाते हैं। शकार ( राजा का शाला ) उससे अपना प्रेम प्रकट करता है और वसन्तसेना से प्रेम के लिए आग्रह करता है। विट भी वसन्तसेना को समझाता है किन्तु वह किसी भी तरह उसे नहीं चाहती है। मूर्खता से शकार यह कह देता है कि चारुदत्त का घर समीप में ही है। यह सुनकर वसन्तसेना खुश होकर अन्धकार में गायब हो जाती है। वह चारुदत्त के घर के पास पहुँचती है। वहाँ दरवाजा बन्द है।

तृतीय दृश्य में पुनः चारुदत्त और विदूषक सामने आते हैं। चारुदत्त जप समाप्त करके पुनः विदूषक को बलि देने के लिये कहता है। उसका इनकार सुन कर चारुदत्त बहुत दुखी होता है। तब विदूषक रदनिका के साथ जाने के लिये राजी होता है। विदूषक दरवाजा खोलता है। बाहर खड़ी वसन्तसेना अपने आंचल से दीप बुझा देती है। विदूषक रदनिका से बाहर चलने को कहता है और स्वयं दीप जलाने के लिये अन्दर चला जाता है। अवसर का लाभ उठाकर वसन्तसेना भीतर

भूमिका २१

चली आती है। इधर उसको खोजते हुये शकार आदि भी वहीं पहुँच जाते हैं। शकार अंधेरे में खड़ी रदनिका को ही वसन्तसेना समझकर उसके बाल पकड़ लेता है। वह प्रतिवाद करती है। इसी बीच दीप लेकर विदूषक आ जाता है। रदनिका के अपमान से वह बहुत नाराज होता है किन्तु विट द्वारा सारी स्थिति बताने और प्रार्थना करने पर शान्त हो जाता है। विट वहाँ से चलने के लिए कहता है। किन्तु शकार वसन्तसेना को लिए बिना नहीं जाना चाहता है। कुछ देर बाद वह चारुदत्त को धमकी देकर वापस चला जाता है। विदूषक रदनिका को समझा बुझा कर भीतर ले जाता है।

प्रथम अंक के चतुर्थ दृश्य में चारुदत्त वसन्तसेना को रदनिका समझ लेता है और पुत्र रोहसेन को भीतर ले जाने के लिए उससे कहता है। वह पुत्र को ठंड से बचाने के लिये दुपट्टा ओढ़ने के लिए देता है। उसकी पुष्पगन्ध सूंघकर वसन्तसेना प्रसन्न हो जाती है। वह अभी भी उसके यौवन के प्रभाव को समझती है। वह चुपचाप खड़ी रहती है। अपने आदेश का पालन न होते देखकर चारुदत्त पुनः अपनी निर्धनता के लिये दुःखी होने लगता है। इतने में विदूषक और रदनिका वहाँ आ जाते हैं। तब वसन्तसेना की सारी घटना चारुदत्त को मालूम हो जाती है। वे दोनों परस्पर क्षमायाचना करने लगते हैं। वसन्तसेना अपने सारे गहनें उसके पास धरोहर के रूप में रख देती है। चारुदत्त और विदूषक दोनों वसन्तसेना को उसके घर छोड़ कर वापस लौटते हैं। चारुदत्त उस सुवर्ण-भाण्ड की रक्षा का भार दिन में वर्धमानक पर और रात में विदूषक पर डाल देता है।

द्वितीय अङ्क -

द्वितीय अङ्क के प्रथम दृश्य में वसन्तसेना और मदनिका रंगमंच पर आती हैं। एक चेटी वसन्तसेना की माता का आदेश लेकर वसन्तसेना से स्नान और पूजन करने के लिये कहती है। किन्तु वह इनकार कर देती है। वह चेटी वापस चली जाती है। मदनिका वसन्तसेना की उदासी देखकर इसका कारण पूछती है। वह चारुदत्त के प्रति अपने प्रेम का रहस्य प्रकट कर देती है। जब मदनिका चारुदत्त की अति निर्धनता कहती है तो वह अपना निर्लोभ प्रेम और रमणेच्छा प्रकट करती है।

द्वितीय अंक के दूसरे दृश्य में जूये में हारा हुआ संवाहक रंगमंच पर आता है। वह जुये की खूब निन्दा करता है और अपनी रक्षा के लिये मूर्तिरहित मन्दिर में जाकर देवता के समान निश्चल होकर खड़ा हो जाता है। उसको खोजते हुये सभिक माथुर और द्यूतकर भी वहीं पहुँच जाते हैं। वे अपनी हानि के लिये चिल्लाते

२२ मृच्छकटिक

हुये उसी मन्दिर में घुस कर फिर जुआ खेलने लगते हैं। जुआ देखकर संवाहक अपनी इच्छा नहीं रोक पाता है और अचानक खेलने आ जाता है। वे दोनों उसे पकड़ लेते हैं और अपनी उधार दी गयीं दश सुवर्ण-मुद्रायें माँगते हैं। न देने पर पीटने लगते हैं। तब संवाहक अपने को बेचकर ऋण चुकाना चाहता है। इसी बीच दर्दुरक आ जाता है। वह संवाहक का पक्ष लेता है। माथुर और दर्दुरक में झगड़ा होता है। मौका देखकर दर्दुरक माथुर की आँखों में धूल झोंक कर संवाहक से भागने का इशारा करता है। जब तक माथुर आँखों से धूल निकालता है तब तक वे दोनों भाग जाते हैं।

द्वितीय अंक के तीसरे दृश्य में माथुर और द्यूतकर के भय से भागा हुआ संवाहक वसन्तसेना के घर पहुँच जाता है। उसका पीछा करते हुये वे दोनों भी वहाँ पहुँच जाते हैं। संवाहक वसन्तसेना को अपना परिचय देकर अपने को चारुदत्त का पुराना सेवक (संवाहक) बताता है। इससे वसन्तसेना प्रसन्न होकर उसके भय का कारण पूछती है। वह जुये में हार और कर्ज की घटना बता देता है। सारी बातें सुन कर वसन्तसेना अपनी सेविका द्वारा आभूषण भेजकर उन दोनों को दिला देती है जिससे वे प्रसन्न होकर वापस चले जाते हैं। किन्तु जुये में हारने के कारण हुये अपमान की ग्लानि से वह संवाहक बौद्ध संन्यासी बनना चाहता है। वसन्तसेना द्वारा मना किये जाने पर भी वह अपना निश्चय नहीं बदलता है और संन्यासी बनने के लिये चला जाता है।

द्वितीय अंक के चौथे दृश्य में कर्णपूरक प्रवेश करता है। वह वसन्तसेना से उसके खुण्डमोटक नामक मतवाले हाथी के उपद्रव और उससे परिव्राजक को बचाने के लिये किये गये अपने पराक्रम की चर्चा करता है। वह भीड़ में खड़े हुये किसी व्यक्ति (चारुदत्त) द्वारा दिये गये दुपट्टा को दिखाता है। वसन्तसेना पहचान कर उसे ओढ़ लेती है और कर्णपूरक को पुरस्कार में आभूषण दे देती है। कर्णपूरक खुश होकर चला जाता है। उसके मुख से चारुदत्त के जाने की बात सुनकर वह सेविका के साथ ऊपर छत पर चढ़ कर चारुदत्त को देखने के लिये चली जाती है।

तृतीय अङ्क—

तृतीय अंक के प्रथम दृश्य में चारुदत्त का चेट रंगमंच पर आता है। आधी रात बीत चुकी है। संगीत का आनन्द उठाने के लिये गया हुआ चारुदत्त अभी तक वापस नहीं आया है। चेट स्वाभाविक दोष की निन्दा करके सोने के लिये चला जाता है।

भूमिका २३

तृतीय अंक के दूसरे दृश्य में चारुदत्त और विदूषक रंगमंच पर आते हैं। वे रेभिल का गाना सुनकर वापस लौटते हैं। चारुदत्त रेभिल के संगीत की प्रशंसा करता है। किन्तु विदूषक को अच्छा नहीं लगता है। वह शीघ्र ही घर चलने को कहता है। दोनों घर पहुँच कर वर्धमानक को बुलाते हैं। वह दरवाजा खोलता है। वे दोनों भीतर प्रवेश करते हैं। पैर धोने के प्रश्न पर विदूषक और वर्धमानक में कुछ विवाद होता है। चारुदत्त और विदूषक पैर धोकर सोने की तैयारी करते हैं। चेट कहता है कि रात में स्वर्णभाण्ड की रखवाली विदूषक को करनी है। अतः उसे सौंप देता है। स्वर्णभाण्ड लेकर मैत्रेय और चारुदत्त सोने लगते हैं।

तृतीय अंक के तीसरे दृश्य में शर्विलक प्रवेश करता है। वह चौर्यकला में अपनी निपुणता की प्रशंसा करता है। वह सेंध काट कर चारुदत्त के घर में प्रविष्ट हो जाता है। विदूषक स्वर्णभाण्ड की रक्षा की दुश्चिन्ता में परेशान है। वह स्वप्न में बड़बड़ाता है और चोरी हो जाने के भय से वह स्वर्णभाण्ड चारुदत्त को देना चाहता है। किन्तु शर्विलक चोर उस स्वर्णभाण्ड को ले लेता है। वापस निकलते समय अचानक रदनिका आ जाती है। वह वर्धमानक को न देखकर विदूषक को बुलाने के लिये जाती है। शर्विलक उसे मारना चाहता है किन्तु स्त्री समझकर उसे छोड़ कर घर से बाहर हो जाता है। रदनिका शोर मचाती है। विदूषक और चारुदत्त जागते हैं। चारुदत्त उस कलात्मक सेंध को देख कर उसकी प्रशंसा करता है। विदूषक स्वप्न में चारुदत्त को दिये गये स्वर्णभाण्ड की चर्चा करके अपनी बुद्धिमानी बताता है। सुनकर चारुदत्त प्रतिवाद नहीं करता है क्योंकि उसे यह जानकर सन्तोष है कि परिश्रम करके घर में घुसनेवाला चोर खाली हाथ नहीं गया है। किन्तु जब उसे यह स्मरण कराया गया कि वह स्वर्णभाण्ड तो वसन्तसेना की धरोहर है तो वह मूर्च्छित होकर गिर जाता है। वह होश में आकर सोचता है कि लोग घटना की सत्यता पर विश्वास नहीं करेंगे क्योंकि वह निर्धन है। वह दुखी हो जाता है। इस घटना की जानकारी उसकी धर्मपत्नी धूता को होती है। वह भी बहुत दुखी हो जाती है। अपने पति को लोकापवाद से बचाने के लिये वह अपने मातृगृह से प्राप्त कीमती रत्नमाला विदूषक को दे देती है। विदूषक चारुदत्त के पास ले जाता है और वसन्तसेना को देने के लिये रोकता है। परन्तु चारुदत्त अपनी प्रतिष्ठा सुरक्षित रखने के लिये वह रत्नमाला वसन्तसेना के पास भेज ही देता है। वह चोरी की घटना की निन्दा बचाने के लिये वर्धमानक से सेन्ध बन्द करने के लिये कहता है और स्नानादि करके सन्ध्या-वन्दनादि के लिये चला जाता है।

२४ मृच्छकटिक

चतुर्थ अङ्क—

चतुर्थ अङ्क के प्रथम दृश्य में वसन्तसेना और मदनिका चारुदत्त का चित्र देखती हुईं प्रवेश करतीं हैं। उसी समय एक चेटी वसन्तसेना की माता का आदेश देती है कि राजश्यालक संस्थानक द्वारा भिजवायी गयी गाड़ी वसन्तसेना को लेने आयी है। उसने दश सहस्र स्वर्णमुद्रायें भी भेजीं हैं। राजश्यालक (शकार) का नाम सुनते ही वसन्तसेना अतिक्रुद्ध हो जाती है और उस समय तथा आगे कभी भी जाने से इनकार कर देती है।

चतुर्थ अंक के द्वितीय दृश्य में सबसे पहले शर्विलक प्रविष्ट होता है। वह अपने चौर्यव्यवसाय की चर्चा करता हुआ मदनिका को छुड़वाने के लिये वसन्तसेना के घर की ओर चल पड़ता है। उधर वसन्तसेना चारुदत्त का चित्र अपने शयनकक्ष में रखने के लिये मदनिका को भेजती है। इसी बीच में शर्विलक भी वहाँ पहुँच जाता है और शयनकक्ष की ओर जाती हुई मदनिका से उसकी भेंट हो जाती है। वह शंकित होता हुआ चुराये गये गहने मदनिका को देता है। उन्हें देखकर मदनिका आश्चर्य में पड़ जाती है। पूछे जाने पर शर्विलक उन गहनों को चारुदत्त के घर से चुराने की बात कहता है। मदनिका गहनों को पहचान लेती है। वह उन्हें वापस लौटाने को कहती है। किन्तु शर्विलक अपनी असमर्थता व्यक्त करता है। तब मदनिका चारुदत्त का सम्बन्धी बनकर वसन्तसेना को देने की बात कहती है। कुछ देर विवाद करने के बाद शर्विलक वसन्तसेना को गहनें देने के लिये तैयार हो जाता है। यह सारी घटना छिपकर बैठी हुई वसन्तसेना सुन लेती है। वह चारुदत्त के शरीर को किसी प्रकार की हानि न होने की बात जानकर प्रसन्न है। मदनिका वसन्तसेना के पास जाकर यह खबर देती है कि चारुदत्त का कोई सम्बन्धी आया है। मुस्कुराकर वसन्तसेना भीतर आने के लिये कह देती है। शर्विलक भीतर जाकर वसन्तसेना के सामने मदनिका को सारे गहने सौंप देता है। रहस्य जानने वाली वसन्तसेना अपनी वाक्पटुता से शर्विलक को मूक बनाकर मदनिका को वधू बनाकर उसे सौंप देती हैं। वह अपनी गाड़ी में बैठाकर भेजती है। मदनिका रोकर वसन्तसेना के प्रति कृतज्ञता प्रकट करती है। प्रणाम करके गाड़ी पर बैठ जाती है।

चतुर्थ अंक के तीसरे दृश्य में नेपथ्य में यह घोषणा होती है कि भयभीत राजा पालक ने गोपालपुत्र आर्यक को उसके घर से पकड़वा कर घोर जेलखाने में बन्द करा दिया है। यह सुनकर शर्विलक को अपने मित्र की दुःखद स्थिति जानकर बहुत कष्ट होता है। वह अपने मित्र की रक्षा के लिये व्यग्र हो जाता है। मदनिका

भूमिका २५

उसकी नवपत्नी होने पर भी बाधक नहीं बनती है। अतः शर्विलक गाड़ीवान को समझाकर चेट के साथ मदनिका को सार्थवाह रेभिल के घर भेज देता है और स्वयं अपने मित्र को छुड़ाने के लिये चल पड़ता है।

चतुर्थ अंक के चौथे दृश्य में एक चेटी वसन्तसेना को यह समाचार देती है कि चारुदत्त के पास से एक ब्राह्मण आया है। यह सुनकर प्रसन्न होकर वसन्तसेना उसे शीघ्र ही भीतर लाने की अनुमति दे देती है। चेटी विदूषक को लेकर वसन्तसेना के पास जाती है। मार्ग में आठ प्रकोष्ठों को देखकर उनकी महिमा कहता हुआ विदूषक प्रसन्न होता है। वसन्तसेना के पास पहुँचकर विदूषक यह कहता है कि आपके गहने अपने मानकर आर्य चारुदत्त जुये में हार गये हैं। अतः उनके बदले में यह रत्नमाला भेजी है, आप इसे ले लीजिये। वसन्तसेना रत्नमाला लेकर विदूषक को वापस भेजती है और सायंकाल चारुदत्त से मिलने का सन्देश देती है। रत्नमाला ले लेने से विदूषक नाराज होकर चला जाता है। वसन्तसेना भी चारुदत्त से मिलने के लिये चल पड़ती है।

पञ्चम अङ्क

पंचम अंक के प्रथम दृश्य में उत्कण्ठित चारुदत्त के पास आकर विदूषक उससे कहता है कि वसन्तसेना ने रत्नावली स्वीकार कर ली है और सायंकाल उससे मिलने के लिये आने वाली है। वसन्तसेना द्वारा उसका अपेक्षित सम्मान न होने से और बहुमूल्य रत्नावली स्वीकार कर लेने के कारण विदूषक उस वेश्या से सम्पर्क समाप्त करने पर जोर देता है।

पंचम अंक के द्वितीय दृश्य में चेट आकर वसन्तसेना के आगमन की खबर देता है। यह जानकर चारुदत्त बहुत खुश हो जाता है।

पंचम अंक के तृतीय दृश्य में विट के साथ वसन्तसेना चारुदत्त के घर की ओर जाती हुई दिखाई देती है। वे दोनों वर्षा का सुन्दर वर्णन करते हैं। वसन्तसेना वर्षा और बिजली दोनों को बाधा पहुँचाने के कारण कोसती है। चारुदत्त के घर पहुँच कर विट इशारे से विदूषक को बुलाता है और वसन्तसेना के आगमन की सूचना देता है। विदूषक यह शुभ समाचार चारुदत्त को बताता है। वह सुनकर बहुत प्रसन्न हो जाता है। वसन्तसेना चारुदत्त के पास जाते समय छत्रधारिणी के साथ विट को वापस भेज देती है।

चतुर्थ दृश्य में चेटी और वसन्तसेना वाटिका में पहुंचते हैं। वहाँ चारुदत्त प्रसन्न होकर उसका स्वागत करता है। विदूषक वसन्तसेना से उसके आगमन का कारण पूछता है। चेटी उत्तर देती है कि आपकी भेजी हुई रत्नावली का मूल्य क्या है ?

२६ मृच्छकटिक

उसके बदले में आप यह स्वर्णभाण्ड ले लीजिये। चारुदत्त और विदूषक उस स्वर्ण-भाण्ड को देखकर बड़े आश्चर्य में पड़ जाते हैं। इसके बाद चेटी विदूषक के कान में स्वर्णभाण्ड प्राप्त होने की सारी कथा सुना देती है। विदूषक सुनकर खुश होता है और चारुदत्त से भी कह देता है। सभी लोग प्रसन्न हो जाते हैं। उसी समय वर्षा होने लगती है। विदूषक वर्षा की निन्दा करता है किन्तु चारुदत्त प्रशंसा करता है। वह और वसन्तसेना प्रेमलीला में लीन हो जाते हैं। वर्षा के अधिक तेज हो जाने पर वे दोनों भीतर चले जाते हैं और वसन्तसेना वह रात वहीं बिताती है।

षष्ठ अङ्क—

षष्ठ अंक के प्रथम दृश्य में सोती हुयी वसन्तसेना को जगाती हुई चेटी प्रवेश करती है। जागने पर उसे बताती है कि आर्य चारुदत्त जीर्णोद्यान में गये हैं और यह आदेश दे गये हैं कि रात में ही गाड़ी तैयार रखी जाय। प्रातः होते ही वसन्तसेना को भी जीर्णोद्यान पहुँचा दिया जाय। यह सुनकर वसन्तसेना बहुत खुश हो जाती है। वह अपने को चारुदत्त के महल में पाकर चकित है। वह चेटी द्वारा रत्नावली चारुदत्त की पत्नी धूता के पास वापस भेजती है। और कहती है कि मैं श्रीमान् चारुदत्त की गुणनिर्र्जिता दासी हूँ अतः आपकी भी। अतः यह रत्नावली आप के ही कण्ठ की शोभा बढ़ाये। किन्तु धूता उसे वापस नहीं लेती है और कहती है कि आर्यपुत्र ही मेरे सबसे बड़े आभूषण हैं। अतः उनके द्वारा दी गयी रत्नावली आप अपने ही पास रखिये।

द्वितीय दृश्य में रदनिका चारुदत्त के पुत्र रोहसेन को गोद में लेकर प्रवेश करती है। वह सोने की गाड़ी से खेलने की जिद करता है। रदनिका मिट्टी की गाड़ी बनाकर देती है। [ इसी मृत्शकटिका (= मिट्टी की गाड़ी ) के नाम पर इस 'प्रकरण' का नाम रखा गया है।] वह बालक मिट्टी की गाड़ी लेने से इनकार करता है। सोने की गाड़ी के लिये रोने लगता है। वह उसे लेकर वसन्तसेना के पास जाती है। वसन्तसेना उसे चारुदत्त का पुत्र जानकर प्रेम प्रदर्शित करती हुई रोने का कारण पूछती है। उसकी भोली-भाली बातों से वसन्तसेना का हृदय प्रेम से उमड़ पड़ता है। वह बच्चे को सोने की गाड़ी बनवाने के लिये अपने सभी गहने उतार कर दे देती है।

तृतीय दृश्य में चारुदत्त का गाड़ीवान वर्धमानक गाड़ी लेकर आता है। रदनिका गाड़ी आने की सूचना वसन्तसेना को देती है। वह स्वयं को सजाने तक के लिये गाड़ीवान को प्रतीक्षा करने के लिये कहती है। गाड़ीवान को अचानक याद आता है कि वह गाड़ी का बिछावन भूल आया है। उसे लेने के लिये वह गाड़ी

भूमिका

२७

लेकर फिर चला जाता है। इसी बीच शकार का गाड़ीवान स्थावरक चेट शकार की गाड़ी चारुदत्त के दरवाजा के पास खड़ी कर देता है और आगे एक गाड़ीवान की सहायता करने के लिये चला जाता है। इधर तैयार होकर आई वसन्तसेना भ्रमवश उसी गाड़ी में बैठ जाती है। वापस आकर स्थावरक गाड़ी लेकर चल देता है। उधर कारागार से बन्धन तुड़ाकर भागा हुआ गोपालपुत्र आर्यक वहाँ मार्ग में घूमने लगता है। अपनी रक्षा के लिये वह चारुदत्त की वाटिका में घुस जाता है। घर से बिछावन लेकर वापस आया हुआ वर्धमानक चारुदत्त की गाड़ी वहाँ पक्षद्वार में खड़ी कर देता है। आर्यक छिप कर उस गाड़ी में बैठ जाता है। वर्धमानक यह समझता है कि वसन्तसेना आकर बैठ गयी है। अतः वह गाड़ी लेकर पुष्पकरण्डक जीर्णोद्यान की ओर चल पड़ता है।

चतुर्थ दृश्य में राजा के सेनाधिकारी वीरक और चन्दनक वर्धमानक से गाड़ी रोकने को कहते हैं। उसके भीतर छिपा हुआ आर्यक बैठा है। आपसी वाद-विवाद के बाद पहले चन्दनक चढ़ कर गाड़ी देखता है। आर्यक उससे आत्मरक्षा की प्रार्थना करता है। वह अभयदान दे देता है। गाड़ी से उतर कर वह वीरक से कहता है कि इसमें वसन्तसेना बैठी हुई चारुदत्त के पास जीर्ण पुष्पकरण्डक उद्यान में जा रही है। किन्तु उसके बोलने में कुछ घबड़ाहट दिखाई देने से वीरक को उसकी बात में सन्देह हो जाता है। वह स्वयं भी गाड़ी देखने का आग्रह करता है। इस बात को लेकर उन दोनों कुछ गरमागरमी हो जाती है। वीरक जैसे ही गाड़ी पर चढ़ता है, चन्दनक उसे खींचकर अपने पैर से मार देता है। वह वसन्तसेना के रूप में छिपे हुये आर्यक को आत्मरक्षार्थ तलवार दे देता है। और गाड़ीवान से कहता है कि किसी के पूछने पर कह देना कि वीरक और चन्दनक गाड़ी देख चुके हैं। वर्धमानक गाड़ी चला देता है। गाड़ी से आगे जाता हुआ आर्यक राजा बनने के समय चन्दनक को याद रखने का वादा करता है।

सप्तम अङ्क—

सप्तम अङ्क के प्रथम दृश्य में चारुदत्त और विदूषक वसन्तसेना की गाड़ी की प्रतीक्षा करते हुये दिखाई देते हैं। गाड़ी आने में होने वाले विलम्ब के लिये अनेक तर्क-वितर्क करते हैं। उसी समय छिपकर बैठे हुये आर्यक को लाने वाली गाड़ी की आवाज सुनाई देती है। आर्यक चारुदत्त की प्रशंसा सुन चुका है। अतः अब वह उसके दर्शन करके ही भागना चाहता है। जब गाड़ी आ जाती है तो चारुदत्त विदूषक से वसन्तसेना को गाड़ी से उतारने के लिये कहता है। विदूषक गाड़ी में चढ़कर उसमें बैठे आर्यक को देख कर डर जाता है। तब चारुदत्त स्वयं

२८ मृच्छकटिक

चढ़कर देखता है। उसमें बैठे हुये सुन्दर रूप वाले उसको हथकड़ी और बेड़ियों से बंधा देखकर उसका परिचय पूछता है। वह अपना परिचय देकर राजा द्वारा कारागार में बन्द करने की बात कहता है। वहां से भागने की बात सुनकर चारुदत्त उसे अभयदान देता है। और हथकड़ी बेड़ियों से मुक्त करा कर उसे शीघ्र ही अपनी गाड़ी से घर जाने के लिये कहता है। आर्यक के चले जाने पर राजा पालक के भय से चारुदत्त और विदूषक भी हथकड़ी-बेड़ियाँ अंधे कुआँ में फिकवाकर चल देते हैं।

अष्टम अङ्क—

अष्टम अंक के प्रथम दृश्य में गीले चीवर को लिये हुये एक बौद्ध भिक्षु प्रवेश करता है। वह धर्म का उपदेश देता है। उसी समय विट और शकार भी वहीं बगीचे में आ जाते हैं। शकार भिक्षु को डांटता है। और जन्म लेते ही संन्यासी न बनने का आरोप लगाकर पीटता है। किन्तु विट उसे बचाता है। वह भिक्षु चला जाता है। शकार बैठकर वसन्तसेना को याद करने लगता है। वह अपनी गाड़ी की प्रतीक्षा करता है। दोपहर का समय है। वह भूख से व्याकुल है। समय बिताने के लिये वह गाना गाने लगता है।

द्वितीय दृश्य में गाड़ी लिये हुये स्थावरक चेट दिखाई देता है। गाड़ी की आवाज सुनकर शकार गाड़ी आने की कल्पना करने लगता है। तभी चेट आकर गाड़ी ले आने की सूचना देता है। शकार गाड़ी को चहारदीवारी से लंघवा कर ही लाने की जिद करता है। गाड़ी आ जाने पर शकार उस पर चढ़कर भीतर बैठी हुई वसन्तसेना को देखकर घबड़ा जाता है और विट को पकड़ लेता है। बाद में विट गाड़ी पर चढ़कर उसमें बैठी हुई वसन्तसेना को देखता है। वह उससे अपनी रक्षा की प्रार्थना करती है। विट उसे सान्त्वना देता है। वह गाड़ी से नीचे उतर कर शकार से कहता है कि गाड़ी में सचमुच राक्षसी बैठी है। अतः वह शकार से पैदल ही चलने को कहता है। किन्तु वह गाड़ी से ही जाने का आग्रह करता है। तब विट बता देता है कि गाड़ी में सचमुच वसन्तसेना बैठी है। वह तुम्हारे साथ अभिसार के लिये आई है। यह सुनकर प्रसन्न होकर शकार वसन्तसेना के पैरों पर गिर जाता है। और अपनी गलतियों के लिये क्षमा मांगने लगता है। किन्तु वसन्तसेना उसे स्वीकार करने के स्थान पर पैर से मार देती है। इससे शकार क्रुद्ध हो जाता है। वह चेट से पूछता है कि उसे वसन्तसेना कहाँ से मिली? चेट गाड़ी बदल जाने की बात कहता है। शकार वसन्तसेना से उसी समय गाड़ी से उतरने को कहता है। फिर उसे उतार देता है। शकार विट को प्रलोभन देकर वसन्तसेना

भूमिका २९

को मारने की बात कहता है किन्तु विट वैसा करने से इनकार कर देता है। इसके बाद शकार चेट से वसन्तसेना को मारने के लिये कहता है और अनेक प्रलोभन देता है। तब भी चेट परलोक के भय से वसन्तसेना को मारने से इनकार कर देता है। शकार क्रुद्ध होकर उसे पीटने लगता है। फिर चेट से एकान्त में जाकर बैठने की बात कहता है। वह चला जाता है। तब शकार स्वयं ही वसन्तसेना को मारने के लिये तैयार होता है किन्तु विट उसका गला पकड़ कर गिरा देता है। शकार एक चालबाजी करता है। वह विट से कहता है कि तुम्हारे सामने वसन्तसेना मुझे चाहने में लजा रही है। अतः तुम भी जाओ और चेट को पकड़ कर लाओ। विट शकार की बात पर विश्वास कर लेता है। वह वसन्तसेना को धरोहर के रूप में शकार को सौंप कर चला जाता है। शकार वसन्तसेना को फिर से खुश करने की कोशिश करता है। किन्तु वह हर हालत में चारुदत्त की ही प्रशंसा करती रहती है। तब क्रुद्ध होकर शकार उसका गला दबा देता है। वसन्तसेना मूच्छित होकर गिर जाती है। शकार अपने पराक्रम पर बहुत खुश होता है। वह अपने को छिपाकर बैठ जाता है।

तृतीय दृश्य में चेट के साथ विट पुनः प्रवेश करता है। वह शकार से अपनी धरोहर वसन्तसेना को वापस माँगता है। शकार कहता है कि वह तुम्हारे पीछे-पीछे ही चली गयी थी। बाद में वह कहता है कि उसने वसन्तसेना को मार दिया है। ऐसा कहकर मरी पड़ी हुयी वसन्तसेना को दिखाता है। विट दुखी होकर विलाप करने लगता है। चेट उसे समझाता है। उसे यह भय हो जाता है कि शकार उस हत्या का आरोप उस पर न लगा दे। अतः वह वहाँ से चला जाता है। शकार चेट को पकड़ कर अपने घर में बन्दी बना देता है और जाने से पहले सूखे पत्तों से वसन्तसेना को ढंक देता है। इसके बाद में चारुदत्त पर हत्या का आरोप लगाने के लिये न्यायालय जाने की कहकर निकल जाता है।

चतुर्थ दृश्य में शकार के जाते समय ही एक बौद्ध भिक्षु प्रवेश करता है। वह अपने गीले चीवरखण्ड को सुखाने के लिये उपयुक्त स्थान खोजता है। इसी बीच उसे पत्तों के बीच में किसी के साँस लेने का पता लगता है। उधर कुछ होश में आकर वसन्तसेना अपना हाथ दिखलाती है। भिक्षु पत्ते हटाकर देखता है कि वही बुद्धो-पासिका है जिसने उसे जुआरियों के ऋण से मुक्त कराया था। उसका दूसरा भी हाथ देखकर उसे पूर्ण विश्वास हो जाता है। वसन्तसेना पानी माँगती है। वह अपना चीवर निचोड़ कर उसको पानी दे देता है और अपने कपड़े से हवा करने लगता है। वसन्तसेना द्वारा पूछे जाने पर वह पहले ऋणमुक्त कराये जाने की सारी

३० मृच्छकटिक

बात बता कर अपना परिचय देता है। वह पास की लता झुकाकर उसके सहारे से उठने के लिये कहता है और वहीं पास में एक बौद्ध विहार में अपनी धर्मभगिनी के पास चलने के लिये कहता है। ऐसा कहकर साथ में लेकर आश्रम की ओर चल देता है।

नवम अङ्क—

नवम अङ्क के प्रथम दृश्य में शोधनक (सफाई कर्मचारी) प्रवेश करके न्यायालय की सफाई तथा कुर्सी लगाने आदि की व्यवस्था की सूचना देता है। इसी बीच उज्ज्वलवेश धारण किये हुये शकार प्रवेश करता है। वह वसन्तसेना के हत्यारूपी अपने पाप को चारुदत्त के शिर पर मढ़ देने की बात करता है। वह न्यायाधिकारियों की प्रतीक्षा करने लगता है। उसी समय श्रेष्ठी तथा कायस्थ आदि से घिरे हुये न्यायाधीश का प्रवेश होता है। न्यायाधीश सही न्याय करने की दुष्करता बताता है। न्यायाधिकरणिक के आदेश से शोधनक प्रार्थियों को अपना मुकदमा प्रस्तुत करने के लिये सूचित करता है। सबसे पहले शकार अपना मुकदमा प्रस्तुत करना चाहता है। किन्तु पहले अस्वीकार करके पुनः इस दुष्ट के भय से इसका मुकदमा प्रस्तुत करने के लिये आदेश कर दिया जाता है। वह अपनी सफलता पर गर्व करने लगता है। वह न्यायालय में आकर कहता है कि उसने अपने पुष्पकरण्डक जीर्णोद्यान में एक मरी हुई स्त्री का शरीर देखा है। वह स्त्री वसन्तसेना है। वह कहता है कि किसी ने धन के लोभ से वसन्तसेना का गला दबाकर मार डाला है। वसन्तसेना किसके पास गयी थी—यह जानने के लिये न्यायाधिकारी पहले उसकी माता को बुलाते हैं। उसकी माता आकर बताती है कि उसकी बेटी अपने मित्र चारुदत्त के घर पर अभिसार के लिये गयी है। यह सुनकर न्यायाधिकारी चारुदत्त को भी बुलाते हैं। न्यायालय के कर्मचारी के साथ आते हुये चारुदत्त को मार्ग में अनेक अपशकुन दिखाई देते हैं जिनसे वह घबड़ा जाता है। न्यायालय में पूछे जाने पर वह बता देता है कि वसन्तसेना के साथ उसका प्रेमव्यवहार है। वह बताता है कि वसन्तसेना अपने घर गयी है। किन्तु वह यह नहीं बता पाता कि गाड़ी से गयी है या पैदल। इसी बीच अपमानित होने से क्रुद्ध वीरक न्यायालय में आता है। वह अपने कर्तव्यपालन के समय चन्दनक द्वारा किये गये अपमान की बात कहता है। वह यह भी कहता है कि चारुदत्त की गाड़ी में बैठी हुई वसन्तसेना पुष्पकरण्डक जीर्णोद्यान की ओर जा रही थी। वीरक की बात सुनकर न्यायाधिकारी पुष्पकरण्डक उद्यान में यह पता लगाने के लिये वीरक को भेजते हैं कि वहाँ कोई स्त्री मरी पड़ी है अथवा नहीं।

भूमिका ३१

इसी बीच रेभिल द्वारा यह जानकर कि चारुदत्त को न्यायालय में बुलाया गया है विदूषक चिन्तित हो जाता है। वह वसन्तसेना के गहने देने के पहले न्यायालय चल पड़ता है। वहाँ शकार के साथ उसका वाद-विवाद बढ़ जाता है। और मार पीट होने लगती है जिससे विदूषक के पास रखे हुये वसन्तसेना के गहने जमीन पर गिर पड़ते हैं। शकार घबड़ा कर उन गहनों को उठा कर दिखाता है और कहता है कि इन गहनों के कारण ही चारुदत्त ने वसन्तसेना का वध किया है।

उन गहनों को देखकर चारुदत्त यह स्वीकार करता है वे गहने वसन्तसेना के ही हैं। परन्तु वह यह नहीं बता पाता कि वे गहने वसन्तसेना से अलग कैसे हुये। गहनों को देखकर न्यायाधिकारी और अधिक चिन्तित हो जाते हैं। और चारुदत्त से सब सच-सच बोलने की कहते हैं। चारुदत्त कहता है कि मैं निष्पाप लोगों के कुल में उत्पन्न हुआ हूँ और मैं स्वयं भी निरपराध हूँ किन्तु यदि मुझ पर पाप की सम्भावना की जाती है तो मेरे निष्पाप होने से भी क्या लाभ ? वह सोचने लगता है कि वसन्तसेना से रहित उसका जीवन व्यर्थ है। न्यायाधिकारी चारुदत्त को अपराधी घोषित करके राजा 'पालक' के पास दण्डनिर्णय के लिये भेजते हैं और अपनी सम्मति देते हैं कि यह चारुदत्त ब्राह्मण है। अतः इसे मृत्युदण्ड न देकर धनसहित राज्य से बाहर कर दिया जाय। परन्तु राजा 'पालक' कठोर दण्ड की आज्ञा देता है कि इन्हीं गहनों के साथ ही इसको दक्षिणश्मशान ले जाकर शूली पर चढ़ाकर मृत्युदण्ड दे दिया जाय। जिससे कोई भी दूसरा ऐसे पाप कर्म का साहस न कर सके। दण्ड सुनकर चारुदत्त दुखी हो जाता है। वह विदूषक से कहता है कि मुझे प्रिय बेटा रोहसेन का मुख दिखा दो। वह अविवेकी राजा पालक को मृत्युदण्ड देने के लिये कोसने लगता है।

दशम अङ्क—

दशम अङ्क के प्रथम दृश्य में दो चाण्डाल चारुदत्त को वधस्थान की ओर ले जाते हुये दिखाई देते हैं। चारुदत्त को मृत्युदण्ड की वेशभूषा पहना दी गई है। मार्ग में अपार भीड़ चारुदत्त को देखने के लिये खड़ी है। चाण्डाल लोगों को हटा रहे हैं और चारुदत्त का वध न देखने का परामर्श दे रहे हैं। महलों में झरोखों से स्त्रियाँ भी दुखी होकर आंसू गिरा रही हैं। चाण्डाल चारुदत्त के कुल गोत्र का परिचय देते हुये उसके अपराध और मृत्युदण्ड की घोषणा करते हैं। उसे सुन कर चारुदत्त बहुत दुःखी हो जाता है। उसी समय विदूषक चारुदत्त के पुत्र को लेकर वहाँ आ जाता है। वह लड़का अपने पिता को देखने के लिये रोने लगता है।

३२ मृच्छकटिक

मृत्यु के समय चारुदत्त अपने पास केवल जनेऊ देखकर उसे ही पुत्र को देना चाहता है। विदूषक और चारुदत्त का पुत्र रोहसेन चारुदत्त को छोड़ने की और उसके बदले में अपने अपने वध करने की प्रार्थना करते हैं। इसी समय शकार द्वारा अपने ऊपरी महल में कैद किया गया स्थावरक चेट दिखाई देता है। वह चाण्डालों की घोषणा सुनकर चारुदत्त का वध जानकर अति दुखी है। वह चिल्ला चिल्ला कर कहता कि चारुदत्त ने वसन्तसेना का वध नहीं किया है किन्तु दूरी के कारण कोई उसकी आवाज नहीं सुन पाता है। वह अपने जीवन की अपेक्षा चारुदत्त का जीवन अधिक महत्त्वपूर्ण समझता है। अतः वह झरोखे से नीचे कूद पड़ता है। उसकी बेड़ियाँ खुल जाती हैं। वह सभी के सामने चाण्डालों से कहता है कि इस चारुदत्त ने वसन्तसेना का वध नहीं किया है अपितु मेरे स्वामी शकार ने ही किया है। और मुझे बांधकर कैद कर रखा था जिससे मैं किसी से न कह सकूं। इसी बीच कोलाहल सुनकर अपने महल में बन्दी स्थावरक चेट को न देखकर उसको खोजता हुआ शकार भीड़ में पहुँच जाता है। वह सबके सामने स्थावरक को झूठा सिद्ध करके उसे वापस ले जाता है। निराश स्थावरक चेट चारुदत्त के पैरों पर गिर पड़ता है। चाण्डाल शकार की बात सच मानकर स्थावरक को पीट कर बाहर कर देते हैं। शकार चाण्डालों से चारुदत्त को शीघ्र ही मारने के लिये कहता है। वह उसे पुत्र-सहित मारने को कहता है। किन्तु चाण्डाल उसकी बात अस्वीकार कर देते हैं। मित्रशोक में मरने के इच्छुक विदूषक को चारुदत्त मना करता है और पुत्र रोहसेन को उसकी माता के पास ले जाने के लिये कहता है। इसी बीच वे दोनों चाण्डाल, वध करने की किसकी पारी है, इसका निर्णय करने लगते हैं। और चारुदत्त को दक्षिण श्मशान का भीषण दृश्य दिखाते हैं।

दशम अङ्क के द्वितीय दृश्य में घबड़ायी हुई वसन्तसेना और भिक्षु चारुदत्त के घर की ओर जाते हुये दिखाई देते हैं। मार्ग में भारी भीड़ देखकर वसन्तसेना भिक्षु से उस भीड़ का कारण जानने के लिये कहती है। इतने में चाण्डालों की आखिरी घोषणा सुनाई देती है।

वे चारुदत्त को अतिशीघ्र ही मारने वाले प्रतीत होते हैं। यह सुनकर भिक्षु घबड़ा जाता है। और वसन्तसेना से जल्दी ही चलने को कहता है। वे दोनों अपनी पूरी शक्ति से चलकर वहाँ अति शीघ्र पहुँचने का प्रयास करते हैं। इसी बीच एक चाण्डाल चारुदत्त पर तलवार से प्रहार करता है किन्तु तलवार उसके हाथ से गिर जाती है। वह इसे अच्छा शकुन मानकर अपनी कुल देवी सह्यवासिनी से चारुदत्त की रक्षा करने की प्रार्थना करता है। दूसरा चाण्डाल राजाज्ञा का पालन

भूमिका ३३

करने को कहता है। वे दोनों चारुदत्त को शूली पर चढ़ाना चाहते हैं। यह देख कर भिक्षु और वसन्तसेना उन्हें ऐसा करने से मना करते हैं। वसन्तसेना कहती है कि मैं ही वह अभागिनी हूँ जिसके कारण आर्य चारुदत्त को मृत्युदण्ड दिया गया है। यह सुनकर उधर देखकर चाण्डाल सोंचने लगते हैं। इसी बीच में दौड़ती हुई वसन्तसेना चारुदत्त के वक्षस्थल पर गिर जाती है। और भिक्षु पैरों पर गिर जाता है। चाण्डाल हट जाते हैं। और चारुदत्त का वध न करने से प्रसन्न दिखाई देते हैं। वे राजा पालक को वसन्तसेना के जीवित होने की सूचना देने के लिए चले जाते हैं। वहाँ वसन्तसेना को जीवित देखकर शकार घबड़ा जाता है और वहाँ से भागता है। चारुदत्त वसन्तसेना को पहचान कर आनन्दमग्न हो जाता है। अचानक आयी हुई वसन्तसेना को पाकर चारुदत्त अपनी वध्य वेशभूषा को और चाण्डालों के साथ बजाये जाते हुए वाद्यों को विवाह की वेषभूषा और वाद्यों के समान समझने लगता है। भिक्षु का परिचय जान कर चारुदत्त बहुत खुश होता है।

दशम अंक के तृतीय दृश्य में शर्विलक प्रवेश करता है। वह सूचना देता है कि आभीरपुत्र 'आर्यक' ने राजा 'पालक' का वध कर दिया है। वह चारुदत्त को वसन्तसेना के साथ देखकर बहुत प्रसन्न हो जाता है। वह आर्यक का और अपना परिचय देता है। वह चारुदत्त से प्रार्थना करता है कि 'कुशवती' नगरी का राज्य स्वीकार कर लें। वह शकार को पकड़ने का आदेश देता है। सब लोग शकार को पकड़ कर लाते हैं। शर्विलक उसे मृत्युदण्ड देना चाहता है, किन्तु वह चारुदत्त की शरण में आ जाता है और उदार चारुदत्त उसे क्षमा कर देता है।

दशम अंक के चतुर्थ दृश्य में चन्दनक यह सूचना देता है कि अपने पति के मृत्युदण्ड से दुखी होकर उसकी धर्मपत्नी धूता आग में कूद कर अपना प्राण-परित्याग करने जा रही है। यह सुनते ही चारुदत्त मूर्छित हो जाता है। वसन्तसेना उसे होश में लाती है। सभी लोग धूता के पास पहुँचते हैं। वहाँ सभी के रोकने पर भी धूता आग में प्रवेश करने का प्रयास करती है। इधर शर्विलक चारुदत्त से जल्दी-जल्दी चलने को कहता है। धूता अपने पुत्र रोहसेन को समझा रही है। उसी समय चारुदत्त आकर बोलता है। उसकी आवाज पहचान कर धूता प्रसन्न हो जाती है। पुत्र अपने पिता चारुदत्त का आलिंगन करता है। विदूषक सती की महिमा का वर्णन करता है और चारुदत्त का आलिंगन करता है। धूता और वसन्तसेना भी परस्पर आलिंगन करतीं हैं। शर्विलक वसन्तसेना से कहता है कि प्रसन्न राजा आर्यक आपको 'वधू' शब्द से अलंकृत करते हैं। वसन्तसेना इस अनुग्रह से अपने

मृ० भू०-३

३४ मृच्छकटिक

को अनुगृहीत मानती है। भिक्षु को सभी विहारों का कुलपति बना दिया जाता है। स्थावरक को शकार की दासता से मुक्त करा कर स्वतन्त्र नागरिक बना दिया जाता है। दोनों चाण्डालों को सभी चाण्डालों का प्रधान बना दिया जाता है। चन्दनक को 'पृथ्वीदण्डपालक' का पद दे दिया जाता है। शकार को उसी प्रकार स्वच्छन्द विचरण करने के लिए छोड़ दिया जाता है।

भारत-वाक्य के साथ नाटक (प्रकरण) का दशम अङ्क समाप्त हो जाता है।

पात्रों का चरित्र-चित्रण

मृच्छकटिक एक जीते जागते पात्रों का सजीव चित्रण है। प्रायः प्रत्येक पात्र अपनी कुछ विशेषताओं के साथ दिखाई देता है। वह सामाजिक को भली-भाँति प्रभावित करने में पूर्णतया सफल है। इसमें पुरुष पात्रों में चारुदत्त, शकार, शर्विलक और विदूषक के अतिरिक्त विट, चेट, भिक्षुक तथा आर्यक आदि प्रधान हैं। स्त्रीपात्रों में वसन्तसेना, धूता, मदनिका तथा रदनिका प्रधान हैं। इन पात्रों की चरित्र-सम्बन्धी विशेषताओं का विवेचन यहाँ किया जा रहा है।

चारुदत्त

मृच्छकटिक में चारुदत्त को सुन्दर, युवक, परोपकारी, गुणग्राही, उदार, भावुक, पवित्रप्रेमी, सत्यवक्ता, शरणागतवत्सल, परम क्षमाशील आदि रूपों में चित्रित किया गया है। यह इस 'प्रकरण' का धीरप्रशान्त नायक है।

(१) व्यक्तित्व

उज्जयिनी नगरी के अति सम्पन्न वंश में चारुदत्त ने जन्म लिया है। उसके वंशज यद्यपि ब्राह्मण थे तथापि व्यापार के माध्यम से उन्होंने प्रचुर सम्पत्ति अर्जित की थी। अतः वे धनिकों में प्रतिष्ठित थे। परन्तु चारुदत्त एक निर्लोभ और अतिशय उदारवृत्ति का है। वह किसी को निराश नहीं करना चाहता। अतः दान देना उसका स्वाभाविक गुण बन गया है। उसका व्यक्तित्व आकर्षक है। वह जितना गुणी है उतना ही सुन्दर। द्वितीय अङ्क में संवाहक वसन्तसेना को जब चारुदत्त का परिचय देता है तो वह कहता है "यस्तादृशः प्रियदर्शनः...... (पृ० १६२)। इसी प्रकार जेल से भागा हुआ आर्यक छिपकर चारुदत्त की गाड़ी में बैठा हुआ उसके सामने पहुँच कर उसको देखता है तो उसके मुख से चारुदत्त की प्रशंसा अचानक निकल पड़ती है—"न केवलं श्रुतिरमणीयो दृष्टिरमणीयोऽपि।" (पृ० ४१८) वसन्तसेना की हत्या के आरोप में जब उसे न्यायालय में बुलाया जाता है तो न्यायाधिकारी उसकी दिव्य आकृति देखकर

भूमिका ३५

उसके द्वारा हत्यारूपी पाप कर्म होने की सम्भावना ही नहीं करते हैं—‘‘घोणोन्नतं मुखमपाङ्गविशालनेत्रम्’’। (९।१६) वहीं मुकदमें के सन्दर्भ में बुलायी गयी वसन्तसेना की माता जब चारुदत्त को देखती है तो अपनी बेटी के प्रेमसमर्पण से सन्तुष्ट हो जाती है—‘‘अयं स चारुदत्तः। सुनिक्षिप्तं खलु दारिकया यौवनम् । (पृ० ५३३ )

वह अभी यौवनसम्पन्न है। प्रथम अंक में चारुदत्त भ्रमवश जब वसन्तसेना पर चादर फेंक देता है तो वह सुगन्धित चादर सूंघकर कहती है ‘‘अनुदासीनमस्य यौवनं प्रतिभासते।’’ (पृ० ११६) आगे चारुदत्त के पुत्र रोहसेन को देखकर कहती है ‘‘अनुकृतमनेन पितू रूपम्।’’ (पृ०३७१) उसका शरीर सुकोमल भी है। न्यायालय में सत्य बोलने के लिये न्यायाधिकारी कहते हैं—

‘‘इदानीं सुकुमारेऽस्मिन् निःशंकं कर्कशाः कशाः ।। ९।३६

(२) परम उदार

वह परम उदार है। वह किसी को निराश नहीं करना चाहता। यहाँ तक कि सेंध लगाकर उसके घर में घुस आने वाले चोर का ज्ञान होने पर वह दुखी हो जाता है क्योंकि वह जानता है कि उसके घर में चुराने लायक कुछ भी नहीं है। चोर का परिश्रम व्यर्थ ही हुआ होगा—‘‘सन्धिच्छेदनखिन्न एव सुचिरं पश्चा-न्निराशो गतः।’’ (३।२३) कर्णपूरक जब मत्त हाथी को मार देता है तो उसके पराक्रम से प्रसन्न होकर उसे अंगूठी देना चाहता है किन्तु अंगुली में अंगूठी न होने से वह अपना दुपट्टा ही दे देता है। (‘‘एकेच शून्यान्याभरणस्थानानि परामृश्य ऊर्ध्वं निःश्वस्यायं ममोपरि निक्षिप्तः।’’ (पृ० १७८) पंचम अंक में चेट जब वसन्तसेना के आगमन का समाचार देता है तो वह अति प्रसन्न होकर अपना दुपट्टा दे देता है--‘‘भद्र ! न कदाचित् प्रियवचनं निष्फलीकृतम्, तद्गृह्यतां पारितोषिकम् । ( इत्युत्तरीयं प्रयच्छति । ) (पृ० ३१८)’’

(३) अतिशय दयालु--

चारुदत्त के मन में प्राणिमात्र के लिये दया है। वह किसी को कभी भी कष्ट नहीं देना चाहता है और न किसी को दुखी देखना चाहता है। इस विषय में चेट द्वारा अपने स्वामी के लिये कही गयीं बातें ध्यान देने योग्य हैं--‘‘सुजनः खलु भृत्यानुकम्पकः।’’ (३।२)

चारुदत्त अपनी आराम के लिये किसी को कष्ट देना पसन्द नहीं करता है। इसी लिये देर रात में सोती हुई रदनिका को जगाने का निषेध कर देता है।

३६ मृच्छकटिक

"अलं सुप्तजनं प्रबोधयितुम् ।" (पृ० १९१) ऊपर आराम से बैठे हुये कपोतदम्पती को विदूषक जब मारने के लिये दौड़ता है तो वह रोकता हुआ कहता है "वयस्य ! उपविश, किमनेन, तिष्ठतु दयितासहितस्तपस्वी ।" (पृ० ३१४) दूसरी परम दयालुता उस समय देखने योग्य है जब वह अपनी मृत्यु का जाल रचने वाले शकार को भी मुक्त करा देता है। (पृ० ६४०)

(४) शरणागतरक्षक--

चारुदत्त शरण में आये हुये की रक्षा करने में अपने प्राणों को भी न्यौछावर करने से नहीं डरता है। जब कारागार से भागा हुआ आर्यक छिपा हुआ उसी की गाड़ी से आकर उसके सामने आता है और कहता है--"शरणागतो गोपालप्रकृतिः आर्यकोऽस्मि" यह सुनकर चारुदत्त प्रसन्न होकर उत्तर देता है--

विधिनैवोपनीतस्त्वं चक्षुर्विषयमागतः । अपि प्राणानहं जह्यां न तु त्वां शरणागतम् ॥ ७।६ ॥

शरणागतरक्षण की पराकाष्ठा तब होती है जब षड्यन्त्र रचा कर हत्या के अभियोग में चारुदत्त को मृत्युदण्ड दिलाने वाला शकार भी उसकी शरण में आकर प्राणरक्षा की भीख मांगता है "तत्कमिदानीमशरणः शरणं व्रजामि ? भवतु तमेवाभ्युपपन्नवत्सलं गच्छामि । आर्य चारुदत्त ! परित्रायस्व, परित्रायस्य ।" चारुदत्त शकार के महापराध को भुला कर कहता है "अहह ! अभयमभयं शरणागतस्य ।" (पृ० ६३६) शर्विलक आदि उस दुष्ट शकार का वध करना चाहते हैं किन्तु चारुदत्त अपना स्वभाव नहीं छोड़ता है। वह कहता है--

शत्रुः कृतापराधः शरणमुपेत्य पादयोः पतितः । शरेण न हन्तव्यः उपकारहस्तस्तु कर्तव्यः ॥१०।५५

वह शकार को मुक्त करा देता है।

(५) सत्यवक्ता

चारुदत्त सत्यभाषण का प्रेमी है। वह हर परिस्थिति में सत्य ही बोलना चाहता है। जब वसन्तसेना के आभूषणों की चोरी हो जाती है और चारुदत्त को इसकी सूचना दी जाती है तब चिन्तित चारुदत्त से विदूषक यह कहता है कि थोड़ा झूठ बोलकर इस कष्ट से बचा जा सकता है। इस पर चारुदत्त उत्तर देता है--"अहमिदानीमनृतमभिधास्ये।"

भैक्ष्येणाप्यर्जयिष्यामि पुनर्न्यास-प्रतिक्रियाम् । अनृतं नाभिधास्यामि चारित्रभ्रंशकारकम् ॥३।२६