मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका
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लेकर फिर चला जाता है। इसी बीच शकार का गाड़ीवान स्थावरक चेट शकार की गाड़ी चारुदत्त के दरवाजा के पास खड़ी कर देता है और आगे एक गाड़ीवान की सहायता करने के लिये चला जाता है। इधर तैयार होकर आई वसन्तसेना भ्रमवश उसी गाड़ी में बैठ जाती है। वापस आकर स्थावरक गाड़ी लेकर चल देता है। उधर कारागार से बन्धन तुड़ाकर भागा हुआ गोपालपुत्र आर्यक वहाँ मार्ग में घूमने लगता है। अपनी रक्षा के लिये वह चारुदत्त की वाटिका में घुस जाता है। घर से बिछावन लेकर वापस आया हुआ वर्धमानक चारुदत्त की गाड़ी वहाँ पक्षद्वार में खड़ी कर देता है। आर्यक छिप कर उस गाड़ी में बैठ जाता है। वर्धमानक यह समझता है कि वसन्तसेना आकर बैठ गयी है। अतः वह गाड़ी लेकर पुष्पकरण्डक जीर्णोद्यान की ओर चल पड़ता है।
चतुर्थ दृश्य में राजा के सेनाधिकारी वीरक और चन्दनक वर्धमानक से गाड़ी रोकने को कहते हैं। उसके भीतर छिपा हुआ आर्यक बैठा है। आपसी वाद-विवाद के बाद पहले चन्दनक चढ़ कर गाड़ी देखता है। आर्यक उससे आत्मरक्षा की प्रार्थना करता है। वह अभयदान दे देता है। गाड़ी से उतर कर वह वीरक से कहता है कि इसमें वसन्तसेना बैठी हुई चारुदत्त के पास जीर्ण पुष्पकरण्डक उद्यान में जा रही है। किन्तु उसके बोलने में कुछ घबड़ाहट दिखाई देने से वीरक को उसकी बात में सन्देह हो जाता है। वह स्वयं भी गाड़ी देखने का आग्रह करता है। इस बात को लेकर उन दोनों कुछ गरमागरमी हो जाती है। वीरक जैसे ही गाड़ी पर चढ़ता है, चन्दनक उसे खींचकर अपने पैर से मार देता है। वह वसन्तसेना के रूप में छिपे हुये आर्यक को आत्मरक्षार्थ तलवार दे देता है। और गाड़ीवान से कहता है कि किसी के पूछने पर कह देना कि वीरक और चन्दनक गाड़ी देख चुके हैं। वर्धमानक गाड़ी चला देता है। गाड़ी से आगे जाता हुआ आर्यक राजा बनने के समय चन्दनक को याद रखने का वादा करता है।
सप्तम अङ्क—
सप्तम अङ्क के प्रथम दृश्य में चारुदत्त और विदूषक वसन्तसेना की गाड़ी की प्रतीक्षा करते हुये दिखाई देते हैं। गाड़ी आने में होने वाले विलम्ब के लिये अनेक तर्क-वितर्क करते हैं। उसी समय छिपकर बैठे हुये आर्यक को लाने वाली गाड़ी की आवाज सुनाई देती है। आर्यक चारुदत्त की प्रशंसा सुन चुका है। अतः अब वह उसके दर्शन करके ही भागना चाहता है। जब गाड़ी आ जाती है तो चारुदत्त विदूषक से वसन्तसेना को गाड़ी से उतारने के लिये कहता है। विदूषक गाड़ी में चढ़कर उसमें बैठे आर्यक को देख कर डर जाता है। तब चारुदत्त स्वयं