मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ मृच्छकटिक
उसके बदले में आप यह स्वर्णभाण्ड ले लीजिये। चारुदत्त और विदूषक उस स्वर्ण-भाण्ड को देखकर बड़े आश्चर्य में पड़ जाते हैं। इसके बाद चेटी विदूषक के कान में स्वर्णभाण्ड प्राप्त होने की सारी कथा सुना देती है। विदूषक सुनकर खुश होता है और चारुदत्त से भी कह देता है। सभी लोग प्रसन्न हो जाते हैं। उसी समय वर्षा होने लगती है। विदूषक वर्षा की निन्दा करता है किन्तु चारुदत्त प्रशंसा करता है। वह और वसन्तसेना प्रेमलीला में लीन हो जाते हैं। वर्षा के अधिक तेज हो जाने पर वे दोनों भीतर चले जाते हैं और वसन्तसेना वह रात वहीं बिताती है।
षष्ठ अङ्क—
षष्ठ अंक के प्रथम दृश्य में सोती हुयी वसन्तसेना को जगाती हुई चेटी प्रवेश करती है। जागने पर उसे बताती है कि आर्य चारुदत्त जीर्णोद्यान में गये हैं और यह आदेश दे गये हैं कि रात में ही गाड़ी तैयार रखी जाय। प्रातः होते ही वसन्तसेना को भी जीर्णोद्यान पहुँचा दिया जाय। यह सुनकर वसन्तसेना बहुत खुश हो जाती है। वह अपने को चारुदत्त के महल में पाकर चकित है। वह चेटी द्वारा रत्नावली चारुदत्त की पत्नी धूता के पास वापस भेजती है। और कहती है कि मैं श्रीमान् चारुदत्त की गुणनिर्र्जिता दासी हूँ अतः आपकी भी। अतः यह रत्नावली आप के ही कण्ठ की शोभा बढ़ाये। किन्तु धूता उसे वापस नहीं लेती है और कहती है कि आर्यपुत्र ही मेरे सबसे बड़े आभूषण हैं। अतः उनके द्वारा दी गयी रत्नावली आप अपने ही पास रखिये।
द्वितीय दृश्य में रदनिका चारुदत्त के पुत्र रोहसेन को गोद में लेकर प्रवेश करती है। वह सोने की गाड़ी से खेलने की जिद करता है। रदनिका मिट्टी की गाड़ी बनाकर देती है। [ इसी मृत्शकटिका (= मिट्टी की गाड़ी ) के नाम पर इस 'प्रकरण' का नाम रखा गया है।] वह बालक मिट्टी की गाड़ी लेने से इनकार करता है। सोने की गाड़ी के लिये रोने लगता है। वह उसे लेकर वसन्तसेना के पास जाती है। वसन्तसेना उसे चारुदत्त का पुत्र जानकर प्रेम प्रदर्शित करती हुई रोने का कारण पूछती है। उसकी भोली-भाली बातों से वसन्तसेना का हृदय प्रेम से उमड़ पड़ता है। वह बच्चे को सोने की गाड़ी बनवाने के लिये अपने सभी गहने उतार कर दे देती है।
तृतीय दृश्य में चारुदत्त का गाड़ीवान वर्धमानक गाड़ी लेकर आता है। रदनिका गाड़ी आने की सूचना वसन्तसेना को देती है। वह स्वयं को सजाने तक के लिये गाड़ीवान को प्रतीक्षा करने के लिये कहती है। गाड़ीवान को अचानक याद आता है कि वह गाड़ी का बिछावन भूल आया है। उसे लेने के लिये वह गाड़ी