भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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२० मृच्छकटिक

लिये ब्राह्मण को निमन्त्रित करने के विचार से चल पड़ता है। वह उज्जयिनी-वासियों की सम्पन्नता और अपनी निर्धनता से चिन्तित है कि उसके यहाँ भोजन करने के लिये किसी भी ब्राह्मण का तैयार होना कठिन है। उस समय अकस्मात् उसे आता हुआ मैत्रेय दिखाई देता है किन्तु उसके घर भोजन के लिये मैत्रेय किसी भी प्रकार नहीं तैयार होता है। दुःखी होकर सूत्रधार दूसरे ब्राह्मण की खोज में निकल जाता है। और इस प्रकार रंगमंच पर मैत्रेय के आने की सूचना के साथ प्रस्तावना समाप्त हो जाती है।

प्रथम अङ्कः—

प्रथम अंक के प्रथम दृश्य में मैत्रेय (विदूषक) रंगमंच पर आता है। वह चारुदत्त की बीती हुई सम्पन्नता और वर्तमान अतिनिर्धनता को याद करके दुखी हो जाता है। वह प्रिय मित्र जूर्णवृद्ध द्वारा दिया गया जातीकुसुमवासित दुपट्टा देने के लिये चारुदत्त के पास जाता है। चारुदत्त अपने घर की दशा देखकर दुखी होकर बैठा है। विदूषक को आया देखकर चारुदत्त उसका स्वागत करता है। विदूषक वह दुपट्टा उसे दे देता है। चारुदत्त अपनी निर्धनता के कारण लोगों के परिवर्तित व्यवहार को देखकर बहुत दुःख प्रकट करता है। वह विदूषक को मातृदेवियों के लिये बलि समर्पित करने को कहता है। किन्तु वह जाने से कतराता है। तब चारुदत्त उसे वहाँ ठहरने के लिये कह कर समाधि सम्पन्न करने लगता है।

दूसरे दृश्य में वसन्तसेना का पीछा करते हुये विट, चेट और शकार का प्रवेश होता है। वसन्तसेना भागती है। ये तीनों उसका पीछा करते हैं। तेज चलने से वह आगे निकल जाती है उसके परिजन पीछे छूट जाते हैं। शकार ( राजा का शाला ) उससे अपना प्रेम प्रकट करता है और वसन्तसेना से प्रेम के लिए आग्रह करता है। विट भी वसन्तसेना को समझाता है किन्तु वह किसी भी तरह उसे नहीं चाहती है। मूर्खता से शकार यह कह देता है कि चारुदत्त का घर समीप में ही है। यह सुनकर वसन्तसेना खुश होकर अन्धकार में गायब हो जाती है। वह चारुदत्त के घर के पास पहुँचती है। वहाँ दरवाजा बन्द है।

तृतीय दृश्य में पुनः चारुदत्त और विदूषक सामने आते हैं। चारुदत्त जप समाप्त करके पुनः विदूषक को बलि देने के लिये कहता है। उसका इनकार सुन कर चारुदत्त बहुत दुखी होता है। तब विदूषक रदनिका के साथ जाने के लिये राजी होता है। विदूषक दरवाजा खोलता है। बाहर खड़ी वसन्तसेना अपने आंचल से दीप बुझा देती है। विदूषक रदनिका से बाहर चलने को कहता है और स्वयं दीप जलाने के लिये अन्दर चला जाता है। अवसर का लाभ उठाकर वसन्तसेना भीतर

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