भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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भूमिका १६

है। वह नायक धीरप्रशान्त होता है तथा विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म, अर्थ तथा काम में परायण होता है। प्रकरण की नायिका कुलस्त्री या वेश्या होती है। कभी-कहीं दोनों नायिकायें होती हैं। इस प्रकार नायिकाभेद से इसके भी तीन भेद बन जाते हैं। इसमें धूर्त, विट और चेट आदि रहते हैं। यह प्रकरण नाटक का ही परिवर्तित रूप है। अतः सन्धि, प्रवेशक इत्यादि शेष बातें नाटक के समान ही होती हैं।

**मृच्छकटिक में समन्वयः—**प्रस्तुत प्रकरण का कथानक लोकाश्रित है। इसमें कवि की कल्पना अधिक है। इसका मुख्य रस शृङ्गार है। करुण, हास्य, बीभत्स रस अङ्ग रस के रूप में हैं। इसका नायक चारुदत्त ब्राह्मण है। वह अति दरिद्र होने पर भी धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि में लगा रहता है। इसमें दो नायिकायें हैं—वेश्या (वसन्त्तसेना) और कुलस्त्री (धर्मपत्नी धूता)। इसलिए यह तीसरा भेद है। यहाँ धूर्त, द्यूतकर, विट, चेट आदि भी हैं। इस कारण यह 'संकीर्ण प्रकरण' समझना चाहिये।

यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि 'मृच्छकटिक' में लक्षणग्रन्थों के सभी नियम पूरी तरह लागू नहीं होते हैं। कारण स्पष्ट है कि इसकी रचना के समय तक ये नियम मान्यताप्राप्त रूप नहीं ले सके होंगे। सामान्यतया नायक या नायिका के नाम पर ही इस प्रकरण का नाम होना चाहिये था। परन्तु ऐसा नहीं है। यहाँ षष्ठ अंक की घटना को ही महत्त्व दिया गया है। इसके प्रत्येक अंक में नायक 'चारुदत्त' की उपस्थिति नहीं है। नाट्यशास्त्र और दशरूपक के अनुसार कुलस्त्री और वेश्या एक साथ रंगमंच पर नहीं आनी चाहिये, परन्तु इसमें ऐसा नहीं है। दशम अंक में दोनों आमने सामने आती हैं और एक दूसरे का स्वागत करती हैं। परस्पर मिलती हैं। ऐसी ही कुछ और भी अनियमिततायें हैं। फिर भी, विद्वानों का मत है कि मृच्छकटिक को छोड़कर संकीर्ण-प्रकरण का दूसरा अच्छा उदाहरण मिलना कठिन है।

मृच्छकटिक का संक्षिप्त कथानक

**प्रस्तावना—**मृच्छकटिक एक 'प्रकरण' है। इसका प्रारम्भ नान्दी-पाठ के बाद प्रस्तावना से होता है। चिरकाल तक संगीत का अभ्यास करने से क्षुधार्त्त सूत्रधार अपने घर पहुँचकर वहाँ होने वाली अभूतपूर्व तैयारी देख कर आश्चर्यचकित हो जाता है। इसका रहस्य जानने के लिये वह अपनी पत्नी से पूछता है। वह उसे 'अभिरूपपति' नामक व्रत के अनुष्ठान की तैयारी बताती है। इसे सुनकर वह क्रुद्ध हो जाता है। परन्तु वस्तुस्थिति जानकर बह भी उस अनुष्ठान में सहयोग देने के

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