मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ मृच्छकटिक
गाड़ियों की घटना आगामी प्रवहणविपर्यय की घटना को सूचित करती है जो इस प्रकार की एक अति महत्त्वपूर्ण घटना है। (३) भासकृत 'चारुदत्त' नाटक 'मृच्छकटिक' का मूल स्रोत है। इस समय उसमें केवल चार अंक ही मिलते हैं। वसन्तसेना चारुदत्त से मिलने के लिये उद्यत है—इतनी कथा से ही नाटक समाप्त हो जाता है। कुछ विद्वानों के अनुसार यह नाटक अपूर्ण है। इसमें कम से कम एक अंक और रहा होगा। इसकी कथा मृच्छकटिक के पंचम अंक तक की कथा के बराबर रही होगी। यदि यह स्थिति मान ली जाय तो कहा जा सकता है कि इससे आगे की कथा शूद्रक द्वारा कल्पित है। षष्ठ अंक में ही मिट्टी की गाड़ी वाली घटना आती है। इसलिये कवि ने अपनी कल्पना के आरम्भ को प्रकट करने की अभिलाषा से इस घटना के नाम पर ही 'प्रकरण' का नाम रख दिया।
अब एक ही प्रश्न है लक्षणग्रन्थों से विरोध? इसका सीधा समाधान यह है कि नाटकादि के जो भी लक्षण बनाये गये हैं वे इनकी रचना को देखकर ही बाद में बनाये गये। सम्भव है मृच्छकटिक की ओर इन लक्षणकारों की दृष्टि न गयी हो। अतः इस प्रकरण का नाम 'मृच्छकटिकम्' उचित प्रतीत होता है। नायक या नायिका का नाम आधार बनाने पर श्रोता को अधिक उत्कण्ठा नहीं हो पाती, क्योंकि पहले से ही 'चारुदत्त' नाटक प्रसिद्ध था। अतः प्रस्तुत नाम की कल्पना उचित है।
मृच्छकटिक एक प्रकरण (रूपकविशेष) है :—
पहले रूपक के दश भेद लिखे जा चुके हैं। इनमें 'नाटक' के बाद 'प्रकरण' आता है। मृच्छकटिक भी एक प्रकरण है। प्रकरण के लक्षण साहित्यदर्पण में इस प्रकार हैं—
'भवेत् प्रकरणे वृत्तं लौकिकं कविकल्पितम्।
शृङ्गारोऽङ्गी नायकस्तु विप्रोऽमात्योऽथवा वणिक् ॥
सापायधर्मकामार्थपरो धीरप्रशान्तकः ।
नायिका कुलजा क्वापि, वेश्या, क्वापि द्वयं क्वचित् ।।
तेन भेदास्त्रयस्तस्य तत्र भेदस्तृतीयकः ।
कितवद्यूतकारादि - विट - चेटक - संकुलः ॥
[ अस्य नाटकप्रकृतित्वात् शेषं नाटकवत् ...... । ]¹
रूपकों में 'प्रकरण' का वृत्त (कथानक) लौकिक तथा कविकल्पित होता है। शृङ्गार मुख्य रस होता है, ब्राह्मण, अमात्य या वणिक् में से कोई एक नायक होता
१. साहित्यदर्पण ६।२४१-४३