भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 34

भूमिका २१

चली आती है। इधर उसको खोजते हुये शकार आदि भी वहीं पहुँच जाते हैं। शकार अंधेरे में खड़ी रदनिका को ही वसन्तसेना समझकर उसके बाल पकड़ लेता है। वह प्रतिवाद करती है। इसी बीच दीप लेकर विदूषक आ जाता है। रदनिका के अपमान से वह बहुत नाराज होता है किन्तु विट द्वारा सारी स्थिति बताने और प्रार्थना करने पर शान्त हो जाता है। विट वहाँ से चलने के लिए कहता है। किन्तु शकार वसन्तसेना को लिए बिना नहीं जाना चाहता है। कुछ देर बाद वह चारुदत्त को धमकी देकर वापस चला जाता है। विदूषक रदनिका को समझा बुझा कर भीतर ले जाता है।

प्रथम अंक के चतुर्थ दृश्य में चारुदत्त वसन्तसेना को रदनिका समझ लेता है और पुत्र रोहसेन को भीतर ले जाने के लिए उससे कहता है। वह पुत्र को ठंड से बचाने के लिये दुपट्टा ओढ़ने के लिए देता है। उसकी पुष्पगन्ध सूंघकर वसन्तसेना प्रसन्न हो जाती है। वह अभी भी उसके यौवन के प्रभाव को समझती है। वह चुपचाप खड़ी रहती है। अपने आदेश का पालन न होते देखकर चारुदत्त पुनः अपनी निर्धनता के लिये दुःखी होने लगता है। इतने में विदूषक और रदनिका वहाँ आ जाते हैं। तब वसन्तसेना की सारी घटना चारुदत्त को मालूम हो जाती है। वे दोनों परस्पर क्षमायाचना करने लगते हैं। वसन्तसेना अपने सारे गहनें उसके पास धरोहर के रूप में रख देती है। चारुदत्त और विदूषक दोनों वसन्तसेना को उसके घर छोड़ कर वापस लौटते हैं। चारुदत्त उस सुवर्ण-भाण्ड की रक्षा का भार दिन में वर्धमानक पर और रात में विदूषक पर डाल देता है।

द्वितीय अङ्क -

द्वितीय अङ्क के प्रथम दृश्य में वसन्तसेना और मदनिका रंगमंच पर आती हैं। एक चेटी वसन्तसेना की माता का आदेश लेकर वसन्तसेना से स्नान और पूजन करने के लिये कहती है। किन्तु वह इनकार कर देती है। वह चेटी वापस चली जाती है। मदनिका वसन्तसेना की उदासी देखकर इसका कारण पूछती है। वह चारुदत्त के प्रति अपने प्रेम का रहस्य प्रकट कर देती है। जब मदनिका चारुदत्त की अति निर्धनता कहती है तो वह अपना निर्लोभ प्रेम और रमणेच्छा प्रकट करती है।

द्वितीय अंक के दूसरे दृश्य में जूये में हारा हुआ संवाहक रंगमंच पर आता है। वह जुये की खूब निन्दा करता है और अपनी रक्षा के लिये मूर्तिरहित मन्दिर में जाकर देवता के समान निश्चल होकर खड़ा हो जाता है। उसको खोजते हुये सभिक माथुर और द्यूतकर भी वहीं पहुँच जाते हैं। वे अपनी हानि के लिये चिल्लाते

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक) · पृष्ठ 34, कुल 760 में से · BharatKosha