भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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२२ मृच्छकटिक

हुये उसी मन्दिर में घुस कर फिर जुआ खेलने लगते हैं। जुआ देखकर संवाहक अपनी इच्छा नहीं रोक पाता है और अचानक खेलने आ जाता है। वे दोनों उसे पकड़ लेते हैं और अपनी उधार दी गयीं दश सुवर्ण-मुद्रायें माँगते हैं। न देने पर पीटने लगते हैं। तब संवाहक अपने को बेचकर ऋण चुकाना चाहता है। इसी बीच दर्दुरक आ जाता है। वह संवाहक का पक्ष लेता है। माथुर और दर्दुरक में झगड़ा होता है। मौका देखकर दर्दुरक माथुर की आँखों में धूल झोंक कर संवाहक से भागने का इशारा करता है। जब तक माथुर आँखों से धूल निकालता है तब तक वे दोनों भाग जाते हैं।

द्वितीय अंक के तीसरे दृश्य में माथुर और द्यूतकर के भय से भागा हुआ संवाहक वसन्तसेना के घर पहुँच जाता है। उसका पीछा करते हुये वे दोनों भी वहाँ पहुँच जाते हैं। संवाहक वसन्तसेना को अपना परिचय देकर अपने को चारुदत्त का पुराना सेवक (संवाहक) बताता है। इससे वसन्तसेना प्रसन्न होकर उसके भय का कारण पूछती है। वह जुये में हार और कर्ज की घटना बता देता है। सारी बातें सुन कर वसन्तसेना अपनी सेविका द्वारा आभूषण भेजकर उन दोनों को दिला देती है जिससे वे प्रसन्न होकर वापस चले जाते हैं। किन्तु जुये में हारने के कारण हुये अपमान की ग्लानि से वह संवाहक बौद्ध संन्यासी बनना चाहता है। वसन्तसेना द्वारा मना किये जाने पर भी वह अपना निश्चय नहीं बदलता है और संन्यासी बनने के लिये चला जाता है।

द्वितीय अंक के चौथे दृश्य में कर्णपूरक प्रवेश करता है। वह वसन्तसेना से उसके खुण्डमोटक नामक मतवाले हाथी के उपद्रव और उससे परिव्राजक को बचाने के लिये किये गये अपने पराक्रम की चर्चा करता है। वह भीड़ में खड़े हुये किसी व्यक्ति (चारुदत्त) द्वारा दिये गये दुपट्टा को दिखाता है। वसन्तसेना पहचान कर उसे ओढ़ लेती है और कर्णपूरक को पुरस्कार में आभूषण दे देती है। कर्णपूरक खुश होकर चला जाता है। उसके मुख से चारुदत्त के जाने की बात सुनकर वह सेविका के साथ ऊपर छत पर चढ़ कर चारुदत्त को देखने के लिये चली जाती है।

तृतीय अङ्क—

तृतीय अंक के प्रथम दृश्य में चारुदत्त का चेट रंगमंच पर आता है। आधी रात बीत चुकी है। संगीत का आनन्द उठाने के लिये गया हुआ चारुदत्त अभी तक वापस नहीं आया है। चेट स्वाभाविक दोष की निन्दा करके सोने के लिये चला जाता है।