भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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भूमिका २३

तृतीय अंक के दूसरे दृश्य में चारुदत्त और विदूषक रंगमंच पर आते हैं। वे रेभिल का गाना सुनकर वापस लौटते हैं। चारुदत्त रेभिल के संगीत की प्रशंसा करता है। किन्तु विदूषक को अच्छा नहीं लगता है। वह शीघ्र ही घर चलने को कहता है। दोनों घर पहुँच कर वर्धमानक को बुलाते हैं। वह दरवाजा खोलता है। वे दोनों भीतर प्रवेश करते हैं। पैर धोने के प्रश्न पर विदूषक और वर्धमानक में कुछ विवाद होता है। चारुदत्त और विदूषक पैर धोकर सोने की तैयारी करते हैं। चेट कहता है कि रात में स्वर्णभाण्ड की रखवाली विदूषक को करनी है। अतः उसे सौंप देता है। स्वर्णभाण्ड लेकर मैत्रेय और चारुदत्त सोने लगते हैं।

तृतीय अंक के तीसरे दृश्य में शर्विलक प्रवेश करता है। वह चौर्यकला में अपनी निपुणता की प्रशंसा करता है। वह सेंध काट कर चारुदत्त के घर में प्रविष्ट हो जाता है। विदूषक स्वर्णभाण्ड की रक्षा की दुश्चिन्ता में परेशान है। वह स्वप्न में बड़बड़ाता है और चोरी हो जाने के भय से वह स्वर्णभाण्ड चारुदत्त को देना चाहता है। किन्तु शर्विलक चोर उस स्वर्णभाण्ड को ले लेता है। वापस निकलते समय अचानक रदनिका आ जाती है। वह वर्धमानक को न देखकर विदूषक को बुलाने के लिये जाती है। शर्विलक उसे मारना चाहता है किन्तु स्त्री समझकर उसे छोड़ कर घर से बाहर हो जाता है। रदनिका शोर मचाती है। विदूषक और चारुदत्त जागते हैं। चारुदत्त उस कलात्मक सेंध को देख कर उसकी प्रशंसा करता है। विदूषक स्वप्न में चारुदत्त को दिये गये स्वर्णभाण्ड की चर्चा करके अपनी बुद्धिमानी बताता है। सुनकर चारुदत्त प्रतिवाद नहीं करता है क्योंकि उसे यह जानकर सन्तोष है कि परिश्रम करके घर में घुसनेवाला चोर खाली हाथ नहीं गया है। किन्तु जब उसे यह स्मरण कराया गया कि वह स्वर्णभाण्ड तो वसन्तसेना की धरोहर है तो वह मूर्च्छित होकर गिर जाता है। वह होश में आकर सोचता है कि लोग घटना की सत्यता पर विश्वास नहीं करेंगे क्योंकि वह निर्धन है। वह दुखी हो जाता है। इस घटना की जानकारी उसकी धर्मपत्नी धूता को होती है। वह भी बहुत दुखी हो जाती है। अपने पति को लोकापवाद से बचाने के लिये वह अपने मातृगृह से प्राप्त कीमती रत्नमाला विदूषक को दे देती है। विदूषक चारुदत्त के पास ले जाता है और वसन्तसेना को देने के लिये रोकता है। परन्तु चारुदत्त अपनी प्रतिष्ठा सुरक्षित रखने के लिये वह रत्नमाला वसन्तसेना के पास भेज ही देता है। वह चोरी की घटना की निन्दा बचाने के लिये वर्धमानक से सेन्ध बन्द करने के लिये कहता है और स्नानादि करके सन्ध्या-वन्दनादि के लिये चला जाता है।