भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 37

२४ मृच्छकटिक

चतुर्थ अङ्क—

चतुर्थ अङ्क के प्रथम दृश्य में वसन्तसेना और मदनिका चारुदत्त का चित्र देखती हुईं प्रवेश करतीं हैं। उसी समय एक चेटी वसन्तसेना की माता का आदेश देती है कि राजश्यालक संस्थानक द्वारा भिजवायी गयी गाड़ी वसन्तसेना को लेने आयी है। उसने दश सहस्र स्वर्णमुद्रायें भी भेजीं हैं। राजश्यालक (शकार) का नाम सुनते ही वसन्तसेना अतिक्रुद्ध हो जाती है और उस समय तथा आगे कभी भी जाने से इनकार कर देती है।

चतुर्थ अंक के द्वितीय दृश्य में सबसे पहले शर्विलक प्रविष्ट होता है। वह अपने चौर्यव्यवसाय की चर्चा करता हुआ मदनिका को छुड़वाने के लिये वसन्तसेना के घर की ओर चल पड़ता है। उधर वसन्तसेना चारुदत्त का चित्र अपने शयनकक्ष में रखने के लिये मदनिका को भेजती है। इसी बीच में शर्विलक भी वहाँ पहुँच जाता है और शयनकक्ष की ओर जाती हुई मदनिका से उसकी भेंट हो जाती है। वह शंकित होता हुआ चुराये गये गहने मदनिका को देता है। उन्हें देखकर मदनिका आश्चर्य में पड़ जाती है। पूछे जाने पर शर्विलक उन गहनों को चारुदत्त के घर से चुराने की बात कहता है। मदनिका गहनों को पहचान लेती है। वह उन्हें वापस लौटाने को कहती है। किन्तु शर्विलक अपनी असमर्थता व्यक्त करता है। तब मदनिका चारुदत्त का सम्बन्धी बनकर वसन्तसेना को देने की बात कहती है। कुछ देर विवाद करने के बाद शर्विलक वसन्तसेना को गहनें देने के लिये तैयार हो जाता है। यह सारी घटना छिपकर बैठी हुई वसन्तसेना सुन लेती है। वह चारुदत्त के शरीर को किसी प्रकार की हानि न होने की बात जानकर प्रसन्न है। मदनिका वसन्तसेना के पास जाकर यह खबर देती है कि चारुदत्त का कोई सम्बन्धी आया है। मुस्कुराकर वसन्तसेना भीतर आने के लिये कह देती है। शर्विलक भीतर जाकर वसन्तसेना के सामने मदनिका को सारे गहने सौंप देता है। रहस्य जानने वाली वसन्तसेना अपनी वाक्पटुता से शर्विलक को मूक बनाकर मदनिका को वधू बनाकर उसे सौंप देती हैं। वह अपनी गाड़ी में बैठाकर भेजती है। मदनिका रोकर वसन्तसेना के प्रति कृतज्ञता प्रकट करती है। प्रणाम करके गाड़ी पर बैठ जाती है।

चतुर्थ अंक के तीसरे दृश्य में नेपथ्य में यह घोषणा होती है कि भयभीत राजा पालक ने गोपालपुत्र आर्यक को उसके घर से पकड़वा कर घोर जेलखाने में बन्द करा दिया है। यह सुनकर शर्विलक को अपने मित्र की दुःखद स्थिति जानकर बहुत कष्ट होता है। वह अपने मित्र की रक्षा के लिये व्यग्र हो जाता है। मदनिका