भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

२४ मृच्छकटिक

चतुर्थ अङ्क—

चतुर्थ अङ्क के प्रथम दृश्य में वसन्तसेना और मदनिका चारुदत्त का चित्र देखती हुईं प्रवेश करतीं हैं। उसी समय एक चेटी वसन्तसेना की माता का आदेश देती है कि राजश्यालक संस्थानक द्वारा भिजवायी गयी गाड़ी वसन्तसेना को लेने आयी है। उसने दश सहस्र स्वर्णमुद्रायें भी भेजीं हैं। राजश्यालक (शकार) का नाम सुनते ही वसन्तसेना अतिक्रुद्ध हो जाती है और उस समय तथा आगे कभी भी जाने से इनकार कर देती है।

चतुर्थ अंक के द्वितीय दृश्य में सबसे पहले शर्विलक प्रविष्ट होता है। वह अपने चौर्यव्यवसाय की चर्चा करता हुआ मदनिका को छुड़वाने के लिये वसन्तसेना के घर की ओर चल पड़ता है। उधर वसन्तसेना चारुदत्त का चित्र अपने शयनकक्ष में रखने के लिये मदनिका को भेजती है। इसी बीच में शर्विलक भी वहाँ पहुँच जाता है और शयनकक्ष की ओर जाती हुई मदनिका से उसकी भेंट हो जाती है। वह शंकित होता हुआ चुराये गये गहने मदनिका को देता है। उन्हें देखकर मदनिका आश्चर्य में पड़ जाती है। पूछे जाने पर शर्विलक उन गहनों को चारुदत्त के घर से चुराने की बात कहता है। मदनिका गहनों को पहचान लेती है। वह उन्हें वापस लौटाने को कहती है। किन्तु शर्विलक अपनी असमर्थता व्यक्त करता है। तब मदनिका चारुदत्त का सम्बन्धी बनकर वसन्तसेना को देने की बात कहती है। कुछ देर विवाद करने के बाद शर्विलक वसन्तसेना को गहनें देने के लिये तैयार हो जाता है। यह सारी घटना छिपकर बैठी हुई वसन्तसेना सुन लेती है। वह चारुदत्त के शरीर को किसी प्रकार की हानि न होने की बात जानकर प्रसन्न है। मदनिका वसन्तसेना के पास जाकर यह खबर देती है कि चारुदत्त का कोई सम्बन्धी आया है। मुस्कुराकर वसन्तसेना भीतर आने के लिये कह देती है। शर्विलक भीतर जाकर वसन्तसेना के सामने मदनिका को सारे गहने सौंप देता है। रहस्य जानने वाली वसन्तसेना अपनी वाक्पटुता से शर्विलक को मूक बनाकर मदनिका को वधू बनाकर उसे सौंप देती हैं। वह अपनी गाड़ी में बैठाकर भेजती है। मदनिका रोकर वसन्तसेना के प्रति कृतज्ञता प्रकट करती है। प्रणाम करके गाड़ी पर बैठ जाती है।

चतुर्थ अंक के तीसरे दृश्य में नेपथ्य में यह घोषणा होती है कि भयभीत राजा पालक ने गोपालपुत्र आर्यक को उसके घर से पकड़वा कर घोर जेलखाने में बन्द करा दिया है। यह सुनकर शर्विलक को अपने मित्र की दुःखद स्थिति जानकर बहुत कष्ट होता है। वह अपने मित्र की रक्षा के लिये व्यग्र हो जाता है। मदनिका

भूमिका २५

उसकी नवपत्नी होने पर भी बाधक नहीं बनती है। अतः शर्विलक गाड़ीवान को समझाकर चेट के साथ मदनिका को सार्थवाह रेभिल के घर भेज देता है और स्वयं अपने मित्र को छुड़ाने के लिये चल पड़ता है।

चतुर्थ अंक के चौथे दृश्य में एक चेटी वसन्तसेना को यह समाचार देती है कि चारुदत्त के पास से एक ब्राह्मण आया है। यह सुनकर प्रसन्न होकर वसन्तसेना उसे शीघ्र ही भीतर लाने की अनुमति दे देती है। चेटी विदूषक को लेकर वसन्तसेना के पास जाती है। मार्ग में आठ प्रकोष्ठों को देखकर उनकी महिमा कहता हुआ विदूषक प्रसन्न होता है। वसन्तसेना के पास पहुँचकर विदूषक यह कहता है कि आपके गहने अपने मानकर आर्य चारुदत्त जुये में हार गये हैं। अतः उनके बदले में यह रत्नमाला भेजी है, आप इसे ले लीजिये। वसन्तसेना रत्नमाला लेकर विदूषक को वापस भेजती है और सायंकाल चारुदत्त से मिलने का सन्देश देती है। रत्नमाला ले लेने से विदूषक नाराज होकर चला जाता है। वसन्तसेना भी चारुदत्त से मिलने के लिये चल पड़ती है।

पञ्चम अङ्क

पंचम अंक के प्रथम दृश्य में उत्कण्ठित चारुदत्त के पास आकर विदूषक उससे कहता है कि वसन्तसेना ने रत्नावली स्वीकार कर ली है और सायंकाल उससे मिलने के लिये आने वाली है। वसन्तसेना द्वारा उसका अपेक्षित सम्मान न होने से और बहुमूल्य रत्नावली स्वीकार कर लेने के कारण विदूषक उस वेश्या से सम्पर्क समाप्त करने पर जोर देता है।

पंचम अंक के द्वितीय दृश्य में चेट आकर वसन्तसेना के आगमन की खबर देता है। यह जानकर चारुदत्त बहुत खुश हो जाता है।

पंचम अंक के तृतीय दृश्य में विट के साथ वसन्तसेना चारुदत्त के घर की ओर जाती हुई दिखाई देती है। वे दोनों वर्षा का सुन्दर वर्णन करते हैं। वसन्तसेना वर्षा और बिजली दोनों को बाधा पहुँचाने के कारण कोसती है। चारुदत्त के घर पहुँच कर विट इशारे से विदूषक को बुलाता है और वसन्तसेना के आगमन की सूचना देता है। विदूषक यह शुभ समाचार चारुदत्त को बताता है। वह सुनकर बहुत प्रसन्न हो जाता है। वसन्तसेना चारुदत्त के पास जाते समय छत्रधारिणी के साथ विट को वापस भेज देती है।

चतुर्थ दृश्य में चेटी और वसन्तसेना वाटिका में पहुंचते हैं। वहाँ चारुदत्त प्रसन्न होकर उसका स्वागत करता है। विदूषक वसन्तसेना से उसके आगमन का कारण पूछता है। चेटी उत्तर देती है कि आपकी भेजी हुई रत्नावली का मूल्य क्या है ?

२६ मृच्छकटिक

उसके बदले में आप यह स्वर्णभाण्ड ले लीजिये। चारुदत्त और विदूषक उस स्वर्ण-भाण्ड को देखकर बड़े आश्चर्य में पड़ जाते हैं। इसके बाद चेटी विदूषक के कान में स्वर्णभाण्ड प्राप्त होने की सारी कथा सुना देती है। विदूषक सुनकर खुश होता है और चारुदत्त से भी कह देता है। सभी लोग प्रसन्न हो जाते हैं। उसी समय वर्षा होने लगती है। विदूषक वर्षा की निन्दा करता है किन्तु चारुदत्त प्रशंसा करता है। वह और वसन्तसेना प्रेमलीला में लीन हो जाते हैं। वर्षा के अधिक तेज हो जाने पर वे दोनों भीतर चले जाते हैं और वसन्तसेना वह रात वहीं बिताती है।

षष्ठ अङ्क—

षष्ठ अंक के प्रथम दृश्य में सोती हुयी वसन्तसेना को जगाती हुई चेटी प्रवेश करती है। जागने पर उसे बताती है कि आर्य चारुदत्त जीर्णोद्यान में गये हैं और यह आदेश दे गये हैं कि रात में ही गाड़ी तैयार रखी जाय। प्रातः होते ही वसन्तसेना को भी जीर्णोद्यान पहुँचा दिया जाय। यह सुनकर वसन्तसेना बहुत खुश हो जाती है। वह अपने को चारुदत्त के महल में पाकर चकित है। वह चेटी द्वारा रत्नावली चारुदत्त की पत्नी धूता के पास वापस भेजती है। और कहती है कि मैं श्रीमान् चारुदत्त की गुणनिर्र्जिता दासी हूँ अतः आपकी भी। अतः यह रत्नावली आप के ही कण्ठ की शोभा बढ़ाये। किन्तु धूता उसे वापस नहीं लेती है और कहती है कि आर्यपुत्र ही मेरे सबसे बड़े आभूषण हैं। अतः उनके द्वारा दी गयी रत्नावली आप अपने ही पास रखिये।

द्वितीय दृश्य में रदनिका चारुदत्त के पुत्र रोहसेन को गोद में लेकर प्रवेश करती है। वह सोने की गाड़ी से खेलने की जिद करता है। रदनिका मिट्टी की गाड़ी बनाकर देती है। [ इसी मृत्शकटिका (= मिट्टी की गाड़ी ) के नाम पर इस 'प्रकरण' का नाम रखा गया है।] वह बालक मिट्टी की गाड़ी लेने से इनकार करता है। सोने की गाड़ी के लिये रोने लगता है। वह उसे लेकर वसन्तसेना के पास जाती है। वसन्तसेना उसे चारुदत्त का पुत्र जानकर प्रेम प्रदर्शित करती हुई रोने का कारण पूछती है। उसकी भोली-भाली बातों से वसन्तसेना का हृदय प्रेम से उमड़ पड़ता है। वह बच्चे को सोने की गाड़ी बनवाने के लिये अपने सभी गहने उतार कर दे देती है।

तृतीय दृश्य में चारुदत्त का गाड़ीवान वर्धमानक गाड़ी लेकर आता है। रदनिका गाड़ी आने की सूचना वसन्तसेना को देती है। वह स्वयं को सजाने तक के लिये गाड़ीवान को प्रतीक्षा करने के लिये कहती है। गाड़ीवान को अचानक याद आता है कि वह गाड़ी का बिछावन भूल आया है। उसे लेने के लिये वह गाड़ी

भूमिका

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लेकर फिर चला जाता है। इसी बीच शकार का गाड़ीवान स्थावरक चेट शकार की गाड़ी चारुदत्त के दरवाजा के पास खड़ी कर देता है और आगे एक गाड़ीवान की सहायता करने के लिये चला जाता है। इधर तैयार होकर आई वसन्तसेना भ्रमवश उसी गाड़ी में बैठ जाती है। वापस आकर स्थावरक गाड़ी लेकर चल देता है। उधर कारागार से बन्धन तुड़ाकर भागा हुआ गोपालपुत्र आर्यक वहाँ मार्ग में घूमने लगता है। अपनी रक्षा के लिये वह चारुदत्त की वाटिका में घुस जाता है। घर से बिछावन लेकर वापस आया हुआ वर्धमानक चारुदत्त की गाड़ी वहाँ पक्षद्वार में खड़ी कर देता है। आर्यक छिप कर उस गाड़ी में बैठ जाता है। वर्धमानक यह समझता है कि वसन्तसेना आकर बैठ गयी है। अतः वह गाड़ी लेकर पुष्पकरण्डक जीर्णोद्यान की ओर चल पड़ता है।

चतुर्थ दृश्य में राजा के सेनाधिकारी वीरक और चन्दनक वर्धमानक से गाड़ी रोकने को कहते हैं। उसके भीतर छिपा हुआ आर्यक बैठा है। आपसी वाद-विवाद के बाद पहले चन्दनक चढ़ कर गाड़ी देखता है। आर्यक उससे आत्मरक्षा की प्रार्थना करता है। वह अभयदान दे देता है। गाड़ी से उतर कर वह वीरक से कहता है कि इसमें वसन्तसेना बैठी हुई चारुदत्त के पास जीर्ण पुष्पकरण्डक उद्यान में जा रही है। किन्तु उसके बोलने में कुछ घबड़ाहट दिखाई देने से वीरक को उसकी बात में सन्देह हो जाता है। वह स्वयं भी गाड़ी देखने का आग्रह करता है। इस बात को लेकर उन दोनों कुछ गरमागरमी हो जाती है। वीरक जैसे ही गाड़ी पर चढ़ता है, चन्दनक उसे खींचकर अपने पैर से मार देता है। वह वसन्तसेना के रूप में छिपे हुये आर्यक को आत्मरक्षार्थ तलवार दे देता है। और गाड़ीवान से कहता है कि किसी के पूछने पर कह देना कि वीरक और चन्दनक गाड़ी देख चुके हैं। वर्धमानक गाड़ी चला देता है। गाड़ी से आगे जाता हुआ आर्यक राजा बनने के समय चन्दनक को याद रखने का वादा करता है।

सप्तम अङ्क—

सप्तम अङ्क के प्रथम दृश्य में चारुदत्त और विदूषक वसन्तसेना की गाड़ी की प्रतीक्षा करते हुये दिखाई देते हैं। गाड़ी आने में होने वाले विलम्ब के लिये अनेक तर्क-वितर्क करते हैं। उसी समय छिपकर बैठे हुये आर्यक को लाने वाली गाड़ी की आवाज सुनाई देती है। आर्यक चारुदत्त की प्रशंसा सुन चुका है। अतः अब वह उसके दर्शन करके ही भागना चाहता है। जब गाड़ी आ जाती है तो चारुदत्त विदूषक से वसन्तसेना को गाड़ी से उतारने के लिये कहता है। विदूषक गाड़ी में चढ़कर उसमें बैठे आर्यक को देख कर डर जाता है। तब चारुदत्त स्वयं

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चढ़कर देखता है। उसमें बैठे हुये सुन्दर रूप वाले उसको हथकड़ी और बेड़ियों से बंधा देखकर उसका परिचय पूछता है। वह अपना परिचय देकर राजा द्वारा कारागार में बन्द करने की बात कहता है। वहां से भागने की बात सुनकर चारुदत्त उसे अभयदान देता है। और हथकड़ी बेड़ियों से मुक्त करा कर उसे शीघ्र ही अपनी गाड़ी से घर जाने के लिये कहता है। आर्यक के चले जाने पर राजा पालक के भय से चारुदत्त और विदूषक भी हथकड़ी-बेड़ियाँ अंधे कुआँ में फिकवाकर चल देते हैं।

अष्टम अङ्क—

अष्टम अंक के प्रथम दृश्य में गीले चीवर को लिये हुये एक बौद्ध भिक्षु प्रवेश करता है। वह धर्म का उपदेश देता है। उसी समय विट और शकार भी वहीं बगीचे में आ जाते हैं। शकार भिक्षु को डांटता है। और जन्म लेते ही संन्यासी न बनने का आरोप लगाकर पीटता है। किन्तु विट उसे बचाता है। वह भिक्षु चला जाता है। शकार बैठकर वसन्तसेना को याद करने लगता है। वह अपनी गाड़ी की प्रतीक्षा करता है। दोपहर का समय है। वह भूख से व्याकुल है। समय बिताने के लिये वह गाना गाने लगता है।

द्वितीय दृश्य में गाड़ी लिये हुये स्थावरक चेट दिखाई देता है। गाड़ी की आवाज सुनकर शकार गाड़ी आने की कल्पना करने लगता है। तभी चेट आकर गाड़ी ले आने की सूचना देता है। शकार गाड़ी को चहारदीवारी से लंघवा कर ही लाने की जिद करता है। गाड़ी आ जाने पर शकार उस पर चढ़कर भीतर बैठी हुई वसन्तसेना को देखकर घबड़ा जाता है और विट को पकड़ लेता है। बाद में विट गाड़ी पर चढ़कर उसमें बैठी हुई वसन्तसेना को देखता है। वह उससे अपनी रक्षा की प्रार्थना करती है। विट उसे सान्त्वना देता है। वह गाड़ी से नीचे उतर कर शकार से कहता है कि गाड़ी में सचमुच राक्षसी बैठी है। अतः वह शकार से पैदल ही चलने को कहता है। किन्तु वह गाड़ी से ही जाने का आग्रह करता है। तब विट बता देता है कि गाड़ी में सचमुच वसन्तसेना बैठी है। वह तुम्हारे साथ अभिसार के लिये आई है। यह सुनकर प्रसन्न होकर शकार वसन्तसेना के पैरों पर गिर जाता है। और अपनी गलतियों के लिये क्षमा मांगने लगता है। किन्तु वसन्तसेना उसे स्वीकार करने के स्थान पर पैर से मार देती है। इससे शकार क्रुद्ध हो जाता है। वह चेट से पूछता है कि उसे वसन्तसेना कहाँ से मिली? चेट गाड़ी बदल जाने की बात कहता है। शकार वसन्तसेना से उसी समय गाड़ी से उतरने को कहता है। फिर उसे उतार देता है। शकार विट को प्रलोभन देकर वसन्तसेना

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को मारने की बात कहता है किन्तु विट वैसा करने से इनकार कर देता है। इसके बाद शकार चेट से वसन्तसेना को मारने के लिये कहता है और अनेक प्रलोभन देता है। तब भी चेट परलोक के भय से वसन्तसेना को मारने से इनकार कर देता है। शकार क्रुद्ध होकर उसे पीटने लगता है। फिर चेट से एकान्त में जाकर बैठने की बात कहता है। वह चला जाता है। तब शकार स्वयं ही वसन्तसेना को मारने के लिये तैयार होता है किन्तु विट उसका गला पकड़ कर गिरा देता है। शकार एक चालबाजी करता है। वह विट से कहता है कि तुम्हारे सामने वसन्तसेना मुझे चाहने में लजा रही है। अतः तुम भी जाओ और चेट को पकड़ कर लाओ। विट शकार की बात पर विश्वास कर लेता है। वह वसन्तसेना को धरोहर के रूप में शकार को सौंप कर चला जाता है। शकार वसन्तसेना को फिर से खुश करने की कोशिश करता है। किन्तु वह हर हालत में चारुदत्त की ही प्रशंसा करती रहती है। तब क्रुद्ध होकर शकार उसका गला दबा देता है। वसन्तसेना मूच्छित होकर गिर जाती है। शकार अपने पराक्रम पर बहुत खुश होता है। वह अपने को छिपाकर बैठ जाता है।

तृतीय दृश्य में चेट के साथ विट पुनः प्रवेश करता है। वह शकार से अपनी धरोहर वसन्तसेना को वापस माँगता है। शकार कहता है कि वह तुम्हारे पीछे-पीछे ही चली गयी थी। बाद में वह कहता है कि उसने वसन्तसेना को मार दिया है। ऐसा कहकर मरी पड़ी हुयी वसन्तसेना को दिखाता है। विट दुखी होकर विलाप करने लगता है। चेट उसे समझाता है। उसे यह भय हो जाता है कि शकार उस हत्या का आरोप उस पर न लगा दे। अतः वह वहाँ से चला जाता है। शकार चेट को पकड़ कर अपने घर में बन्दी बना देता है और जाने से पहले सूखे पत्तों से वसन्तसेना को ढंक देता है। इसके बाद में चारुदत्त पर हत्या का आरोप लगाने के लिये न्यायालय जाने की कहकर निकल जाता है।

चतुर्थ दृश्य में शकार के जाते समय ही एक बौद्ध भिक्षु प्रवेश करता है। वह अपने गीले चीवरखण्ड को सुखाने के लिये उपयुक्त स्थान खोजता है। इसी बीच उसे पत्तों के बीच में किसी के साँस लेने का पता लगता है। उधर कुछ होश में आकर वसन्तसेना अपना हाथ दिखलाती है। भिक्षु पत्ते हटाकर देखता है कि वही बुद्धो-पासिका है जिसने उसे जुआरियों के ऋण से मुक्त कराया था। उसका दूसरा भी हाथ देखकर उसे पूर्ण विश्वास हो जाता है। वसन्तसेना पानी माँगती है। वह अपना चीवर निचोड़ कर उसको पानी दे देता है और अपने कपड़े से हवा करने लगता है। वसन्तसेना द्वारा पूछे जाने पर वह पहले ऋणमुक्त कराये जाने की सारी

३० मृच्छकटिक

बात बता कर अपना परिचय देता है। वह पास की लता झुकाकर उसके सहारे से उठने के लिये कहता है और वहीं पास में एक बौद्ध विहार में अपनी धर्मभगिनी के पास चलने के लिये कहता है। ऐसा कहकर साथ में लेकर आश्रम की ओर चल देता है।

नवम अङ्क—

नवम अङ्क के प्रथम दृश्य में शोधनक (सफाई कर्मचारी) प्रवेश करके न्यायालय की सफाई तथा कुर्सी लगाने आदि की व्यवस्था की सूचना देता है। इसी बीच उज्ज्वलवेश धारण किये हुये शकार प्रवेश करता है। वह वसन्तसेना के हत्यारूपी अपने पाप को चारुदत्त के शिर पर मढ़ देने की बात करता है। वह न्यायाधिकारियों की प्रतीक्षा करने लगता है। उसी समय श्रेष्ठी तथा कायस्थ आदि से घिरे हुये न्यायाधीश का प्रवेश होता है। न्यायाधीश सही न्याय करने की दुष्करता बताता है। न्यायाधिकरणिक के आदेश से शोधनक प्रार्थियों को अपना मुकदमा प्रस्तुत करने के लिये सूचित करता है। सबसे पहले शकार अपना मुकदमा प्रस्तुत करना चाहता है। किन्तु पहले अस्वीकार करके पुनः इस दुष्ट के भय से इसका मुकदमा प्रस्तुत करने के लिये आदेश कर दिया जाता है। वह अपनी सफलता पर गर्व करने लगता है। वह न्यायालय में आकर कहता है कि उसने अपने पुष्पकरण्डक जीर्णोद्यान में एक मरी हुई स्त्री का शरीर देखा है। वह स्त्री वसन्तसेना है। वह कहता है कि किसी ने धन के लोभ से वसन्तसेना का गला दबाकर मार डाला है। वसन्तसेना किसके पास गयी थी—यह जानने के लिये न्यायाधिकारी पहले उसकी माता को बुलाते हैं। उसकी माता आकर बताती है कि उसकी बेटी अपने मित्र चारुदत्त के घर पर अभिसार के लिये गयी है। यह सुनकर न्यायाधिकारी चारुदत्त को भी बुलाते हैं। न्यायालय के कर्मचारी के साथ आते हुये चारुदत्त को मार्ग में अनेक अपशकुन दिखाई देते हैं जिनसे वह घबड़ा जाता है। न्यायालय में पूछे जाने पर वह बता देता है कि वसन्तसेना के साथ उसका प्रेमव्यवहार है। वह बताता है कि वसन्तसेना अपने घर गयी है। किन्तु वह यह नहीं बता पाता कि गाड़ी से गयी है या पैदल। इसी बीच अपमानित होने से क्रुद्ध वीरक न्यायालय में आता है। वह अपने कर्तव्यपालन के समय चन्दनक द्वारा किये गये अपमान की बात कहता है। वह यह भी कहता है कि चारुदत्त की गाड़ी में बैठी हुई वसन्तसेना पुष्पकरण्डक जीर्णोद्यान की ओर जा रही थी। वीरक की बात सुनकर न्यायाधिकारी पुष्पकरण्डक उद्यान में यह पता लगाने के लिये वीरक को भेजते हैं कि वहाँ कोई स्त्री मरी पड़ी है अथवा नहीं।

भूमिका ३१

इसी बीच रेभिल द्वारा यह जानकर कि चारुदत्त को न्यायालय में बुलाया गया है विदूषक चिन्तित हो जाता है। वह वसन्तसेना के गहने देने के पहले न्यायालय चल पड़ता है। वहाँ शकार के साथ उसका वाद-विवाद बढ़ जाता है। और मार पीट होने लगती है जिससे विदूषक के पास रखे हुये वसन्तसेना के गहने जमीन पर गिर पड़ते हैं। शकार घबड़ा कर उन गहनों को उठा कर दिखाता है और कहता है कि इन गहनों के कारण ही चारुदत्त ने वसन्तसेना का वध किया है।

उन गहनों को देखकर चारुदत्त यह स्वीकार करता है वे गहने वसन्तसेना के ही हैं। परन्तु वह यह नहीं बता पाता कि वे गहने वसन्तसेना से अलग कैसे हुये। गहनों को देखकर न्यायाधिकारी और अधिक चिन्तित हो जाते हैं। और चारुदत्त से सब सच-सच बोलने की कहते हैं। चारुदत्त कहता है कि मैं निष्पाप लोगों के कुल में उत्पन्न हुआ हूँ और मैं स्वयं भी निरपराध हूँ किन्तु यदि मुझ पर पाप की सम्भावना की जाती है तो मेरे निष्पाप होने से भी क्या लाभ ? वह सोचने लगता है कि वसन्तसेना से रहित उसका जीवन व्यर्थ है। न्यायाधिकारी चारुदत्त को अपराधी घोषित करके राजा 'पालक' के पास दण्डनिर्णय के लिये भेजते हैं और अपनी सम्मति देते हैं कि यह चारुदत्त ब्राह्मण है। अतः इसे मृत्युदण्ड न देकर धनसहित राज्य से बाहर कर दिया जाय। परन्तु राजा 'पालक' कठोर दण्ड की आज्ञा देता है कि इन्हीं गहनों के साथ ही इसको दक्षिणश्मशान ले जाकर शूली पर चढ़ाकर मृत्युदण्ड दे दिया जाय। जिससे कोई भी दूसरा ऐसे पाप कर्म का साहस न कर सके। दण्ड सुनकर चारुदत्त दुखी हो जाता है। वह विदूषक से कहता है कि मुझे प्रिय बेटा रोहसेन का मुख दिखा दो। वह अविवेकी राजा पालक को मृत्युदण्ड देने के लिये कोसने लगता है।

दशम अङ्क—

दशम अङ्क के प्रथम दृश्य में दो चाण्डाल चारुदत्त को वधस्थान की ओर ले जाते हुये दिखाई देते हैं। चारुदत्त को मृत्युदण्ड की वेशभूषा पहना दी गई है। मार्ग में अपार भीड़ चारुदत्त को देखने के लिये खड़ी है। चाण्डाल लोगों को हटा रहे हैं और चारुदत्त का वध न देखने का परामर्श दे रहे हैं। महलों में झरोखों से स्त्रियाँ भी दुखी होकर आंसू गिरा रही हैं। चाण्डाल चारुदत्त के कुल गोत्र का परिचय देते हुये उसके अपराध और मृत्युदण्ड की घोषणा करते हैं। उसे सुन कर चारुदत्त बहुत दुःखी हो जाता है। उसी समय विदूषक चारुदत्त के पुत्र को लेकर वहाँ आ जाता है। वह लड़का अपने पिता को देखने के लिये रोने लगता है।

३२ मृच्छकटिक

मृत्यु के समय चारुदत्त अपने पास केवल जनेऊ देखकर उसे ही पुत्र को देना चाहता है। विदूषक और चारुदत्त का पुत्र रोहसेन चारुदत्त को छोड़ने की और उसके बदले में अपने अपने वध करने की प्रार्थना करते हैं। इसी समय शकार द्वारा अपने ऊपरी महल में कैद किया गया स्थावरक चेट दिखाई देता है। वह चाण्डालों की घोषणा सुनकर चारुदत्त का वध जानकर अति दुखी है। वह चिल्ला चिल्ला कर कहता कि चारुदत्त ने वसन्तसेना का वध नहीं किया है किन्तु दूरी के कारण कोई उसकी आवाज नहीं सुन पाता है। वह अपने जीवन की अपेक्षा चारुदत्त का जीवन अधिक महत्त्वपूर्ण समझता है। अतः वह झरोखे से नीचे कूद पड़ता है। उसकी बेड़ियाँ खुल जाती हैं। वह सभी के सामने चाण्डालों से कहता है कि इस चारुदत्त ने वसन्तसेना का वध नहीं किया है अपितु मेरे स्वामी शकार ने ही किया है। और मुझे बांधकर कैद कर रखा था जिससे मैं किसी से न कह सकूं। इसी बीच कोलाहल सुनकर अपने महल में बन्दी स्थावरक चेट को न देखकर उसको खोजता हुआ शकार भीड़ में पहुँच जाता है। वह सबके सामने स्थावरक को झूठा सिद्ध करके उसे वापस ले जाता है। निराश स्थावरक चेट चारुदत्त के पैरों पर गिर पड़ता है। चाण्डाल शकार की बात सच मानकर स्थावरक को पीट कर बाहर कर देते हैं। शकार चाण्डालों से चारुदत्त को शीघ्र ही मारने के लिये कहता है। वह उसे पुत्र-सहित मारने को कहता है। किन्तु चाण्डाल उसकी बात अस्वीकार कर देते हैं। मित्रशोक में मरने के इच्छुक विदूषक को चारुदत्त मना करता है और पुत्र रोहसेन को उसकी माता के पास ले जाने के लिये कहता है। इसी बीच वे दोनों चाण्डाल, वध करने की किसकी पारी है, इसका निर्णय करने लगते हैं। और चारुदत्त को दक्षिण श्मशान का भीषण दृश्य दिखाते हैं।

दशम अङ्क के द्वितीय दृश्य में घबड़ायी हुई वसन्तसेना और भिक्षु चारुदत्त के घर की ओर जाते हुये दिखाई देते हैं। मार्ग में भारी भीड़ देखकर वसन्तसेना भिक्षु से उस भीड़ का कारण जानने के लिये कहती है। इतने में चाण्डालों की आखिरी घोषणा सुनाई देती है।

वे चारुदत्त को अतिशीघ्र ही मारने वाले प्रतीत होते हैं। यह सुनकर भिक्षु घबड़ा जाता है। और वसन्तसेना से जल्दी ही चलने को कहता है। वे दोनों अपनी पूरी शक्ति से चलकर वहाँ अति शीघ्र पहुँचने का प्रयास करते हैं। इसी बीच एक चाण्डाल चारुदत्त पर तलवार से प्रहार करता है किन्तु तलवार उसके हाथ से गिर जाती है। वह इसे अच्छा शकुन मानकर अपनी कुल देवी सह्यवासिनी से चारुदत्त की रक्षा करने की प्रार्थना करता है। दूसरा चाण्डाल राजाज्ञा का पालन

भूमिका ३३

करने को कहता है। वे दोनों चारुदत्त को शूली पर चढ़ाना चाहते हैं। यह देख कर भिक्षु और वसन्तसेना उन्हें ऐसा करने से मना करते हैं। वसन्तसेना कहती है कि मैं ही वह अभागिनी हूँ जिसके कारण आर्य चारुदत्त को मृत्युदण्ड दिया गया है। यह सुनकर उधर देखकर चाण्डाल सोंचने लगते हैं। इसी बीच में दौड़ती हुई वसन्तसेना चारुदत्त के वक्षस्थल पर गिर जाती है। और भिक्षु पैरों पर गिर जाता है। चाण्डाल हट जाते हैं। और चारुदत्त का वध न करने से प्रसन्न दिखाई देते हैं। वे राजा पालक को वसन्तसेना के जीवित होने की सूचना देने के लिए चले जाते हैं। वहाँ वसन्तसेना को जीवित देखकर शकार घबड़ा जाता है और वहाँ से भागता है। चारुदत्त वसन्तसेना को पहचान कर आनन्दमग्न हो जाता है। अचानक आयी हुई वसन्तसेना को पाकर चारुदत्त अपनी वध्य वेशभूषा को और चाण्डालों के साथ बजाये जाते हुए वाद्यों को विवाह की वेषभूषा और वाद्यों के समान समझने लगता है। भिक्षु का परिचय जान कर चारुदत्त बहुत खुश होता है।

दशम अंक के तृतीय दृश्य में शर्विलक प्रवेश करता है। वह सूचना देता है कि आभीरपुत्र 'आर्यक' ने राजा 'पालक' का वध कर दिया है। वह चारुदत्त को वसन्तसेना के साथ देखकर बहुत प्रसन्न हो जाता है। वह आर्यक का और अपना परिचय देता है। वह चारुदत्त से प्रार्थना करता है कि 'कुशवती' नगरी का राज्य स्वीकार कर लें। वह शकार को पकड़ने का आदेश देता है। सब लोग शकार को पकड़ कर लाते हैं। शर्विलक उसे मृत्युदण्ड देना चाहता है, किन्तु वह चारुदत्त की शरण में आ जाता है और उदार चारुदत्त उसे क्षमा कर देता है।

दशम अंक के चतुर्थ दृश्य में चन्दनक यह सूचना देता है कि अपने पति के मृत्युदण्ड से दुखी होकर उसकी धर्मपत्नी धूता आग में कूद कर अपना प्राण-परित्याग करने जा रही है। यह सुनते ही चारुदत्त मूर्छित हो जाता है। वसन्तसेना उसे होश में लाती है। सभी लोग धूता के पास पहुँचते हैं। वहाँ सभी के रोकने पर भी धूता आग में प्रवेश करने का प्रयास करती है। इधर शर्विलक चारुदत्त से जल्दी-जल्दी चलने को कहता है। धूता अपने पुत्र रोहसेन को समझा रही है। उसी समय चारुदत्त आकर बोलता है। उसकी आवाज पहचान कर धूता प्रसन्न हो जाती है। पुत्र अपने पिता चारुदत्त का आलिंगन करता है। विदूषक सती की महिमा का वर्णन करता है और चारुदत्त का आलिंगन करता है। धूता और वसन्तसेना भी परस्पर आलिंगन करतीं हैं। शर्विलक वसन्तसेना से कहता है कि प्रसन्न राजा आर्यक आपको 'वधू' शब्द से अलंकृत करते हैं। वसन्तसेना इस अनुग्रह से अपने

मृ० भू०-३

३४ मृच्छकटिक

को अनुगृहीत मानती है। भिक्षु को सभी विहारों का कुलपति बना दिया जाता है। स्थावरक को शकार की दासता से मुक्त करा कर स्वतन्त्र नागरिक बना दिया जाता है। दोनों चाण्डालों को सभी चाण्डालों का प्रधान बना दिया जाता है। चन्दनक को 'पृथ्वीदण्डपालक' का पद दे दिया जाता है। शकार को उसी प्रकार स्वच्छन्द विचरण करने के लिए छोड़ दिया जाता है।

भारत-वाक्य के साथ नाटक (प्रकरण) का दशम अङ्क समाप्त हो जाता है।

पात्रों का चरित्र-चित्रण

मृच्छकटिक एक जीते जागते पात्रों का सजीव चित्रण है। प्रायः प्रत्येक पात्र अपनी कुछ विशेषताओं के साथ दिखाई देता है। वह सामाजिक को भली-भाँति प्रभावित करने में पूर्णतया सफल है। इसमें पुरुष पात्रों में चारुदत्त, शकार, शर्विलक और विदूषक के अतिरिक्त विट, चेट, भिक्षुक तथा आर्यक आदि प्रधान हैं। स्त्रीपात्रों में वसन्तसेना, धूता, मदनिका तथा रदनिका प्रधान हैं। इन पात्रों की चरित्र-सम्बन्धी विशेषताओं का विवेचन यहाँ किया जा रहा है।

चारुदत्त

मृच्छकटिक में चारुदत्त को सुन्दर, युवक, परोपकारी, गुणग्राही, उदार, भावुक, पवित्रप्रेमी, सत्यवक्ता, शरणागतवत्सल, परम क्षमाशील आदि रूपों में चित्रित किया गया है। यह इस 'प्रकरण' का धीरप्रशान्त नायक है।

(१) व्यक्तित्व

उज्जयिनी नगरी के अति सम्पन्न वंश में चारुदत्त ने जन्म लिया है। उसके वंशज यद्यपि ब्राह्मण थे तथापि व्यापार के माध्यम से उन्होंने प्रचुर सम्पत्ति अर्जित की थी। अतः वे धनिकों में प्रतिष्ठित थे। परन्तु चारुदत्त एक निर्लोभ और अतिशय उदारवृत्ति का है। वह किसी को निराश नहीं करना चाहता। अतः दान देना उसका स्वाभाविक गुण बन गया है। उसका व्यक्तित्व आकर्षक है। वह जितना गुणी है उतना ही सुन्दर। द्वितीय अङ्क में संवाहक वसन्तसेना को जब चारुदत्त का परिचय देता है तो वह कहता है "यस्तादृशः प्रियदर्शनः...... (पृ० १६२)। इसी प्रकार जेल से भागा हुआ आर्यक छिपकर चारुदत्त की गाड़ी में बैठा हुआ उसके सामने पहुँच कर उसको देखता है तो उसके मुख से चारुदत्त की प्रशंसा अचानक निकल पड़ती है—"न केवलं श्रुतिरमणीयो दृष्टिरमणीयोऽपि।" (पृ० ४१८) वसन्तसेना की हत्या के आरोप में जब उसे न्यायालय में बुलाया जाता है तो न्यायाधिकारी उसकी दिव्य आकृति देखकर

भूमिका ३५

उसके द्वारा हत्यारूपी पाप कर्म होने की सम्भावना ही नहीं करते हैं—‘‘घोणोन्नतं मुखमपाङ्गविशालनेत्रम्’’। (९।१६) वहीं मुकदमें के सन्दर्भ में बुलायी गयी वसन्तसेना की माता जब चारुदत्त को देखती है तो अपनी बेटी के प्रेमसमर्पण से सन्तुष्ट हो जाती है—‘‘अयं स चारुदत्तः। सुनिक्षिप्तं खलु दारिकया यौवनम् । (पृ० ५३३ )

वह अभी यौवनसम्पन्न है। प्रथम अंक में चारुदत्त भ्रमवश जब वसन्तसेना पर चादर फेंक देता है तो वह सुगन्धित चादर सूंघकर कहती है ‘‘अनुदासीनमस्य यौवनं प्रतिभासते।’’ (पृ० ११६) आगे चारुदत्त के पुत्र रोहसेन को देखकर कहती है ‘‘अनुकृतमनेन पितू रूपम्।’’ (पृ०३७१) उसका शरीर सुकोमल भी है। न्यायालय में सत्य बोलने के लिये न्यायाधिकारी कहते हैं—

‘‘इदानीं सुकुमारेऽस्मिन् निःशंकं कर्कशाः कशाः ।। ९।३६

(२) परम उदार

वह परम उदार है। वह किसी को निराश नहीं करना चाहता। यहाँ तक कि सेंध लगाकर उसके घर में घुस आने वाले चोर का ज्ञान होने पर वह दुखी हो जाता है क्योंकि वह जानता है कि उसके घर में चुराने लायक कुछ भी नहीं है। चोर का परिश्रम व्यर्थ ही हुआ होगा—‘‘सन्धिच्छेदनखिन्न एव सुचिरं पश्चा-न्निराशो गतः।’’ (३।२३) कर्णपूरक जब मत्त हाथी को मार देता है तो उसके पराक्रम से प्रसन्न होकर उसे अंगूठी देना चाहता है किन्तु अंगुली में अंगूठी न होने से वह अपना दुपट्टा ही दे देता है। (‘‘एकेच शून्यान्याभरणस्थानानि परामृश्य ऊर्ध्वं निःश्वस्यायं ममोपरि निक्षिप्तः।’’ (पृ० १७८) पंचम अंक में चेट जब वसन्तसेना के आगमन का समाचार देता है तो वह अति प्रसन्न होकर अपना दुपट्टा दे देता है--‘‘भद्र ! न कदाचित् प्रियवचनं निष्फलीकृतम्, तद्गृह्यतां पारितोषिकम् । ( इत्युत्तरीयं प्रयच्छति । ) (पृ० ३१८)’’

(३) अतिशय दयालु--

चारुदत्त के मन में प्राणिमात्र के लिये दया है। वह किसी को कभी भी कष्ट नहीं देना चाहता है और न किसी को दुखी देखना चाहता है। इस विषय में चेट द्वारा अपने स्वामी के लिये कही गयीं बातें ध्यान देने योग्य हैं--‘‘सुजनः खलु भृत्यानुकम्पकः।’’ (३।२)

चारुदत्त अपनी आराम के लिये किसी को कष्ट देना पसन्द नहीं करता है। इसी लिये देर रात में सोती हुई रदनिका को जगाने का निषेध कर देता है।

३६ मृच्छकटिक

"अलं सुप्तजनं प्रबोधयितुम् ।" (पृ० १९१) ऊपर आराम से बैठे हुये कपोतदम्पती को विदूषक जब मारने के लिये दौड़ता है तो वह रोकता हुआ कहता है "वयस्य ! उपविश, किमनेन, तिष्ठतु दयितासहितस्तपस्वी ।" (पृ० ३१४) दूसरी परम दयालुता उस समय देखने योग्य है जब वह अपनी मृत्यु का जाल रचने वाले शकार को भी मुक्त करा देता है। (पृ० ६४०)

(४) शरणागतरक्षक--

चारुदत्त शरण में आये हुये की रक्षा करने में अपने प्राणों को भी न्यौछावर करने से नहीं डरता है। जब कारागार से भागा हुआ आर्यक छिपा हुआ उसी की गाड़ी से आकर उसके सामने आता है और कहता है--"शरणागतो गोपालप्रकृतिः आर्यकोऽस्मि" यह सुनकर चारुदत्त प्रसन्न होकर उत्तर देता है--

विधिनैवोपनीतस्त्वं चक्षुर्विषयमागतः । अपि प्राणानहं जह्यां न तु त्वां शरणागतम् ॥ ७।६ ॥

शरणागतरक्षण की पराकाष्ठा तब होती है जब षड्यन्त्र रचा कर हत्या के अभियोग में चारुदत्त को मृत्युदण्ड दिलाने वाला शकार भी उसकी शरण में आकर प्राणरक्षा की भीख मांगता है "तत्कमिदानीमशरणः शरणं व्रजामि ? भवतु तमेवाभ्युपपन्नवत्सलं गच्छामि । आर्य चारुदत्त ! परित्रायस्व, परित्रायस्य ।" चारुदत्त शकार के महापराध को भुला कर कहता है "अहह ! अभयमभयं शरणागतस्य ।" (पृ० ६३६) शर्विलक आदि उस दुष्ट शकार का वध करना चाहते हैं किन्तु चारुदत्त अपना स्वभाव नहीं छोड़ता है। वह कहता है--

शत्रुः कृतापराधः शरणमुपेत्य पादयोः पतितः । शरेण न हन्तव्यः उपकारहस्तस्तु कर्तव्यः ॥१०।५५

वह शकार को मुक्त करा देता है।

(५) सत्यवक्ता

चारुदत्त सत्यभाषण का प्रेमी है। वह हर परिस्थिति में सत्य ही बोलना चाहता है। जब वसन्तसेना के आभूषणों की चोरी हो जाती है और चारुदत्त को इसकी सूचना दी जाती है तब चिन्तित चारुदत्त से विदूषक यह कहता है कि थोड़ा झूठ बोलकर इस कष्ट से बचा जा सकता है। इस पर चारुदत्त उत्तर देता है--"अहमिदानीमनृतमभिधास्ये।"

भैक्ष्येणाप्यर्जयिष्यामि पुनर्न्यास-प्रतिक्रियाम् । अनृतं नाभिधास्यामि चारित्रभ्रंशकारकम् ॥३।२६

भूमिका

३७

वसन्तसेना के गहनों के बदले में जब उसकी पत्नी धूता अपनी बहुमूल्य रत्नावली दे देती है तब प्रसन्न होकर चारुदत्त कहता है ।

विभवानुगता भार्या सुखदुःखसुहृद् भवान् ।
सत्यं च न परिभ्रष्टं यद्दरिद्रेषु दुर्लभम् ॥ ३।२८

न्यायालय में जब वसन्तसेना की हत्या के लिये उसे अपराधी सिद्ध किया जा रहा है उसी समय शकार के साथ झगड़ा करने वाले विदूषक की कुक्षि से गहने गिर पड़ते हैं। उनके बारे में वह सच ही बोलता है कि ये गहने वसन्तसेना के हैं। (पृ० ५५९) वह झूठ बोलकर अपनी रक्षा नहीं करना चाहता है।

(६) धर्माचारपरायण —

मृच्छकटिक के प्रारम्भ से ही चारुदत्त एक धर्म-कर्मनिरत व्यक्ति के रूप में दिखाई देता है। वह देवी, देवताओं की पूजा और उनके लिये बलिप्रदानादि कार्य में प्रमाद नहीं करता है। उनको नित्य कर्तव्य मानता है। वह सन्ध्यावन्दन और समाधि भी लगाता है। जब विदूषक इसके धर्माचार की आलोचना करता है तब वह कहता है “वयस्य ! मा मैवम्, गृहस्थस्य नित्योऽयं विधिः ।” (पृ० ५२)

तपसा मनसा वाग्भिः पूजिता बलिकर्मभिः ॥१।१६

उसको अपने धर्माचरण पर पूर्ण विश्वास है। दशम अंक में उसे जब मृत्युदण्ड दे दिया जाता है तब भी वह धर्म पर विश्वास नहीं छोड़ता है ।

“प्रभवति यदि धर्मो दूषितस्यापि मेऽद्य ॥१०।३४

(७) प्रतिष्ठाप्रेमी—

चारुदत्त को अपने कुल की और अपनी मान-प्रतिष्ठा का ध्यान सदा रहता है। वह ऐसा कोई आचरण नहीं करना चाहता है जिससे उसकी अथवा उसके वंश की मान-प्रतिष्ठा को धक्का लगता हो । वसन्तसेना के गहनों की चोरी के सम्बन्ध में विदूषक द्वारा झूठ बुलवाये जाने के उत्तर में कहता है — “अनृतं नाभिधास्यामि चारित्रभ्रंशकारकम् ।” (३।२६)

जब उस पर वसन्तसेना की हत्या का अपराध सिद्ध हो जाता है तो उसको अपनी मृत्यु का कोई कष्ट नहीं है अपि तु केवल चरित्रपतन का ही है—

“न भीतो मरणादस्मि केवलं दूषितं यशः । (१०।२७)
तेनास्म्यकृत-वैरेण क्षुद्रेणात्यल्पबुद्धिना ।
शरेणेव विषाक्तेन दूषितेनापि दूषितः ॥ १०।२८

३८ मृच्छकटिक

प्राप्यैतद्व्यसन - महार्णव - प्रपातं । .........वक्तव्यं यदिह मया हता - प्रियेति ॥ १०।३३

अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिये वह एक झूठ भी बोलता है। जब वसन्तसेना के गहनों की चोरी हो जाती है तो वह उन गहनों को जुये में हार जाने की बात वसन्तसेना से कहलवाता है और गहनों के बदले में बहुमूल्य रत्नावली भेजता है। वह जानता है कि सत्य बात जानने पर वसन्तसेना रत्नावली नहीं लेगी। और समाज के लोग उसकी गरीबी के कारण सच घटना पर विश्वास नहीं करेंगे। फलस्वरूप चारों ओर उसकी बदनामी होगी। वह विदूषक से कहता है—

“कः [श्रद्धास्यति भूतार्थं सर्वो मां तुलयिष्यति।” ३।२४ “यं समालम्ब्य विश्वासं न्यासोऽस्मासु तया कृतः। तस्यैतन्महतो मूल्यं प्रत्ययस्यैव दीयते ॥” ३।२६

(८) कलाप्रेमी—गुणग्राही —

वह एक गुणग्राही के रूप में सामने आता है। वह हर अच्छी कला का सम्मान करता है। संगीत के प्रति उसकी विशेष रुचि है। कामदेवायतन उद्यान में इसी प्रसंग में उपस्थित उसको देखकर वसन्तसेना उस पर आकृष्ट हुई थी। उसकी इस आदत से चेट प्रसन्न नहीं है। वह इसे स्वाभाविक दोष मानता है।

“योऽपि स्वाभाविकदोषो न शक्यो वारयितुम् ।” ३।२

वह वीणा को बहुत पसन्द करता है। रेभिल के यहाँ संगीत सुनने के बाद भी वह उसका आनन्दानुभव करता रहता है।

शर्विलक द्वारा लगायी गयी कलापूर्ण सेंध को देखकर उसकी प्रशंसा करने लगता है—‘‘अहो, दर्शनीयोऽयं सन्धिः। कथमस्मिन्नपि कर्मणि कुशलता ?” (पृष्ठ २१७)

(६) आदर्श प्रेमी—

मृच्छकटिक में चारुदत्त को एक उच्च कोटि का आदर्श प्रेमी चित्रित किया गया है। वह एक सर्वश्रेष्ठ परम सुन्दरी गणिका को चाहता है किन्तु प्रेम-व्यवहार के प्रदर्शन में वह गणिका ही पहले कदम उठाती है। चारुदत्त को शकार द्वारा कहलाये गये विदूषक के माध्यम से यह ज्ञात होता है कि वसन्तसेना उस पर अनुरक्त है "एसा वसन्तसेना कामदेवाअदणुज्जाणादो पहुदि भवन्तमणुरत्ता।" (पृ० ८०) परन्तु वह अपनी निर्धनता से खूब परिचित है। अतः अपने घर आई हुई भी वसन्तसेना को देखकर प्रसन्न होकर भी सोचता है कि मेरा प्रेम मुझ तक ही सीमित रहने वाला है--

भूमिका

यया मे जनितः कामः क्षीणे विभवविस्तरे ।
क्रोधः कुपुरुषस्येव स्वगात्रेष्वेव सीदति ॥ १।५५

आगे जब विदूषक वसन्तसेना के घर जाकर उसे रत्नावली देकर उसके व्यवहार से रुष्ट होकर लौटता है और चारुदत्त से वेश्या-सम्बन्ध तोड़ने को कहता है, तब वह अपनी स्थिति समझता हुआ उत्तर देता है "वयस्य ! अलमिदानीं परीवादमुक्त्वा । अवस्थयैवास्मि निवारितः ।"

वेगं करोति तुरगस्त्वरितं प्रयातुं
... ... ... ... पुनर्विशन्ति ॥ ५।८

यस्यार्थास्तस्य सा कान्ता धनहार्यो ह्यसौ जनः ।
वयमर्थैः परित्यक्ता ननु त्यक्तैव सा मया ॥ ५।६

न्यायालय में जब उसकी मित्रता वसन्तसेना के साथ पूछी जाती है तो वह कुछ लज्जित होकर उत्तर देता है "भो अधिकृताः ! मम मित्रमिति । अथवा यौवन-मत्रापराध्यति ।” (पृ० ५३५ ) वह वसन्तसेना के बिना अपने जीवन को व्यर्थ समझता है । वह मृत्युदण्ड स्वीकार करते हुये कहता है - “न च मे वसन्तसेना-विरहितस्य जीवनेन कृत्यम् ।” (पृ० ५६० )

वह यद्यपि गणिका वसन्तसेना से प्रेम करता है किन्तु अन्यत्र इस विषय में सावधान है। वह स्त्रीलम्पट नहीं है। प्रथम अंक में जब भ्रमवश रदनिका समझकर वसन्तसेना पर अपना दुपट्टा ( अपने पुत्र को उड़ाने के लिये) फेंक देता है तब अन्य स्त्री का ज्ञान होते ही पश्चात्ताप करने लगता है--“न युक्तं परकलत्र-दर्शनम् ।” (पृ० ११८ )

(१०) पत्नी का महत्त्व समझने वाला—

यद्यपि प्रारम्भ से ही वह गणिका वसन्तसेना पर अनुरक्त दिखाई देता है तथापि वह अपनी धर्मपत्नी धूता पर पूरी निष्ठा और अटूट प्रेम रखता है। वह हर समय उसको सम्मान देता है। वह उसका स्थान सदैव ऊँचा समझता है। वसन्तसेना के गहनों की चोरी का समाचार जब धूता को मिलता है तो वह मूर्च्छित हो जाती है। वह अपने पति की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिये अपनी बहुमूल्य रत्नावली दे देती है। उसको पाकर पहले चारुदत्त कुछ चिन्तित होता है परन्तु उसी समय अपनी पत्नी की बुद्धिमत्ता को समझते हुये उसके ऊपर गर्व करता हुआ कहता है--

'विभवानुगता भार्या ... ... ... ... ॥ ३।२८

४० मृच्छकटिक

दशम अंक में चारुदत्त के मृत्युदण्ड के समाचार से दुखी धूता के आत्मदाह का समाचार जानकर चारुदत्त घबड़ा जाता है। वह वसन्तसेना को प्राप्त करके भी अपनी धर्मपत्नी का वियोग नहीं चाहता है। वह उसको अकेले स्वर्ग जाना अच्छा नही मानता है।

न महीतलस्थितिसहानि भवच्चरितानि ।
... ... ... ... तव विहाय पतिम् ॥ १०।५६

जब अचानक वहाँ पहुँच कर अपने पुत्र रोहसेन को उठाकर आलिंगन करने लगता है। तब अपनी पत्नी से कहता है--

हा प्रेयसि ! प्रेयसि विद्यमाने
कोऽयं कठोरो व्यवसाय आसीत् ।
अम्भोजिनी - लोचनमुद्रणं किं
भानावदस्तंगमिते करोति ? ॥ १०।५८

(११) पुत्रस्नेहो—

चारुदत्त अपने एकमात्र पुत्र पर अपार स्नेह करता है। प्रथम अंक में वह उसे सायंकालीन शीतल हवा से बचाने के लिये अपना दुपट्टा देता है। (पृ० ११५) आगे नवम अंक में अपनी मृत्यु के पश्चात् अपने समान ही पुत्र से भी प्रेम करने के लिए विदूषक से आग्रह करता है।

नृणां लोकान्तरस्थानां देहप्रतिकृतिः सुतः ।
मयि यो वै तव स्नेहो रोहसेने स युज्यताम् ॥ ९।६२

दशम अंक में मृत्युदण्ड के समय चाण्डालों से पुत्रदर्शन की याचना करता है--"नापरीक्ष्यकारी दुराचारः पालक इव चाण्डालः, तत्परलोकार्थं पुत्रमुखं द्रष्टुमभ्यर्थये।" ( पृ० ५८५-८६ )

अल्प अवस्था वाले पुत्र के हाथों से भविष्य में दिये जाने वाले तर्पणजल के विषय में कहता है--

चिरं खलु भविष्यामि परलोके पिपासितः ।
अत्यल्पमिदमस्माकं निपावोदकभोजनम् ॥ १०।१७

मृत्यु का समय सोचकर ब्राह्मणों का विभूषण, देवकार्य तथा पितृकार्य का उपयोगी साधन 'यज्ञोपवीत' पुत्र को देता है। (१०।१८)
वहीं पुत्र का आलिंगन करता हुआ कहता है--

इदं तत् स्नेहसर्वस्वं सममाढ्यदरिद्रयोः ।
अचन्दनमनोशीरं हृदयस्यानुलेपनम् ॥ १०।२३

भूमिका ४१

पुत्र को शीघ्र ही घर जाने के लिये कहता हुआ सावधान करता है—

आश्रमं वत्स गन्तव्यं गृहीत्वार्यांच मातरम् । मा त्वयि पितृदोषेण त्वमप्येवं गमिष्यसि ॥ १०।३२

(१२) आदर्श मित्र

चारुदत्त एक आदर्श मित्र है । वह अपने हर मित्र के हर सुख-दुःख में साथ देने को तैयार रहता है । वह मित्रता की कसौटी को जानता है ! वह किसी की विपन्नता में मित्रता छोड़ने की निन्दा करता है ।

सत्यं न मे विभवनाशकृतास्ति चिन्ता भाग्यक्रमेण हि धनानि भवन्ति यान्ति । एतत्तु मां दहति नष्टधनाश्रयस्य यत्सौहृदादपि जनाः शिथिलीभवन्ति ॥ १।१६

यदा तु भाग्यक्षयपीडितां दशां नरः कृतान्तोपहितां प्रपद्यते । तदास्य मित्राण्यपि यान्त्यमित्रतां चिरानुरक्तोऽपि विरज्यते जनः ॥ १।५३

वह अच्छे मित्र की प्रशंसा करता है । विदूषक को वह एक अच्छा मित्र समझता है । वह कहता है—

'अये ! सर्वकालमित्रं मैत्रेयः !' ( पृ० ४१ ) ... ...... ...... सुख-दुःख-सुहृद्भवान् ॥ ३।२८

अपने शोक में विदूषक को प्राण छोड़ने से मना करता है ।

(१३) चारुदत्त की निर्धनता

एक अतिसम्पन्न परिवार में जन्म लेने पर भी अनवरत दान करने के कारण चारुदत्त बहुत अधिक निर्धन हो चुका है । अपनी निर्धनता से उसे कभी-कभी बहुत अधिक मानसिक क्लेश होता है । उसने अपनी निर्धनता में जो अनुभव किये हैं उन्हें सभी को बताना चाहता है । इस सम्बन्ध में प्रथम अंक के ९, १०, ११, १२, १३, १५, और ५३, पंचम अंक के ४०, ४१, ४२, श्लोक ध्यान देने योग्य हैं ।

(१४) भाग्यवादी

चारुदत्त कर्म की अपेक्षा भाग्य पर अधिक विश्वास करता है । इसीलिये सम्भवतः वह निर्धन होता चला जाता है । वह धनादि की प्राप्ति और हानि को भाग्याधीन ही मानता है ।

"भाग्यक्रमेण हि धनानि भवन्ति यान्ति ।" १।१३

४४ मृच्छकटिक

चारुदत्त से स्वयं मिलने के लिये आई हुई वसन्तसेना के विषय में विट का यह कहना महत्त्वपूर्ण है—

अपद्मा श्रीरेषा प्रहरणमनङ्गस्य ललितं,
कुलस्त्रीणां शोको, मदनवरवृक्षस्य कुसुमम्।
सलीलं गच्छन्ती, रतिसमयसज्जा-प्रणयिनी,
रतिक्षेत्रे रङ्गे प्रियपथिक-सार्थैरनुगता ॥ ५।२२

अष्टम अंक में शकार द्वारा वसन्तसेना का गला दबा दिये जाने पर उसकी मृत्यु से दुखी विट कहता है—

दाक्षिण्योदकवाहिनी विगलिता याता स्वदेशं रति-
र्हा हालङ्कृतभूषणे सुवदने क्रीडारसोद्भासिनि।
हा सौजन्यनदि प्रहासपुलिने हा मावृशामाश्रये
हा हा नश्यति मन्मथस्य विपणिः सौभाग्यपण्याकरः ॥ ८।३८

वह आगे शकार से कहता है—

अपापा पापकल्पेन नगरश्रीनिरपातिता । ८।३६

(२) वेश्या की अपेक्षा गणिका का वैशिष्ट्य

वेश्या शब्द सामान्यतया प्रयुक्त होता है परन्तु गणिका शब्द का प्रयोग सम्मानित तथा उच्चस्तरीय वेश्या के लिये होता है। यहाँ वसन्तसेना को गणिका के रूप में चित्रित किया गया है।

(३) अतुल वैभवशाली

वसन्तसेना उज्जायिनी की एक अतुल वैभव-सम्पन्न गणिका है। चतुर्थ अंक में विदूषक ने उसके भवनों और उनमें विद्यमान पदार्थों का वर्णन करते हुए उसे कुबेर भवन का अंश कहा है। (द्र० यत्सत्यं स्वर्गायत इदं गेहम्। ... यत्सत्यं खलु नन्दनवनमिव मे गणिकागृहं भासते। ......... किं तावद् गणिकागृहम्, अथवा कुवेरभवनपरिच्छेद इति ।) (पृ० २५२)

उसे धन की लिप्सा नहीं है। जब शकार द्वारा भेजी गयीं दश सहस्र मुद्राओं के कारण उसकी माता उसे शकार के पास जाने के लिये आदेश देती है तो वह तत्काल अस्वीकार कर देती है।

“यदि मां जीवन्तीमिच्छसि, तदैवं पुनरहं न मात्राऽऽज्ञापयितव्या ।” (पृ० २३५)

भूमिका

४५

प्रथम अंक में जब विट उसे वेश्या होने के कारण सभी की सेवा में उपस्थित होने का परामर्श देता है तो वह शकार को ठुकराती हुई कहती है—

"गुणः खल्वनुरागस्य कारणम्, न पुनर्बलात्कारः।" (पृ० ८०)

अष्टम अंक में जब गाड़ी बदल जाने के कारण वह शकार के उद्यान में पहुँच जाती है तब उसे देखकर विट कहता है—

'पूर्वं मानाववज्ञाय द्रव्यार्थे जननन्तेवशात्।' (८।१७)

यह सुनकर वह तुरन्त सिर हिलाकर निषेध करती है—"न"।

(४) निर्लोभता

गणिका होने पर भी वसन्तसेना में लोभ नहीं है। वह धन की चिन्ता नहीं करती है। द्वितीय अंक में जब मदनिका चारुदत्त के साथ उसका प्रेम जानती है तब वह कहती है—"दरिद्रः खलु सः श्रूयते।" इस पर वसन्तसेना तत्काल उत्तर देती है—

"अत एव काम्यते। दरिद्रपुरुषसंक्रान्तमनाः खलु गणिका लोकेऽवचनीया भवति। (पृ० १३३)

चतुर्थ अंक में विदूषक के मुख से चारुदत्त द्वारा गहनों का जुए में हारना मालूम होता है। इसके बदले में उसे रत्नावली प्राप्त होती है। परन्तु इसके पूर्व वह शर्विलक के हाथ से चुराये गये अपने आभूषण प्राप्त कर चुकी है। अतः वह उदारता देख कर चारुदत्त पर और अधिक आकृष्ट हो जाती है "कथं चौरैरपहृतमपि शौण्डीरतया द्यूते हारितमिति भणति। अत एव काम्यते।" (पृ० २६५) शकार द्वारा भेजी गयी दश हजार मुद्राओं को वह बिना किसी सोच-विचार के ठुकरा देती है। वह गहनों के बदले में पाई हुई रत्नावली को वापस देने के लिए स्वयं जाती है। और चारुदत्त की धर्मपत्नी धूता के पास विनयपूर्वक भेजती है कि उसे लेकर उस पर अनुग्रह करें।

द्वितीय अंक में जुआ में कर्ज लेकर हारा हुआ संवाहक जब उसके पास पहुँचता है और पीछे-पीछे कर्जदार। वह संवाहक को चारुदत्त का सेवक जानकर तत्काल सोने के कड़े भिजवा कर उसे ऋणमुक्त करा देती है।

शर्विलक चोरी करने के बाद जब मदनिका को प्राप्त करने की इच्छा से वसन्तसेना के पास जाता है। वह मदनिका से पूछता है कि क्या तुम्हारी स्वामिनी धन लेकर तुम्हें मुक्त कर देगी। तब वह जवाब देती है कि स्वामिनी का वश चले