भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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भूमिका

३७

वसन्तसेना के गहनों के बदले में जब उसकी पत्नी धूता अपनी बहुमूल्य रत्नावली दे देती है तब प्रसन्न होकर चारुदत्त कहता है ।

विभवानुगता भार्या सुखदुःखसुहृद् भवान् ।
सत्यं च न परिभ्रष्टं यद्दरिद्रेषु दुर्लभम् ॥ ३।२८

न्यायालय में जब वसन्तसेना की हत्या के लिये उसे अपराधी सिद्ध किया जा रहा है उसी समय शकार के साथ झगड़ा करने वाले विदूषक की कुक्षि से गहने गिर पड़ते हैं। उनके बारे में वह सच ही बोलता है कि ये गहने वसन्तसेना के हैं। (पृ० ५५९) वह झूठ बोलकर अपनी रक्षा नहीं करना चाहता है।

(६) धर्माचारपरायण —

मृच्छकटिक के प्रारम्भ से ही चारुदत्त एक धर्म-कर्मनिरत व्यक्ति के रूप में दिखाई देता है। वह देवी, देवताओं की पूजा और उनके लिये बलिप्रदानादि कार्य में प्रमाद नहीं करता है। उनको नित्य कर्तव्य मानता है। वह सन्ध्यावन्दन और समाधि भी लगाता है। जब विदूषक इसके धर्माचार की आलोचना करता है तब वह कहता है “वयस्य ! मा मैवम्, गृहस्थस्य नित्योऽयं विधिः ।” (पृ० ५२)

तपसा मनसा वाग्भिः पूजिता बलिकर्मभिः ॥१।१६

उसको अपने धर्माचरण पर पूर्ण विश्वास है। दशम अंक में उसे जब मृत्युदण्ड दे दिया जाता है तब भी वह धर्म पर विश्वास नहीं छोड़ता है ।

“प्रभवति यदि धर्मो दूषितस्यापि मेऽद्य ॥१०।३४

(७) प्रतिष्ठाप्रेमी—

चारुदत्त को अपने कुल की और अपनी मान-प्रतिष्ठा का ध्यान सदा रहता है। वह ऐसा कोई आचरण नहीं करना चाहता है जिससे उसकी अथवा उसके वंश की मान-प्रतिष्ठा को धक्का लगता हो । वसन्तसेना के गहनों की चोरी के सम्बन्ध में विदूषक द्वारा झूठ बुलवाये जाने के उत्तर में कहता है — “अनृतं नाभिधास्यामि चारित्रभ्रंशकारकम् ।” (३।२६)

जब उस पर वसन्तसेना की हत्या का अपराध सिद्ध हो जाता है तो उसको अपनी मृत्यु का कोई कष्ट नहीं है अपि तु केवल चरित्रपतन का ही है—

“न भीतो मरणादस्मि केवलं दूषितं यशः । (१०।२७)
तेनास्म्यकृत-वैरेण क्षुद्रेणात्यल्पबुद्धिना ।
शरेणेव विषाक्तेन दूषितेनापि दूषितः ॥ १०।२८