मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ मृच्छकटिक
प्राप्यैतद्व्यसन - महार्णव - प्रपातं । .........वक्तव्यं यदिह मया हता - प्रियेति ॥ १०।३३
अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिये वह एक झूठ भी बोलता है। जब वसन्तसेना के गहनों की चोरी हो जाती है तो वह उन गहनों को जुये में हार जाने की बात वसन्तसेना से कहलवाता है और गहनों के बदले में बहुमूल्य रत्नावली भेजता है। वह जानता है कि सत्य बात जानने पर वसन्तसेना रत्नावली नहीं लेगी। और समाज के लोग उसकी गरीबी के कारण सच घटना पर विश्वास नहीं करेंगे। फलस्वरूप चारों ओर उसकी बदनामी होगी। वह विदूषक से कहता है—
“कः [श्रद्धास्यति भूतार्थं सर्वो मां तुलयिष्यति।” ३।२४ “यं समालम्ब्य विश्वासं न्यासोऽस्मासु तया कृतः। तस्यैतन्महतो मूल्यं प्रत्ययस्यैव दीयते ॥” ३।२६
(८) कलाप्रेमी—गुणग्राही —
वह एक गुणग्राही के रूप में सामने आता है। वह हर अच्छी कला का सम्मान करता है। संगीत के प्रति उसकी विशेष रुचि है। कामदेवायतन उद्यान में इसी प्रसंग में उपस्थित उसको देखकर वसन्तसेना उस पर आकृष्ट हुई थी। उसकी इस आदत से चेट प्रसन्न नहीं है। वह इसे स्वाभाविक दोष मानता है।
“योऽपि स्वाभाविकदोषो न शक्यो वारयितुम् ।” ३।२
वह वीणा को बहुत पसन्द करता है। रेभिल के यहाँ संगीत सुनने के बाद भी वह उसका आनन्दानुभव करता रहता है।
शर्विलक द्वारा लगायी गयी कलापूर्ण सेंध को देखकर उसकी प्रशंसा करने लगता है—‘‘अहो, दर्शनीयोऽयं सन्धिः। कथमस्मिन्नपि कर्मणि कुशलता ?” (पृष्ठ २१७)
(६) आदर्श प्रेमी—
मृच्छकटिक में चारुदत्त को एक उच्च कोटि का आदर्श प्रेमी चित्रित किया गया है। वह एक सर्वश्रेष्ठ परम सुन्दरी गणिका को चाहता है किन्तु प्रेम-व्यवहार के प्रदर्शन में वह गणिका ही पहले कदम उठाती है। चारुदत्त को शकार द्वारा कहलाये गये विदूषक के माध्यम से यह ज्ञात होता है कि वसन्तसेना उस पर अनुरक्त है "एसा वसन्तसेना कामदेवाअदणुज्जाणादो पहुदि भवन्तमणुरत्ता।" (पृ० ८०) परन्तु वह अपनी निर्धनता से खूब परिचित है। अतः अपने घर आई हुई भी वसन्तसेना को देखकर प्रसन्न होकर भी सोचता है कि मेरा प्रेम मुझ तक ही सीमित रहने वाला है--