मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका
यया मे जनितः कामः क्षीणे विभवविस्तरे ।
क्रोधः कुपुरुषस्येव स्वगात्रेष्वेव सीदति ॥ १।५५
आगे जब विदूषक वसन्तसेना के घर जाकर उसे रत्नावली देकर उसके व्यवहार से रुष्ट होकर लौटता है और चारुदत्त से वेश्या-सम्बन्ध तोड़ने को कहता है, तब वह अपनी स्थिति समझता हुआ उत्तर देता है "वयस्य ! अलमिदानीं परीवादमुक्त्वा । अवस्थयैवास्मि निवारितः ।"
वेगं करोति तुरगस्त्वरितं प्रयातुं
... ... ... ... पुनर्विशन्ति ॥ ५।८
यस्यार्थास्तस्य सा कान्ता धनहार्यो ह्यसौ जनः ।
वयमर्थैः परित्यक्ता ननु त्यक्तैव सा मया ॥ ५।६
न्यायालय में जब उसकी मित्रता वसन्तसेना के साथ पूछी जाती है तो वह कुछ लज्जित होकर उत्तर देता है "भो अधिकृताः ! मम मित्रमिति । अथवा यौवन-मत्रापराध्यति ।” (पृ० ५३५ ) वह वसन्तसेना के बिना अपने जीवन को व्यर्थ समझता है । वह मृत्युदण्ड स्वीकार करते हुये कहता है - “न च मे वसन्तसेना-विरहितस्य जीवनेन कृत्यम् ।” (पृ० ५६० )
वह यद्यपि गणिका वसन्तसेना से प्रेम करता है किन्तु अन्यत्र इस विषय में सावधान है। वह स्त्रीलम्पट नहीं है। प्रथम अंक में जब भ्रमवश रदनिका समझकर वसन्तसेना पर अपना दुपट्टा ( अपने पुत्र को उड़ाने के लिये) फेंक देता है तब अन्य स्त्री का ज्ञान होते ही पश्चात्ताप करने लगता है--“न युक्तं परकलत्र-दर्शनम् ।” (पृ० ११८ )
(१०) पत्नी का महत्त्व समझने वाला—
यद्यपि प्रारम्भ से ही वह गणिका वसन्तसेना पर अनुरक्त दिखाई देता है तथापि वह अपनी धर्मपत्नी धूता पर पूरी निष्ठा और अटूट प्रेम रखता है। वह हर समय उसको सम्मान देता है। वह उसका स्थान सदैव ऊँचा समझता है। वसन्तसेना के गहनों की चोरी का समाचार जब धूता को मिलता है तो वह मूर्च्छित हो जाती है। वह अपने पति की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिये अपनी बहुमूल्य रत्नावली दे देती है। उसको पाकर पहले चारुदत्त कुछ चिन्तित होता है परन्तु उसी समय अपनी पत्नी की बुद्धिमत्ता को समझते हुये उसके ऊपर गर्व करता हुआ कहता है--
'विभवानुगता भार्या ... ... ... ... ॥ ३।२८