भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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४० मृच्छकटिक

दशम अंक में चारुदत्त के मृत्युदण्ड के समाचार से दुखी धूता के आत्मदाह का समाचार जानकर चारुदत्त घबड़ा जाता है। वह वसन्तसेना को प्राप्त करके भी अपनी धर्मपत्नी का वियोग नहीं चाहता है। वह उसको अकेले स्वर्ग जाना अच्छा नही मानता है।

न महीतलस्थितिसहानि भवच्चरितानि ।
... ... ... ... तव विहाय पतिम् ॥ १०।५६

जब अचानक वहाँ पहुँच कर अपने पुत्र रोहसेन को उठाकर आलिंगन करने लगता है। तब अपनी पत्नी से कहता है--

हा प्रेयसि ! प्रेयसि विद्यमाने
कोऽयं कठोरो व्यवसाय आसीत् ।
अम्भोजिनी - लोचनमुद्रणं किं
भानावदस्तंगमिते करोति ? ॥ १०।५८

(११) पुत्रस्नेहो—

चारुदत्त अपने एकमात्र पुत्र पर अपार स्नेह करता है। प्रथम अंक में वह उसे सायंकालीन शीतल हवा से बचाने के लिये अपना दुपट्टा देता है। (पृ० ११५) आगे नवम अंक में अपनी मृत्यु के पश्चात् अपने समान ही पुत्र से भी प्रेम करने के लिए विदूषक से आग्रह करता है।

नृणां लोकान्तरस्थानां देहप्रतिकृतिः सुतः ।
मयि यो वै तव स्नेहो रोहसेने स युज्यताम् ॥ ९।६२

दशम अंक में मृत्युदण्ड के समय चाण्डालों से पुत्रदर्शन की याचना करता है--"नापरीक्ष्यकारी दुराचारः पालक इव चाण्डालः, तत्परलोकार्थं पुत्रमुखं द्रष्टुमभ्यर्थये।" ( पृ० ५८५-८६ )

अल्प अवस्था वाले पुत्र के हाथों से भविष्य में दिये जाने वाले तर्पणजल के विषय में कहता है--

चिरं खलु भविष्यामि परलोके पिपासितः ।
अत्यल्पमिदमस्माकं निपावोदकभोजनम् ॥ १०।१७

मृत्यु का समय सोचकर ब्राह्मणों का विभूषण, देवकार्य तथा पितृकार्य का उपयोगी साधन 'यज्ञोपवीत' पुत्र को देता है। (१०।१८)
वहीं पुत्र का आलिंगन करता हुआ कहता है--

इदं तत् स्नेहसर्वस्वं सममाढ्यदरिद्रयोः ।
अचन्दनमनोशीरं हृदयस्यानुलेपनम् ॥ १०।२३