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मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

४० मृच्छकटिक

दशम अंक में चारुदत्त के मृत्युदण्ड के समाचार से दुखी धूता के आत्मदाह का समाचार जानकर चारुदत्त घबड़ा जाता है। वह वसन्तसेना को प्राप्त करके भी अपनी धर्मपत्नी का वियोग नहीं चाहता है। वह उसको अकेले स्वर्ग जाना अच्छा नही मानता है।

न महीतलस्थितिसहानि भवच्चरितानि ।
... ... ... ... तव विहाय पतिम् ॥ १०।५६

जब अचानक वहाँ पहुँच कर अपने पुत्र रोहसेन को उठाकर आलिंगन करने लगता है। तब अपनी पत्नी से कहता है--

हा प्रेयसि ! प्रेयसि विद्यमाने
कोऽयं कठोरो व्यवसाय आसीत् ।
अम्भोजिनी - लोचनमुद्रणं किं
भानावदस्तंगमिते करोति ? ॥ १०।५८

(११) पुत्रस्नेहो—

चारुदत्त अपने एकमात्र पुत्र पर अपार स्नेह करता है। प्रथम अंक में वह उसे सायंकालीन शीतल हवा से बचाने के लिये अपना दुपट्टा देता है। (पृ० ११५) आगे नवम अंक में अपनी मृत्यु के पश्चात् अपने समान ही पुत्र से भी प्रेम करने के लिए विदूषक से आग्रह करता है।

नृणां लोकान्तरस्थानां देहप्रतिकृतिः सुतः ।
मयि यो वै तव स्नेहो रोहसेने स युज्यताम् ॥ ९।६२

दशम अंक में मृत्युदण्ड के समय चाण्डालों से पुत्रदर्शन की याचना करता है--"नापरीक्ष्यकारी दुराचारः पालक इव चाण्डालः, तत्परलोकार्थं पुत्रमुखं द्रष्टुमभ्यर्थये।" ( पृ० ५८५-८६ )

अल्प अवस्था वाले पुत्र के हाथों से भविष्य में दिये जाने वाले तर्पणजल के विषय में कहता है--

चिरं खलु भविष्यामि परलोके पिपासितः ।
अत्यल्पमिदमस्माकं निपावोदकभोजनम् ॥ १०।१७

मृत्यु का समय सोचकर ब्राह्मणों का विभूषण, देवकार्य तथा पितृकार्य का उपयोगी साधन 'यज्ञोपवीत' पुत्र को देता है। (१०।१८)
वहीं पुत्र का आलिंगन करता हुआ कहता है--

इदं तत् स्नेहसर्वस्वं सममाढ्यदरिद्रयोः ।
अचन्दनमनोशीरं हृदयस्यानुलेपनम् ॥ १०।२३

भूमिका ४१

पुत्र को शीघ्र ही घर जाने के लिये कहता हुआ सावधान करता है—

आश्रमं वत्स गन्तव्यं गृहीत्वार्यांच मातरम् । मा त्वयि पितृदोषेण त्वमप्येवं गमिष्यसि ॥ १०।३२

(१२) आदर्श मित्र

चारुदत्त एक आदर्श मित्र है । वह अपने हर मित्र के हर सुख-दुःख में साथ देने को तैयार रहता है । वह मित्रता की कसौटी को जानता है ! वह किसी की विपन्नता में मित्रता छोड़ने की निन्दा करता है ।

सत्यं न मे विभवनाशकृतास्ति चिन्ता भाग्यक्रमेण हि धनानि भवन्ति यान्ति । एतत्तु मां दहति नष्टधनाश्रयस्य यत्सौहृदादपि जनाः शिथिलीभवन्ति ॥ १।१६

यदा तु भाग्यक्षयपीडितां दशां नरः कृतान्तोपहितां प्रपद्यते । तदास्य मित्राण्यपि यान्त्यमित्रतां चिरानुरक्तोऽपि विरज्यते जनः ॥ १।५३

वह अच्छे मित्र की प्रशंसा करता है । विदूषक को वह एक अच्छा मित्र समझता है । वह कहता है—

'अये ! सर्वकालमित्रं मैत्रेयः !' ( पृ० ४१ ) ... ...... ...... सुख-दुःख-सुहृद्भवान् ॥ ३।२८

अपने शोक में विदूषक को प्राण छोड़ने से मना करता है ।

(१३) चारुदत्त की निर्धनता

एक अतिसम्पन्न परिवार में जन्म लेने पर भी अनवरत दान करने के कारण चारुदत्त बहुत अधिक निर्धन हो चुका है । अपनी निर्धनता से उसे कभी-कभी बहुत अधिक मानसिक क्लेश होता है । उसने अपनी निर्धनता में जो अनुभव किये हैं उन्हें सभी को बताना चाहता है । इस सम्बन्ध में प्रथम अंक के ९, १०, ११, १२, १३, १५, और ५३, पंचम अंक के ४०, ४१, ४२, श्लोक ध्यान देने योग्य हैं ।

(१४) भाग्यवादी

चारुदत्त कर्म की अपेक्षा भाग्य पर अधिक विश्वास करता है । इसीलिये सम्भवतः वह निर्धन होता चला जाता है । वह धनादि की प्राप्ति और हानि को भाग्याधीन ही मानता है ।

"भाग्यक्रमेण हि धनानि भवन्ति यान्ति ।" १।१३

४४ मृच्छकटिक

चारुदत्त से स्वयं मिलने के लिये आई हुई वसन्तसेना के विषय में विट का यह कहना महत्त्वपूर्ण है—

अपद्मा श्रीरेषा प्रहरणमनङ्गस्य ललितं,
कुलस्त्रीणां शोको, मदनवरवृक्षस्य कुसुमम्।
सलीलं गच्छन्ती, रतिसमयसज्जा-प्रणयिनी,
रतिक्षेत्रे रङ्गे प्रियपथिक-सार्थैरनुगता ॥ ५।२२

अष्टम अंक में शकार द्वारा वसन्तसेना का गला दबा दिये जाने पर उसकी मृत्यु से दुखी विट कहता है—

दाक्षिण्योदकवाहिनी विगलिता याता स्वदेशं रति-
र्हा हालङ्कृतभूषणे सुवदने क्रीडारसोद्भासिनि।
हा सौजन्यनदि प्रहासपुलिने हा मावृशामाश्रये
हा हा नश्यति मन्मथस्य विपणिः सौभाग्यपण्याकरः ॥ ८।३८

वह आगे शकार से कहता है—

अपापा पापकल्पेन नगरश्रीनिरपातिता । ८।३६

(२) वेश्या की अपेक्षा गणिका का वैशिष्ट्य

वेश्या शब्द सामान्यतया प्रयुक्त होता है परन्तु गणिका शब्द का प्रयोग सम्मानित तथा उच्चस्तरीय वेश्या के लिये होता है। यहाँ वसन्तसेना को गणिका के रूप में चित्रित किया गया है।

(३) अतुल वैभवशाली

वसन्तसेना उज्जायिनी की एक अतुल वैभव-सम्पन्न गणिका है। चतुर्थ अंक में विदूषक ने उसके भवनों और उनमें विद्यमान पदार्थों का वर्णन करते हुए उसे कुबेर भवन का अंश कहा है। (द्र० यत्सत्यं स्वर्गायत इदं गेहम्। ... यत्सत्यं खलु नन्दनवनमिव मे गणिकागृहं भासते। ......... किं तावद् गणिकागृहम्, अथवा कुवेरभवनपरिच्छेद इति ।) (पृ० २५२)

उसे धन की लिप्सा नहीं है। जब शकार द्वारा भेजी गयीं दश सहस्र मुद्राओं के कारण उसकी माता उसे शकार के पास जाने के लिये आदेश देती है तो वह तत्काल अस्वीकार कर देती है।

“यदि मां जीवन्तीमिच्छसि, तदैवं पुनरहं न मात्राऽऽज्ञापयितव्या ।” (पृ० २३५)

भूमिका

४५

प्रथम अंक में जब विट उसे वेश्या होने के कारण सभी की सेवा में उपस्थित होने का परामर्श देता है तो वह शकार को ठुकराती हुई कहती है—

"गुणः खल्वनुरागस्य कारणम्, न पुनर्बलात्कारः।" (पृ० ८०)

अष्टम अंक में जब गाड़ी बदल जाने के कारण वह शकार के उद्यान में पहुँच जाती है तब उसे देखकर विट कहता है—

'पूर्वं मानाववज्ञाय द्रव्यार्थे जननन्तेवशात्।' (८।१७)

यह सुनकर वह तुरन्त सिर हिलाकर निषेध करती है—"न"।

(४) निर्लोभता

गणिका होने पर भी वसन्तसेना में लोभ नहीं है। वह धन की चिन्ता नहीं करती है। द्वितीय अंक में जब मदनिका चारुदत्त के साथ उसका प्रेम जानती है तब वह कहती है—"दरिद्रः खलु सः श्रूयते।" इस पर वसन्तसेना तत्काल उत्तर देती है—

"अत एव काम्यते। दरिद्रपुरुषसंक्रान्तमनाः खलु गणिका लोकेऽवचनीया भवति। (पृ० १३३)

चतुर्थ अंक में विदूषक के मुख से चारुदत्त द्वारा गहनों का जुए में हारना मालूम होता है। इसके बदले में उसे रत्नावली प्राप्त होती है। परन्तु इसके पूर्व वह शर्विलक के हाथ से चुराये गये अपने आभूषण प्राप्त कर चुकी है। अतः वह उदारता देख कर चारुदत्त पर और अधिक आकृष्ट हो जाती है "कथं चौरैरपहृतमपि शौण्डीरतया द्यूते हारितमिति भणति। अत एव काम्यते।" (पृ० २६५) शकार द्वारा भेजी गयी दश हजार मुद्राओं को वह बिना किसी सोच-विचार के ठुकरा देती है। वह गहनों के बदले में पाई हुई रत्नावली को वापस देने के लिए स्वयं जाती है। और चारुदत्त की धर्मपत्नी धूता के पास विनयपूर्वक भेजती है कि उसे लेकर उस पर अनुग्रह करें।

द्वितीय अंक में जुआ में कर्ज लेकर हारा हुआ संवाहक जब उसके पास पहुँचता है और पीछे-पीछे कर्जदार। वह संवाहक को चारुदत्त का सेवक जानकर तत्काल सोने के कड़े भिजवा कर उसे ऋणमुक्त करा देती है।

शर्विलक चोरी करने के बाद जब मदनिका को प्राप्त करने की इच्छा से वसन्तसेना के पास जाता है। वह मदनिका से पूछता है कि क्या तुम्हारी स्वामिनी धन लेकर तुम्हें मुक्त कर देगी। तब वह जवाब देती है कि स्वामिनी का वश चले

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तो वह बिना धन के सभी को मुक्त कर दें—‘‘यदि मम छन्दस्तदा विनाऽर्थं सर्वं परिजनमभुजिष्यं करिष्यामि।’’ (पृ० २४१-४२)

उसकी निर्लोभता और वात्सल्य पर ही इस नाटक (प्रकरण) की आधार-शिला है। षष्ठ अंक में जब दासी चारुदत्त के पुत्र को मिट्टी की गाड़ी से खिलाना चाहती है किन्तु वह पड़ोसी के लड़के की सोने की गाड़ी से ही खेलने की जिद करता है। तब वसन्तसेना उसे देख कर अपने ऊपर नियन्त्रण नहीं कर पाती है। वह उस बच्चे की मार्मिक बातें सुन कर तत्काल अपने गहने उतार कर दे देती है और कहती है कि इन गहनों से अपनी गाड़ी बनवा कर खेलो। (पृ० ३७३)

(५) अतिप्रतिभाशाली

वसन्तसेना एक अति प्रतिभासम्पन्न गणिका है। उसे विविध कलाओं का अच्छा ज्ञान है। वह किसी बात का तात्पर्य समझने में अति कुशल है। प्रथम अंक में जब शकारादि से घिर जाती है और विट रहस्यमय ढंग से कुछ कहता है तो वह उसका आशय समझ कर तदनुसार आचरण करती है। अपनी माला और पैर के नूपुर हटा देती है। चारुदत्त के पास गहने धरोहर रखने के लिये भी वह अकाट्य तर्क देती है ‘‘पुरुषेषु न्यासा निक्षिप्यन्ते न पुनर्गेहेषु।’’ (पृ० १२१) द्वितीय अंक में मदनिका के साथ चारुदत्त के विषय में बातचीत करती हुई भी अपनी बुद्धिमत्ता दिखाती है। चतुर्थ अंक में शर्विलक और मदनिका की गुप्त बातें सुनकर वह तत्काल उसका आशय समझ लेती है। और इसीलिये शर्विलक द्वारा गहने दिये जाने पर वह उसे उसके बदले में मदनिका देती हुई अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करती है—‘‘अहमार्यचारुदत्तेन भणिता य इममलङ्कारकं समर्पयिष्यति तस्य त्वया मदनिका दातव्या। तत् स एवैतां ते ददातीत्यार्येणावगन्तव्यम्।’’ (पृ० २६३-६४) पंचम अंक में जब चारुदत्त के पास अभिसार के लिये जाती है तो मार्ग में विट द्वारा मेघों का वर्णन सुनकर स्वयं भी उसी स्तर का वर्णन करने लगती है। वहाँ का वर्णन गंभीर और प्रभावोत्पादक है। संस्कृतभाषा का प्रयोग करती है। (द्र० ५।१५, १६, १८, २०) चारुदत्त से अकेले मिलने के लिये बड़ी चतुरता से छत्रधारिणी को विट के पास ही रहने देती है, जिससे विट कहने लगता है—‘‘अनेनोपायेन निपुणं प्रेषितोस्मि।’’ (पृ० ३४५) षष्ठ अंक में जब चारुदत्त के भवन के भीतर अपने को देखती है तब अपने को गणिका होने से वह प्रवेश की अपराधिनी समझ कर कहती है कि क्या मेरे आने से चारुदत्त के परिजनों को सन्ताप हो रहा है? (पृ० ३६६) आगे रदनिका के साथ लाये गये चारुदत्त के पुत्र के साथ बातचीत करते समय बालक की मार्मिक बातें सुनकर उनका आशय समझ कर तत्काल अपने गहने उतार कर दे देती है और कहती है कि इनसे गाड़ी बनवाकर खेलो। (पृ० ३७३)

भूमिका ४७

अष्टम अंक में जब गाड़ी बदल जाने के कारण शकार के पास पहुँच जाती है और विट इससे अप्रसन्न होकर कुछ कहता है तो उसके प्रश्नों का उत्तर बड़ी कुशलता से देती है । पंचम अंक में विट ने उसकी कलाभिज्ञता स्पष्ट कही है—

'सकलकलाभिज्ञायाः न किंचिदपि उपदेष्टव्यमस्ति ।' (पृ० ३४२)

(६) चारुदत्त से अटूट प्रेमभावना

कामदेवायतन उद्यान में जब से चारुदत्त को देखा है तभी से वह उस पर आसक्त हो जाती है । वह हर मूल्य पर चारुदत्त को पाना चाहती है । प्रथम अंक से ही शकार की बातों से उसका चारुदत्त के साथ प्रेम-सम्बन्ध ज्ञात हो जाता है । उसके इस प्रेम के लिये जब शकारादि उससे कहते हैं तो वह अपने को गर्वान्वित समझती है । जुआ में हार कर कर्जदार बना हुआ संवाहक जब उसके पास आता है तब वह उसे चारुदत्त का सेवक जानकर बहुत प्रसन्न होती है और स्नेहभाव प्रदर्शित करके सोने के कड़े भिजवा कर उसे ऋणमुक्त करा देती है । वहीं मदनिका से बात करती हुई चारुदत्त के साथ अपने प्रेमसम्बन्ध को प्रकट कर देती है । जब मदनिका चारुदत्त की निर्धनता का संकेत करती है तो वह जवाब देती है--“अत एव काम्यते । दरिद्र-पुरुष-संक्रान्तमनाः खलु गणिका लोकेऽवचनीया भवति ।” (पृ० १३३)

प्रथम अंक में जब चारुदत्त भ्रम से उस पर अपना दुपट्टा डाल देता है और वास्तविकता प्रकट होने पर अपने कृत्य के लिये खेद प्रकट करता है । तब वह अपने मन में इसे अच्छा समझती हुई हर्ष प्रकट करती है । कर्णपूरक को प्राप्त हुआ दुपट्टा जब उसे मिलता है, उसमें चारुदत्त का नाम पड़ती है तो आनन्द से तत्काल ओढ़ लेती है । वह अपने गहने भी इसी लिये चारुदत्त के पास धरोहर रखती है कि उस कारण उसे उससे अधिक मिलने का अवसर प्राप्त होता रहेगा । चारुदत्त द्वारा विदूषक के हाथों भिजवायी गई रत्नमाला वापस देने के लिये स्वयं ही आती है । वह गहनों की चोरी की घटना की सारी बातें कहने के बाद विदूषक के मुख से वर्षा का ज्ञान प्राप्त करके शृंगारभाव प्रकट करती हुई पहले स्वयं ही आलिंगन करती है । यह उसके प्रबल अनुराग का स्पष्ट उदाहरण है । वह प्रेम में गुण को प्रमुख कारण मानती है—“गुणः खल्वनुरागस्य कारणम्, न पुनर्बलात्कारः ।” (पृ० ८०) इसी लिए अति सम्पन्न राजश्यालक द्वारा प्रेषित विपुल धनराशि को ठुकरा कर निर्धन जानते हुए भी चारुदत्त से विशुद्ध प्रेम करती है । गाड़ी बदल जाने से भ्रमवश जब शकार के सामने पहुँच जाती है और बलपूर्वक प्रेम करने को बाध्य की जाती है तब भी वह मृत्यु की चिन्ता नहीं करती है और

४८मृच्छकटिक

चारुदत्त के साथ ही प्रेम कहती रहती है। इसी कारण क्रुद्ध होकर शकार उसका गला दबा कर मार डालता है। दशम अंक में जब अपनी हत्या के अपराध में चारुदत्त के मृत्युदण्ड का ज्ञान होता है तब अपनी पूरी शक्ति लगा कर दौड़ती हुई आकर उसे मृत्युदण्ड देने से रोकती है और चारुदत्त के वक्षस्थल पर गिर जाती है। उसके इस प्रबल प्रेम के कारण ही नया राजा बना ‘आर्यक’ उसे चारुदत्त की वधू बना देता है––

“आर्ये वसन्तसेने ! परितुष्टो राजा भवतीं बधूशब्देनानुगृह्णाति ।” (पृ० ६४७)

(७) धूता के प्रति आदरभावना

वसन्तसेना अपनी सामाजिक मर्यादा के प्रति सदैव सावधान रहती है। वह जब सबसे पहले चारुदत्त के घर अचानक पहुँचती है और उन लोगों द्वारा पहचान ली जाती है तब वह अपराध समझकर क्षमायाचना करने लगती है––

“एतेनानुचितभूमिकारोहणेनापराद्धयं शीर्षेण प्रणम्य प्रसादयामि ।” (पृ० १२१)

जब उसके गहनों की चोरी के बदले में चारुदत्त अपनी पत्नी धूता की बहुमूल्य रत्नावली उसके पास भेजता है तब वह उसे स्वीकार तो कर लेती है जिससे चारुदत्त के मन को ठेस न पहुँचे। परन्तु धूता के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए स्वयं वापस लौटाने जाती है और वह उस रात में उसके घर रहती है। प्रातः काल चेटी द्वारा धूता के पास रत्नावली भेजती हुई कहती है––

“चेटि ! गृहाणैतां रत्नावलीं मम भगिन्या आर्यधूतायै गत्वा समर्पय । वक्तव्यं च––‘अहं श्रीचारुदत्तस्य गुणनिर्जिता दासी तदा युष्माकमपि । तदेषा तवैव कण्ठाभरणं भवतु ।’” (पृ० ३६५)

इससे धूता के प्रति उसकी अतिशय सम्मानभावना प्रकट होती है। दशम अंक में अग्निप्रवेश के समय जब वह धूता के पास पहुँचती है और चारुदत्त को जीवित देखकर धूता अपना अग्निदाह रोक देती है, वसन्तसेना को साथ में देखकर कहती है “दिष्ट्या कुशलिनी भगिनी ।” तब वसन्तसेना कहती है “अधुना कुशलिनी संवृत्तास्मि ।” (पृ० ६४७) वह चारुदत्त से प्रगाढ़ प्रेम करती हुई भी धूता के प्रति सदैव सम्मान-भावना और सद्भाव रखती है।

(८) रोहसेन के प्रति वात्सल्य

वसन्तसेना गणिका होने के कारण सन्तानसुख से वंचित है। परन्तु उसके मन में स्त्रीसुलभ मातृत्व विद्यमान है। प्रथम अंक में वह चारुदत्त के पुत्र रोहसेन को जान लेती है। षष्ठ अंक में रदनिका जब गोद में लेकर उसे वसन्तसेना के पास लाती है, तब उसको रोता हुआ देख कर उसके बारे में पूछती है––

“रदनिके ! स्वागतं ते, कस्य पुनरयं दारकः अनलंकृतशरीरोऽपि चन्द्रमुख आनन्दयति माम् ।”

भूमिका ४९

(पृ० ३७१) जब रदनिका उसे चारुदत्त का पुत्र बतलाती है तब उसका स्नेह उमड़ पड़ता है। वह हाथ फैलाकर कहती है- "एहि मे पुत्रक! आलिङ्ग।" यह कहकर गोद में उठा लेती है। चारुदत्त के समान सुन्दर रूप देखकर मुग्ध हो जाती है। पूछे जाने पर अपना परिचय देती है "ते पितुर्गुणनिर्जिता दासी।" वहाँ बालक की भोली भाली किन्तु मार्मिक बातें सुनकर उसका हृदय द्रवित हो जाता है। वह अति भावुक होकर बोलती है- "जात! मुग्धेन मुखेनातिकरुणं मन्त्रयसि।" वह तत्काल बालक की इच्छा पूरी करने के लिये अपने सभी गहने उतार कर दे देती है और कहती है- "एषेदानीं ते जननी संवृत्ता। तद्गृहाणैतमलंकारम्, सौवर्ण-शकटिकां कारय।" (पृ० ३७३) यहाँ मिट्टी की गाड़ी के बदले सोने की गाड़ी से खेलने की जिद पूरी करती है। इसी घटनाचक्र पर यह नाटक (प्रकरण) केन्द्रित है।

(६) धर्माचरण में प्रवृत्ति

गणिका होने पर भी वह सामान्यतया नित्य स्नान और देवतार्चन आदि करती है। द्वितीय अंक में जब माता की आज्ञा होती है कि स्नान करके देवताओं की पूजा सम्पन्न करो। तब उद्विग्नचित्त होने से वह कह देती है- "चेटि! विज्ञापय मातरम् अद्य न स्नास्यामि। तद् ब्राह्मण एव पूजां निर्वर्तयतु।" (पृ०१२९)

(१०) उपसंहार

इस प्रकार यह ज्ञात होता है कि मृच्छकटिक में वसन्तसेना एक अनुपम सुन्दरी, नवयौवना गणिका के रूप में चित्रित होने पर भी वह अति उदार, सरल, भावुक, बड़ों का सम्मान करने वाली, छोटों पर स्नेह करने वाली, सभी के सुख, दुःख को समझने वाली, पवित्र प्रेम की उपासिका और कुलीन स्त्री के समान आचरण करने का प्रयास करने वाली है। गणिका होने पर भी उसे धन की लिप्सा नहीं है। उसका व्यवहार सभी को प्रभावित करने वाला है। उसका एक-मात्र दोष है गणिका होना, इसी कारण शकार द्वारा चाही जाने पर भी जब उसे नहीं स्वीकार करती है और वह गला दबाकर मार डालता डालता है तब शोकातुर विट कहता है-

"अन्यस्यामपि जातौ मा वेश्या भूस्त्वं हि सुन्दरि।
चारित्र्यगुणसम्पन्ने जायेथाः विमले कुले ॥८।४३

उसी अवसर पर विट के निम्न वचन भी ध्यान देने योग्य है-

दाक्षिण्योदकवाहिनी विगलिता, याता स्वदेशं रति-
र्हा ह्यलंकृतभूषणे, सुवदने, क्रीडारसोद्भासिनि।

मृ० भू०-४

५० मृच्छकटिक

हा सौजन्यनदि, प्रहासपुलिने, हा मादृशामाश्रये,
हा हा नश्यति मन्मथस्य विपणिः सौभाग्यपण्याकरः ॥ ८।३८

शकार

मृच्छकटिक का चारुदत्त यदि गुणों का निधि है तो शकार अवगुणों की खान । भरत के अनुसार शकार का लक्षण —

उज्ज्वलवस्त्राभरणः कुप्यत्यनिमित्ततः प्रसीदति च ।
अधमो मागधभाषी शकारो बहुबुद्धिमान् ॥

साहित्यदर्पणकार ने जो लक्षण लिखा है वह मृच्छकटिक के शकार को लक्ष्य में रख कर ही किया है—

मदमूर्खताभिमानी दुष्कुलतैश्वर्यसंयुक्तः ।
सोऽयमनूढाभ्राता राज्ञः श्यालः शकार इत्युक्तः ॥ सा० द० ३।५४

मृच्छकटिक के शकार का आचरण देखते ही इसकी नीच कुलोत्पत्ति का ज्ञान हो जाता है। यह राजा पालक की रखैल स्त्री का भाई है। अतः इसे राजा का साला होने का बड़ा घमण्ड है। अपने इस सम्बन्ध का दुरुपयोग करने में यह कभी भी नहीं हिचकिचाता है।

प्रथम अंक में विट इसे ‘काणेलीमातः’ कह कर बुलाता है। विदूषक भी इसी प्रकार ‘काणेलीपुत्र’ ‘कुट्टिनीसुत’ आदि गर्हित शब्दों से ही बुलाता है। यह वसन्तसेना को प्राप्त करने के लिये सभी प्रकार के प्रयास करता है किन्तु विट को यह अच्छा नहीं लगता है। अपने लोगों से घिरी हुई वसन्तसेना को विट सांकेतिक शब्दों में भागने का परामर्श देता है। किन्तु जब वसन्तसेना घिर जाती है तब शकार अपने को ‘वर-पुरुष-मनुष्य वासुदेव’ कहकर आत्मप्रशंसा करता हुआ वसन्तसेना को प्रभावित करना चाहता है।

वास्तव में यह महामूर्ख है परन्तु अपनी बहुज्ञता प्रकट करने के लिये अनेक असंगत पौराणिक बातें कहा करता है। (पृ० ७२, ४९६) इसकी अनर्गल बातों से दर्शकों का मनोरंजन होता है।

यह अत्यन्त डरपोक है किन्तु अपनी बहादुरी की डींग हांकता रहता है। स्त्रियों को मारने में अपनी शूरता मानता है। प्रथम अंक में जब वसन्तसेना अपनी परिचारिकाओं को बुलाती है तो यह मनुष्य का आना समझ कर डर जाता है किन्तु जब स्त्री का आना मालूम पड़ता है तब कहता है—“स्त्रीणां शतं मारयामि ।

भूमिका ५१

शूरोऽहम् ।” ( पृ० ७२ ) प्रथम अंक में जब विदूषक से क्षमा मांग कर विट चला जाता है। तब यह भी भय-वश जाने लगता है—“तच्छीत्र-मपक्रमावः ।” ( पृ० १३३ )

अष्टम अंक के प्रारम्भ में यह बौद्ध भिक्षु को पीटता हैं। इससे बौद्ध धर्म में इसकी अनास्था प्रतीत होती है ।

यह सुरीले कण्ठ का गायक नहीं है किन्तु अपने मधुर कण्ठ की खूब प्रशंसा करता है । ( देखिये श्लोक—८।१३-१४ )

इसके मूर्खतापूर्ण आचरण का एक अच्छा उदाहरण अष्टम अंक में है। जब स्थावरक चेट गाड़ी ले आने की सूचना देता है तब यह चहारदीवारी को पार कर ही गाड़ी ले आने की जिद करता है । ( पृ० ४५३ ) इसे गाड़ी टूटने, बैल मरने और स्थावरक के मरने की कोई चिन्ता नहीं होती है ।

जब वसन्तसेना के आने का ज्ञान होता है तो अपनी प्रशंसा करने लगता है—“'भाव, भाव ! मां प्रवरपुरुषं मनुष्यं वासुदेवकम् । ... ... तेन ह्यपूर्वा श्रीः समासादिता । तस्मिन् काले मया रोषिता साम्प्रतं पादयोः पतित्वा प्रसादयामि ।” ( पृ० ४५३ )

किन्तु वसन्तसेना इसकी प्रार्थना नहीं सुनती है और प्रसन्न होने की अपेक्षा इसे पैर से मार देती है। तब यह क्रुद्ध होकर उसको मार डालने की धमकी देता है। पहले तो विट और चेट से मारने के लिये कहता है किन्तु उनके इनकार कर देने पर स्वयं गला दबाकर मार डालता है। विट द्वारा पूछे जाने पर अपने इस पाप कृत्य की प्रशंसा करने लगता है। और इसी सन्दर्भ में स्वयं ले जाकर मृत वसन्त-सेना को दिखाता है। जब इस पाप कर्म को विट पर मढ़ना चाहता है तब विट अपनी तलवार खींच लेता है। जिससे यह डर जाता है और बहाना करने लगता है।

इसको स्वर्ग, नरक की चिन्ता नहीं है। मूर्ख होने पर भी इसने बड़ी चतुराई के साथ वसन्तसेना की हत्या का आरोप चारुदत्त पर लगाने में सफलता प्राप्त की। वसन्तसेना द्वारा की गयी उपेक्षा के कारण इसने उसकी हत्या करने में संकोच नहीं किया। साथ ही, उसके प्रेमी चारुदत्त को भी मृत्युदण्ड दिलवा दिया। इसकी निर्दयता असीम है। जब चारुदत्त को मृत्युदण्ड के लिये ले जाया जा रहा था उस समय में उसका पुत्र रोहसेन विदूषक के साथ वहाँ आया था। यह उस पुत्र के साथ ही चारुदत्त के मृत्युदण्ड का आदेश दे देता है—“सपुत्रमेवैतं मारय ।”

५२ मृच्छकटिक

(पृ० ६०६) अपने षड्यन्त्र में सफल होने से प्रसन्न होता है और अपने सामने ही चारुदत्त का वध देखना चाहता है। “तत् प्रेक्षिष्ये, शत्रुविनाशो नाम मम महान् हृदयस्य परितोषो भवति । श्रुतं च मया, यो हि किल शत्रुं व्यापाद्यमानं पश्यति तस्य अन्यस्मिन् जन्मान्तरे अक्षिरोगो न भवति ।” (पृ० ६०१)

अपने पद के दुरुपयोग में यह कभी नहीं चूकता है। नवम अंक में इसके मुकदमा की सुनवाई के लिये न्यायाधिकारी आनाकानी करते हैं तब यह उनके स्थानान्तरण की धमकी देता है जिससे डर कर वे लोग उसी दिन इसका मुकदमा विचार के लिए ले लेते हैं। इससे यह मन में बहुत प्रसन्न होता है कि अब भयभीत न्यायाधिकारियों से अपनी हर बात मनवा लूंगा । “ही, प्रथमं भणन्ति न दृश्यते, सांप्रतं दृश्यते इति । तन्नामा भीतभीता अधिकरणभोजकाः, यद्यदहं भणिष्यामि तत्तत्प्रत्याययिष्यामि ।” (पृ० ५१४)

यह चारुदत्त का अपमान करने का निश्चय कर चुका है। न्यायालय में उसको दिये गये आसन का विरोध करता है। और उसे आसन से उतरवा कर जमीन पर बैठवा देता है ।

यह बड़ा कायर है । दशम अंक में जब वसन्तसेना आ जाती है। सारी सत्यता प्रकट हो जाती है। लोग शकार को पकड़ने के लिए दौड़ते हैं तब यह भाग जाता है। उसी बीच राजपरिवर्तन हो जाता है। और यह पकड़ लिया जाता है। शर्विलक इसको दण्डित करने के लिये कहता है। वहाँ यह अपनी मूर्खता प्रकट करता हुआ वसन्तसेना से कहता है—“गर्भदासि ! प्रसीद प्रसीद, न पुनर्मार-यिष्यामि ।” (पृ० ६३८) किन्तु अपने को असहाय देखकर यह चारुदत्त की ही शरण में जाना उचित समझता है और तत्काल चारुदत्त की शरण में चला जाता है और अपने प्राणों की रक्षा की प्रार्थना करता है। (पृ० ६३७)

इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि शकार एक दुष्ट, धूर्त, मूर्ख और घमण्डी पात्र है। यह मूर्खता और कुटिलता की मूर्ति है। किन्तु यह अपने इन व्यवहारों से दर्शकों को प्रभावित कर लेता है। आज के खलनायक के दृष्टिकोण से इसका चरित्र उत्कृष्ट कोटि का माना जा सकता है।

विदूषक

मृच्छकटिक में विदूषक का नाम मैत्रेय है। यह निकृष्ट ब्राह्मणकुल का है। द्वितीय अंक में रात में पैर धोने के प्रसंग में यह अपना परिचय देता है—“यथा नागानां मध्ये डडुभस्तथा सर्वब्राह्मणानां मध्येऽहं ब्राह्मणः ।” (पृ० १६१) यह

भूमिका <span style="float: right;">५३</span>

पेटू है। हर समय खान-पान की चिन्ता करता है। चारुदत्त की सम्पन्नता में यह विविध व्यंजनों का आनन्द लिया करता था। उनकी याद करके दुखी हो जाता है। (पृ० ३६) चतुर्थ अंक में वसन्तसेना का वैभव देखकर आश्चर्यचकित हो जाता है। किन्तु उसके द्वारा किये गये केवल मौखिक सत्कार से सन्तुष्ट नहीं होता है। यह चारुदत्त से शिकायत करता है—"एतावर्त्या ऋद्धया न तयाऽहं भणितः—आर्य मैत्रेय ! विश्रम्यताम्, मल्लकेन पानीयमपि पीत्वा गम्यताम् ।" (पृ० ३०६)

यह भीतर से बड़ा डरपोक है। जब चारुदत्त इसे चौराहे पर बलिसमर्पण के लिये जाने को कहता है तब सायंकाल अकेले जाने में डरता है और इसी लिये इन्कार कर देता है। फिर रदनिका को साथ लेकर जाना स्वीकार करता है। प्रथम अंक में ही जब चारुदत्त वसन्तसेना के साथ जाने के लिये कहता है तब भी यह अस्वीकार कर देता है। (पृ० १३३) जब चारुदत्त चलने लगता है तब यह उसका साथ देता है।

तृतीय अंक में वसन्तसेना के स्वर्णाभूषणों का भाण्ड रखने में यह डरता है किन्तु विवश होकर रखता है।

इसे धर्माचारण में रुचि नहीं है। यह देवी-देवताओं की पूजा आदि में विश्वास नहीं करता है। यह ऐसा मानता है कि इस पूजा पाठ का कोई फल नहीं है। क्योंकि नियमपूर्वक पूजा पाठ करने वाला चारुदत्त क्यों विपत्ति में पड़ जाता है। (पृ० ५२)

यह कभी-कभी बड़ी मूर्खता दिखाता है। जब वसन्तसेना के आगमन के समय विट इसे कुछ प्रश्न देता है तो यह उनका उत्तर नहीं कह पाता है और बार-बार चारुदत्त की सहायता लेता है। (पृ० ३१६) यह मजाकिया स्वभाव का है। प्रथम अंक में जब वसन्तसेना चारुदत्त के घर में अपने प्रवेश के लिए क्षमायाचना करती है, दूसरी ओर उसके साथ दासी के समान व्यवहार करने के कारण चारुदत्त भी क्षमायाचना करता है। इस विचित्र स्थिति में यह विदूषक दोनों के सामने हाथ जोड़कर दोनों से क्षमायाचना का सुन्दर अभिनय करता है। (पृ० १२१)

इसे वेश्यासम्पर्क अच्छा नहीं लगता है। इसी कारण यह चारुदत्त से भी वेश्या का सम्पर्क तोड़ने का आग्रह करता है। (पृ० ३०६) यह वेश्यासम्पर्क को बहुत बड़ा प्रत्यवाय मानता है। इसकी दृष्टि में वेश्यामात्र कुटिल होती है। यह वसन्तसेना को भी एक साधारण वेश्या ही समझता है—"सुष्ठूपलक्षितं दुष्टविलासिन्या।" (पृ० २९६) जब वसन्तसेना के भवन में बन्धुलों [जारजसन्तानों] को बहुत

५४ मृच्छकटिक

सुखी देखता है तब इसके मन में भी लालच आता है किन्तु तत्काल ही यह उसकी निन्दा करने लगता है—

“मा तावद् यद्यप्येष उज्ज्वलः स्निग्धश्च ।
तथापि श्मशानवीथ्यां जात इव चम्पक वृक्षोऽनभिगमनीयो जनस्य ।। (४।२९)

यह कभी-कभी जानकर भी अनजान बनने का प्रयास करता है। जब पंचम अंक में वसन्तसेना चारुदत्त के पास दुर्दिन में अभिसार के लिये आयी है तब यह जानता हुआ भी, उससे आगमन का कारण पूछता है। (पृ० ३५० )

इसको संगीत आदि कलाओं में कोई रुचि नहीं है । रेभिल के सुन्दर गाने की यह आलोचना कर देता है । (पृ० १८४ )

विदूषक के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता है चारुदत्त के साथ अटूट मैत्री । यह अपनी मित्रता की कसौटी पर सदैव खरा रहा है। इसने कभी भी कोई ऐसा व्यवहार नहीं किया है जिससे मित्रता पर कोई दोष लगे । यह चारुदत्त की सम्पन्नता के समय उसके घर पर अनेक प्रकार के व्यंजनों का सुखोपभोग किया करता था किन्तु बाद में चारुदत्त के अतिनिर्धन हो जाने पर भी यह उसका साथ नहीं छोड़ता है। इधर-उधर से अपने भोजन की व्यवस्था करके रात में विश्राम के लिये चारुदत्त के घर पर ही आता है “अथवा मयाऽपि मैत्रेयेण परस्यामन्त्रणकानि समीहितव्यानि ।... गृहपारावत इव आवासनिमित्तमत्रागच्छामि ।” ( पृ० ३६ )

प्रथम अंक में जब सबसे पहले चारुदत्त इसे देखता है तो प्रसन्न होकर कहता है “अये ! सर्वकालमित्रं मैत्रेयः प्राप्तः ।” (पृ० ४१) आगे तृतीय अंक में गहनों की चोरी से यह बहुत दुखी हो जाता है। गहनों के बदले में चारुदत्त की पत्नी धूता जब अपनी रत्नावली चारुदत्त के पास इसके हाथों से भिजवाती है । तब चारुदत्त कहता है—

“विभवानुगता भार्या सुखदुःखसुहृद् भवान् । (३।२८)

दशम अंक में चारुदत्त का मृत्युदण्ड सुनकर उसके द्वारा पुत्र को वापस ले जाने का अनुरोध करने पर यह उससे कहता है —“भो वयस्य ! एवं त्वया ज्ञातं त्वया विनाऽहं प्राणान् धारयिष्यामि ?” ( पृ० ६०७ ) आगे भी यह चारुदत्त के बिना अपना जीवन रखना नहीं चाहता है। यही नहीं, जब चारुदत्त की मृत्यु का समाचार सुनकर उसकी पत्नी अग्नि में प्रवेश करना चाहती है तब भी यह उससे पहले अपने प्राण छोड़ने का अनुरोध करता है—“समीहितसिद्धयै प्रवृत्तेन ब्राह्मणोऽग्रे कर्तव्यः । अतो भवत्या अहमग्रणीर्भवामि ।” ( पृ० ६४४ )

यह चारुदत्त की निर्धनता से बहुत दुखी है। अतः यह उसे सदैव सान्त्वना देता रहता है कि आपकी निर्धनता भी एक प्रकार की शोभा है—"भो वयस्य !

भूमिका ५५

अलं सन्तप्तेन, प्रणयिजनसंक्रामितविभवस्य, सुरजनपीतशेषस्य प्रतिपच्चन्द्रस्येव परिक्षयोऽपि तेऽधिकतरं रमणीयः ।” (पृ० ४४)

चारुदत्त की मानप्रतिष्ठा की रक्षा के लिये यह झूठ बोलने से भी नहीं डरता है। वसन्तसेना के गहनों के चोरी चले जाने के बाद चारुदत्त को अतिखिन्न देखकर यह कहता है—"अहं खलु अपलपिष्यामि –केन दत्तम् ? केन गृहीतम् ? को वा साक्षी ? इति।” (पृ० २२३) चारुदत्त की आज्ञा से यह वसन्तसेना के पास जाकर झूठ बोल देता है कि चारुदत्त उसके गहनों को जुआ में हार गया है। (पृ० २६६)

यह चारुदत्त के समान ही उसके पुत्र और पत्नी से भी सच्चा अनुराग रखता है। उनके सुख दुख के विषय में सावधान रहता है।

संक्षेप में, यहाँ विदूषक एक सच्चा मित्र, बुद्धिमान साथी और हर परिस्थिति में साथ निभाने वाला सहयोगी दिखाई देता है। यह केवल हंसी या मजाक का पात्र नहीं है। इसने नाटक के कथानक-संयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।

शर्विलक

यह ब्राह्मणकुलोत्पन्न किन्तु भ्रष्ट संस्कारवाला है। इसके पूर्वज चारों वेदों के ज्ञाता और दान न लेने वाले उत्कृष्ट ब्राह्मण थे। (पृ० २१०) कुसंगति से अथवा परिस्थितिवश यह चोरी की शिक्षा लेकर उसमें अपने को निष्णात मानने लगता है। यह बहुत बुद्धिमान है। किन्तु अपनी बुद्धि का दुरुपयोग भी करता है। वेश्यासंसर्ग के फलस्वरूप वसन्तसेना की परिचारिका मदनिका पर आसक्त हो जाता हैं। यह हर कीमत पर उसे प्राप्त करना चाहता है। शर्त के अनुसार भारी धनराशि देकर मदनिका को मुक्त करा कर पाया जा सकता है। इस काम के लिये यह चोरी करने लगता है। यह सम्भवतः उज्जैन का मूल निवासी नहीं है। कहीं बाहर से आकर रेभिल के घर पर रुका हुआ है। इसी लिये चारुदत्त की निर्धनता से परिचित नहीं है। काफी परिश्रम करके उसके घर सेंध लगाता है। यह चोरी को वास्तव में अच्छा काम नहीं समझता है। फिर भी नौकरी आदि से धनार्जन की अपेक्षा चोरी ही अच्छी मानता है। (३।११)

यह बुद्धिमान है। चोरी करते समय जब सांप ने इसकी अंगुली डँस ली है तब तत्काल अपने जनेऊ का उपयोग करता है और बांध कर विष का प्रभाव रोक लेता है। (पृ० २०५) पुराना किवाड़ खोलने पर आवाज न करें इसके लिये नीचे पानी छिड़क लेता है। घर में स्वयं घुसने के पहले एक पुतला को प्रवेश करा कर निरापद स्थिति जान लेता है तब स्वयं प्रवेश करता है। (पृ० २०६)

५६ मृच्छकटिक

चोरी में भी इसके अपने कुछ सिद्धान्त हैं। बलपूर्वक चोरी करना ठीक नहीं मानता है। जहाँ केवल स्त्री है वहाँ चोरी करना या स्त्री पर प्रहार करना अच्छा नहीं समझता है। मदनिका के सामने अपने चोर्यकार्य की भी विशेषता प्रकट करता हुआ कहता है —

“कार्याकार्यविचारिणी मम मतिश्चौर्येऽपि नित्यं स्थिता।” ४।६

यह परिस्थितिवश चोर बना है। अतः जब चारुदत्त के यहाँ घुसकर दयनीय दशा देखता है तो उसके घर चोरी करने का विचार छोड़ देता है— “अथवा न युक्तं तुल्यावस्थं कुलपुत्रजनं पीडयितुम्, तद् गच्छामि।” (पृ० २०९) किन्तु विदूषक द्वारा शपथ दिलाने पर ही स्वर्णभाण्ड ले लेता है। (पृ० २१०)

यह यद्यपि मदनिका पर आसक्त है तथापि अपनी प्रतिष्ठा की हानि नहीं सहना चाहता है। यह वेश्याओं की सारी गतिविधियों से भली भाँति परिचित है। यह उन पर विश्वास करने के पक्ष में नहीं है। (४।१०-१६)

चोरी करके उन गहनों से मदनिका को छुड़वाने के लिये वसन्तसेना के घर पहुँचता है। वहाँ मदनिका के आचरण पर कुछ शंका होते ही यह उत्तेजित होकर चारुदत्त का वध करने को तैयार हो जाता है। किन्तु जब वस्तुस्थिति का ज्ञान होता है। तब अपने कर्म का पश्चात्ताप करता है। (४।१८) मदनिका द्वारा बहुत समझाये जाने पर यह उन गहनों को लेकर वसन्तसेना के पास जाकर गहने देकर झटपट चला जाना पसन्द करता है। परन्तु वसन्तसेना को सारी घटना का ज्ञान हो चुका है अतः वह मदनिका को वधू बनाकर गाड़ी पर बैठा कर इसके साथ विदा कर देती है। इससे यह बहुत प्रसन्न हो कर कृतज्ञता प्रकट करता है। (पृ० २६६)

यह एक सच्चा मित्र है। यह मित्रता को उच्चकोटि का मानता है। (४।२५) जब नयी पत्नी मदनिका को लेकर जाता है, मार्ग में अपने प्रिय मित्र गोपालपुत्र आर्यक के बन्दी होने का समाचार मिलता है तो बेचैन हो जाता है। यह उसे छुड़ाने की सोचता है। मदनिका उसमें सहयोगिनी बनती है। और अकेले घर जाना चाहती है। इससे यह बहुत खुश हो जाता है। और गाड़ीवान द्वारा मदनिका को घर भेजकर आर्यक को छुड़ाने की योजना में निकल जाता है। (पृ० २७१)

तीव्रबुद्धि वाला होने के कारण यह तत्कालीन राजा पालक के विरुद्ध षड्यन्त्र करने में सफल हो जाता है। यह यज्ञशाला में स्थित राजा पालक पर आक्रमण करके पशु के समान वध कराने में सफल हो जाता है। (१०।५१)

आर्यक के राजा बनते ही यह सर्वप्रथम चारुदत्त को मृत्युदण्ड से मुक्त कराना चाहता है क्योंकि आर्यक के प्राणों की रक्षा चारुदत्त की गाड़ी में छिप कर बैठने

भूमिका ५७

के कारण हुई थी। पहले तो अपने पूर्वकृत्य के कारण यह चारुदत्त के सामने जाने में संकोच करता है किन्तु चारुदत्त की उदारता जानकर उसके सामने पहुँच कर सारे नये समाचार सुनाता है। अपना परिचय तत्काल कराने के लिये चारुदत्त के घर की गयी चोरी का स्मरण कराता है। (पृ० ६३२) चारुदत्त उस घटना को बुरा नहीं मानता है और इसका आलिंगन कर लेता है।

चारुदत्त के प्राणों की रक्षा के साथ साथ उसकी पत्नी की भी पूरी चिन्ता रखता है। उसके अग्निप्रवेश की खबर से यह व्याकुल है (पृ० ६४२) और चारुदत्त से अति शीघ्र वहाँ पहुँचकर पत्नी के प्राणों की रक्षा करने को कहता है और इसमें सफल भी होता है।

यह 'शठे शाठ्यं समाचरेत्' इस सिद्धान्त को मानता है। जब चारुदत्त मृत्युदण्ड से मुक्त हो जाता है तब यह षड्यन्त्रकारी शकार को प्राणदण्ड देने का आग्रह करता है। परन्तु चारुदत्त की सदाशयता के आगे इसको झुकना पड़ता है और शकार को छोड़ दिया जाता है।

उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि शर्विलक के व्यक्तित्व में सद्गुणों और दुर्गुणों का अच्छा सामञ्जस्य है। समय-समय पर इसे अपनी कुलीनता का स्मरण होता रहता है। यह सच्चा मित्र और अन्याय का विरोधी है।

धूता

यह चारुदत्त की विवाहिता पत्नी है। इसके सौन्दर्य आदि की कोई चर्चा नहीं की गयी है। अतः यह सामान्य रूपवाली ही प्रतीत होती है। किन्तु इसमें गुणों की कमी नहीं है। यह अपने पति चारुदत्त के सम्मान, सुख और दुःख की पूरी चिन्ता करती है। (पृ० २२४) इसे अपने पति के चरित्र की दुर्बलता का ज्ञान है कि वह गणिका वसन्तसेना से प्रेम करता है किन्तु इसके कारण यह उससे नाराज नहीं होती है। प्रत्युत वसन्तसेना को समुचित आदर देती है। बसन्तसेना के कारण इसके पति को मृत्युदण्ड मिल रहा है, इस पर भी यह वसन्तसेना के लिये अपशब्द नहीं कहती है। दशम अंक में जब वसन्तसेना चारुदत्त के साथ सामने आती है तब यह प्रसन्न होकर उसका आलिंगन करती है। (पृ० ६४७)

वसन्तसेना के गहने इसके पति के पास धरोहर रखे थे। उनकी चोरी हो गयी। यह समाचार पाकर यह बहुत खिन्न हो जाती है। यह समाज में अपने पति की अप्रतिष्ठा नहीं सहन कर सकती है। वसन्तसेना का मुंह बन्द करने के लिये यह अपने मातृगृह से प्राप्त बहुमूल्य रत्नावली विदूषक को दान में देती है।

५८ मृच्छकटिक

(पृ० २२५) इसका उद्देश्य स्पष्ट था कि विदूषक उसे चारुदत्त को देकर वसन्तसेना के पास भिजवा दें। इस कारण चारुदत्त की प्रतिष्ठा सुरक्षित रह जाती है।

यह चारुदत्त का अनिष्ट सुनना भी पसन्द नहीं करती है। दशम अंक में यह स्पष्ट शब्दों में कहती है कि आर्यपुत्र के अमंगल [ मृत्यु ] सुनने की अपेक्षा अपने प्राण छोड़ना पसन्द करती है। यह अपने प्रिय पुत्र से कहती है 'जात ! मुञ्च माम्, मा विघ्नं कुरुष्व । बिभेमि आर्यपुत्रस्यामङ्गल.कर्णात् ।" (पृ० ६४३)

यह अपने पति को ही सबसे बड़ा आभूषण मानती है। इसीलिये जब वसन्त-सेना इसके घर आकर दासी के द्वारा रत्नावली वापस भिजवाती है तब यह लेने से इन्कार करती हुई कहती है कि आर्यपुत्र ने प्रसन्न होकर आपको भेंट की है अतः यह आपके ही पास रहे। 'मेरे तो आर्यपुत्र ही सबसे बड़े आभूषण हैं--

"आर्यपुत्रेण युष्माकं प्रसादीकृता, न युक्तं ममैतां ग्रहीतुम् । आर्यपुत्र एव ममाभरण-विशेष इति जानातु भवती ।" ( पृ० ३७० )

मृच्छकटिक में दो नायिकायें हैं-(१) निर्धन तथापि कुलीन और विवेकी धर्म-पत्नी धूता, (२) अतिसम्पन्न रूपवती गणिका वसन्तसेना। ग्रन्थकार ने वसन्तसेना की तुलना में धूता को अपने चरित्र-सम्बन्धी वैशिष्ट्य को प्रदर्शित करने का अवसर कम दिया है। फिर भी यह स्पष्ट है कि इसका व्यक्तित्व वसन्तसेना से कम नहीं है। यह अपनी निर्धनता को पूरी तरह जानती हुई भी बिना संकोच के बहुमूल्य रत्नावली वसन्तसेना को दिलवा देती है। उसके द्वारा वापस किये जाने पर भी नहीं लेती है। दूसरी बात, वेश्यासंसर्गी पति और वेश्या दोनों को स्वाभा-विक रीति से महत्त्व देती है। निर्लोभता और पति का अन्य स्त्रीसम्पर्क सहन कर लेना-इन दोनों विशेषताओं के कारण धूता एक आदर्श सहनशील भारतीय नारी के रूप में प्रतिष्ठित हो जाती है।

मदनिका

यह वसन्तसेना की दासी है। इस पर वसन्तसेना को बहुत अधिक विश्वास है। इसी लिये वसन्तसेना अपने और चारुदत्त के प्रेम की बात सबसे पहले इसे ही बताती है। मदनिका पूरी कोशिश करती है कि इसकी सखी को अधिक से अधिक सुख प्राप्त हो। यह दासी होने पर भी अच्छे स्वभाववाली है। इसका प्रेमी शर्विलक चतुर्थ अंक में जब इससे मिलता है और चारुदत्त के घर चोरी करने की बात कहता है तो यह चारुदत्त के किसी भी अनिष्ट की सम्भावना से घबड़ा जाती है। ( पृ० २४७) बाद में वस्तुस्थिति जानने पर समाश्वस्त होती है। यह वसन्तसेना के गहनें देने का सत्यपरामर्श देती है। शर्विलक इससे बहुत प्रभावित

भूमिका ६१

शकार की उक्ति है—“भाव ! भाव ! एषा गर्भदासी कामदेवायतनोद्यानात् प्रभृति तस्य दरिद्रचारुदत्तस्य अनुरक्ता ।” (पृ० ८०) यह इसका ‘बीज’ है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि कामदेवायतन उद्यान में किसी उत्सव में वसन्तसेना ने चारुदत्त को देखा और उस पर आसक्त हो गई। जब किसी अवान्तर घटना के कारण मूल कथा विच्छिन्न सी प्रतीत होने लगती है तो उसको जोड़ने वाला वृत्त “बिन्दु” कहा जाता है। द्वितीय अंक में जुआरियों की कथा से मूल कथा विच्छिन्न-सी होने लगती है तभी कर्णपूरक की घटना आती है। कर्णपूरक चारुदत्त से प्राप्त सुगन्धित दुपट्टा वसन्तसेना को देता है। उसे पाकर वह पुनः प्रसन्न होकर उसे ओढ़ लेती है। (पृ० १७६) इस प्रकार टूटी हुई कथा फिर जुड़ जाती है। अतः कर्णपूरक की कथा ‘बिन्दु’ है।

शर्विलक का चरित्र तृतीय अंक से प्रारम्भ होता है। शर्विलक को मदनिका की प्राप्ति चतुर्थ अंक में ही यद्यपि हो जाती है किन्तु उसका अभिनय अन्त तक चलता रहता है। वह अन्त में यह घोषणा करता है कि राजा आर्यक ने वसन्तसेना को चारुदत्त की ‘वधू’ के रूप में माना है। यह लम्बी कथा होने से ‘पताका’ है।

द्वितीय अंक में बना हुआ भिक्षुक अष्टम अंक से आगे दशम अंक तक अभिनय करता है। उसकी कथा ‘प्रकरी’ समझनी चाहिये।

पञ्चम अर्थप्रकृति है—‘कार्य’। इस प्रकरण में वसन्तसेना और चारुदत्त का मिलन रूप फल ‘कार्य’ है, ऐसा सामान्यतः माना जाता है। परन्तु इस सन्दर्भ में पूज्य श्री कान्तानाथ शास्त्री का यह वक्तव्य ध्यान देने योग्य है कि 'वसन्तसेना के मन में चारुदत्त की वधू बनने की उत्कट अभिलाषा थी, वह दशम अंक में नये राजा आर्यक की घोषणा के साथ पूरी होती है—“शर्विलकः—आर्ये वसन्तसेने ! परितुष्टो राजा भवतीं वधूशब्देनानुगृह्णाति ।” (पृ० ६४७)

‘वधू’ बनना ही फल मानना तर्कसंगत है क्योंकि वसन्तसेना एक धनी गणिका है। वह किसी से भी मिलने के लिये स्वतन्त्र है। वह चारुदत्त से कई बार मिल भी चुकी है। परन्तु वह समाज में एक प्रतिष्ठित स्थान चाहती है। वह एक पत्नी का पद प्राप्त करना चाहती है। अतः उपर्युक्त फल ही ‘कार्य’ समझना चाहिये।

कार्य की पाँच अवस्थायें :

कथावस्तु में जो ‘कार्य’ [ मुख्यफल ] होता है उसके लिये पाँच अवस्थायें मानी हैं—१. आरंभ, २. यत्न, ३. प्राप्त्याशा, ४. नियताप्ति, ५. फलागम।

जहाँ फल की प्राप्ति के लिये उत्सुकता दिखाई दे, वहाँ ‘प्रारम्भ’ माना जाता है। प्रथम अंक में शकार आदि के द्वारा पीछा की जाती हुई वसन्तसेना जब

६२ मृच्छकटिक

मौका पाकर अंधेरे में चारुदत्त के घर में प्रविष्ट हो जाती है । तब उसे अपनी दासी समझ कर चारुदत्त अपने पुत्र को ओढ़ाने के लिये उस पर सुगन्धवासित दुपट्टा डाल देता है। उसे सूंघकर वसन्तसेना मन ही मन उसके अनुदासीन यौवन का का ज्ञान करके खुश हो जाती है। वहीं चारुदत्त उससे कही गयीं बातें याद करके उत्सुकता प्रकट करता है। जब वस्तुस्थिति प्रकट होती है तब एक दूसरे से औपचारिता के लिये क्षमायाचना करने लगते हैं और चारुदत्त कहता है—"तिष्ठतु प्रणयः ।” (पृ० १२१) वहाँ का दोनों का वार्तालाप परस्पर में उत्सुकताजनक है।

फल की प्राप्ति के लिये शीघ्रतापूर्वक जो उपाय किये जाते हैं उन्हें 'यत्न' कहते हैं। प्रथम अंक में वसन्तसेना चारुदत्त की प्रणयप्रार्थना यद्यपि नहीं स्वीकार करती है तथापि वह लगातार मिलने जुलने के लिये अपने गहने उसके घर पर धरोहर के रूप में रख देती है। द्वितीय अंक में मदनिका के साथ बातचीत में वसन्तसेना इसी रहस्य को प्रकट भी कर देती है। इस अलङ्कारन्यास की घटना से लेकर पञ्चम अङ्क तक यही स्थिति चलती रहती है। पञ्चम अंक में चारुदत्त के बहाना के समान बहाना बनाकर वह अपनी चेटी से कहलवाती है कि आपकी भेजी हुई रत्नावली जुये में हार गयीं हैं। अतः उसके बदले में यह अलङ्कारभाण्ड ले लीजिये। इससे चारुदत्त से मिलते रहने का अवसर पुनः सुलभ हो जाता है।

उपाय और विघ्नों की आशंका होते-होते जब फलप्राप्ति की सम्भावना हो जाती है तब 'प्राप्त्याशा' होती है। षष्ठ अंक के आरम्भ से लेकर दशम अंक में जहाँ चारुदत्त का वध करते समय चाण्डाल के हाथ से तलवार छूटकर गिर जाती है और उसी समय वसन्तसेना आकर कहती है "आर्याः ! एषा अहं मन्दभागिनी यस्याः कारणादेष व्यापाद्यते ।” (पृ० ६१९ ) इस उक्ति तक 'प्राप्त्याशा' है। षष्ठ अंक में चेटी के मुख से वसन्तसेना को यह मालूम होता है कि उद्यान में मिलने के लिए उसे जाना है। उसकी मिलने की आशा बन जाती है। परन्तु संयोगवश गाड़ियों का विपर्यय हो जाने से वह शकार के पास पहुँच जाती है। इससे उसकी आशा पुनः निराशा में परिणत हो जाती है। इसी प्रकार चारुदत्त भी गाड़ी में वसन्तसेना के आने की आशा करता है किन्तु गोपालपुत्र 'आर्यक' को देखकर उसकी आशा भी निराशा में बदल जाती है। न्यायालय में उसे वसन्तसेना की हत्या के आरोप में मृत्युदण्ड दिया जाता है तब तो उसकी आशा पूर्णतया समाप्त होने लगती है। किन्तु चाण्डाल के हाथ से तलवार छूटकर गिरती है और उसी समय भिक्षुक के साथ वसन्तसेना वहाँ अचानक आ जाती है इससे उन दोनों का मिलन हो जाता है।

भूमिका ६३


विघ्नों के दूर हो जाने पर जब फलप्राप्ति का पूर्णनिश्चय हो जाता है तब 'नियताप्ति' कही जाती है। दशम अंक में चाण्डाल की इस उक्ति "त्वरितं का पुनरेषांसपतता चिकुरभारेण।" (१०।३८) के आगे चारुदत्त के प्राणों की रक्षा होती है। उसके बाद राजा पालक के मारे जाने पर असहाय शकार चारुदत्त की शरण में आ जाता है। सभी विघ्न बाधायें दूर हो जाती हैं और फलप्राप्ति का निश्चय हो जाता है।

जहाँ कार्य का सम्पूर्ण फल प्राप्त हो जाता है वहाँ 'फलागम' होता है। दशम अंक में चारुदत्त उचित समय पर पहुँच कर अपनी पत्नी धूता को अग्निदाह से बचा लेता है और उसी समय वसन्तसेना को लक्षित करके शर्विलक यह कहता है— "आर्ये वसन्तसेने ! परितुष्टो राजा भवतीं वधूशब्देनानुगृह्णाति ।" ( पृ० ६४७ )

पाँच सन्धियाँ :

नाटकीय कथावस्तु की उपर्युक्त पाँच अर्थप्रकृतियाँ तथा कार्यावस्थायें मिलने पर जो भाग बनते हैं उन्हें "पञ्चसन्धि" कहा जाता है—मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श, निर्वहण । बीज + आरम्भ = मुख । बिन्दु + यत्न = प्रतिमुख । पताका + प्राप्त्याशा = गर्भ । [ इसमें पताका होना सर्वत्र अनिवार्य नहीं माना गया है । ] प्रकरी + नियताप्ति = विमर्श । [ इसमें प्रकरी होना अनिवार्य नहीं है । ] कार्य + फलागम = निर्वहण ।

(१) जहाँ 'बीज' नाना रसों की अभिव्यञ्जना के साथ उदित होता है वहाँ 'मुखसन्धि' होती है। प्रथम अंक में "चतुरो मधुरश्चायमुपन्यासः" । (पृ० १२१) इस वसन्तसेना के स्वगत कथन तक 'मुखसन्धि' है।

(२) जहाँ बीज का उद्भेद इस प्रकार हो कि वह कहीं प्रतीत हो और कहीं नहीं, वहाँ 'प्रतिमुखसन्धि' होती है । प्रथम अंक में वसन्तसेना के इस कथन से "आर्ये ! यद्येवमहमार्थस्य अनुग्राह्या" ( पृ० १२२ ) से लेकर पञ्चम अंक के अन्त तक यह 'प्रतिमुख सन्धि' चलती है । इसमें पताका होना अनिवार्य नहीं है केवल 'प्राप्त्याशा' से भी यह होती है ।

(३) दिखलाई देकर नष्ट हो जाने वाले 'बीज' का बार-बार अन्वेषण 'गर्भसन्धि' है । षष्ठ अंक के आरम्भ से लेकर दशम अंक में चाण्डाल के हाथ से अचानक छटक कर तलवार के गिर जाने पर भाग कर आती हुई वसन्तसेना की इस उक्ति "आर्याः ! एषा अहं मन्दभागिनी, यस्याः कारणादेष व्यापायते ।" ( पृ० ६१९ ) तक 'गर्भसन्धि' है ।