मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ६१
शकार की उक्ति है—“भाव ! भाव ! एषा गर्भदासी कामदेवायतनोद्यानात् प्रभृति तस्य दरिद्रचारुदत्तस्य अनुरक्ता ।” (पृ० ८०) यह इसका ‘बीज’ है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि कामदेवायतन उद्यान में किसी उत्सव में वसन्तसेना ने चारुदत्त को देखा और उस पर आसक्त हो गई। जब किसी अवान्तर घटना के कारण मूल कथा विच्छिन्न सी प्रतीत होने लगती है तो उसको जोड़ने वाला वृत्त “बिन्दु” कहा जाता है। द्वितीय अंक में जुआरियों की कथा से मूल कथा विच्छिन्न-सी होने लगती है तभी कर्णपूरक की घटना आती है। कर्णपूरक चारुदत्त से प्राप्त सुगन्धित दुपट्टा वसन्तसेना को देता है। उसे पाकर वह पुनः प्रसन्न होकर उसे ओढ़ लेती है। (पृ० १७६) इस प्रकार टूटी हुई कथा फिर जुड़ जाती है। अतः कर्णपूरक की कथा ‘बिन्दु’ है।
शर्विलक का चरित्र तृतीय अंक से प्रारम्भ होता है। शर्विलक को मदनिका की प्राप्ति चतुर्थ अंक में ही यद्यपि हो जाती है किन्तु उसका अभिनय अन्त तक चलता रहता है। वह अन्त में यह घोषणा करता है कि राजा आर्यक ने वसन्तसेना को चारुदत्त की ‘वधू’ के रूप में माना है। यह लम्बी कथा होने से ‘पताका’ है।
द्वितीय अंक में बना हुआ भिक्षुक अष्टम अंक से आगे दशम अंक तक अभिनय करता है। उसकी कथा ‘प्रकरी’ समझनी चाहिये।
पञ्चम अर्थप्रकृति है—‘कार्य’। इस प्रकरण में वसन्तसेना और चारुदत्त का मिलन रूप फल ‘कार्य’ है, ऐसा सामान्यतः माना जाता है। परन्तु इस सन्दर्भ में पूज्य श्री कान्तानाथ शास्त्री का यह वक्तव्य ध्यान देने योग्य है कि 'वसन्तसेना के मन में चारुदत्त की वधू बनने की उत्कट अभिलाषा थी, वह दशम अंक में नये राजा आर्यक की घोषणा के साथ पूरी होती है—“शर्विलकः—आर्ये वसन्तसेने ! परितुष्टो राजा भवतीं वधूशब्देनानुगृह्णाति ।” (पृ० ६४७)
‘वधू’ बनना ही फल मानना तर्कसंगत है क्योंकि वसन्तसेना एक धनी गणिका है। वह किसी से भी मिलने के लिये स्वतन्त्र है। वह चारुदत्त से कई बार मिल भी चुकी है। परन्तु वह समाज में एक प्रतिष्ठित स्थान चाहती है। वह एक पत्नी का पद प्राप्त करना चाहती है। अतः उपर्युक्त फल ही ‘कार्य’ समझना चाहिये।
कार्य की पाँच अवस्थायें :
कथावस्तु में जो ‘कार्य’ [ मुख्यफल ] होता है उसके लिये पाँच अवस्थायें मानी हैं—१. आरंभ, २. यत्न, ३. प्राप्त्याशा, ४. नियताप्ति, ५. फलागम।
जहाँ फल की प्राप्ति के लिये उत्सुकता दिखाई दे, वहाँ ‘प्रारम्भ’ माना जाता है। प्रथम अंक में शकार आदि के द्वारा पीछा की जाती हुई वसन्तसेना जब