मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ मृच्छकटिक
मौका पाकर अंधेरे में चारुदत्त के घर में प्रविष्ट हो जाती है । तब उसे अपनी दासी समझ कर चारुदत्त अपने पुत्र को ओढ़ाने के लिये उस पर सुगन्धवासित दुपट्टा डाल देता है। उसे सूंघकर वसन्तसेना मन ही मन उसके अनुदासीन यौवन का का ज्ञान करके खुश हो जाती है। वहीं चारुदत्त उससे कही गयीं बातें याद करके उत्सुकता प्रकट करता है। जब वस्तुस्थिति प्रकट होती है तब एक दूसरे से औपचारिता के लिये क्षमायाचना करने लगते हैं और चारुदत्त कहता है—"तिष्ठतु प्रणयः ।” (पृ० १२१) वहाँ का दोनों का वार्तालाप परस्पर में उत्सुकताजनक है।
फल की प्राप्ति के लिये शीघ्रतापूर्वक जो उपाय किये जाते हैं उन्हें 'यत्न' कहते हैं। प्रथम अंक में वसन्तसेना चारुदत्त की प्रणयप्रार्थना यद्यपि नहीं स्वीकार करती है तथापि वह लगातार मिलने जुलने के लिये अपने गहने उसके घर पर धरोहर के रूप में रख देती है। द्वितीय अंक में मदनिका के साथ बातचीत में वसन्तसेना इसी रहस्य को प्रकट भी कर देती है। इस अलङ्कारन्यास की घटना से लेकर पञ्चम अङ्क तक यही स्थिति चलती रहती है। पञ्चम अंक में चारुदत्त के बहाना के समान बहाना बनाकर वह अपनी चेटी से कहलवाती है कि आपकी भेजी हुई रत्नावली जुये में हार गयीं हैं। अतः उसके बदले में यह अलङ्कारभाण्ड ले लीजिये। इससे चारुदत्त से मिलते रहने का अवसर पुनः सुलभ हो जाता है।
उपाय और विघ्नों की आशंका होते-होते जब फलप्राप्ति की सम्भावना हो जाती है तब 'प्राप्त्याशा' होती है। षष्ठ अंक के आरम्भ से लेकर दशम अंक में जहाँ चारुदत्त का वध करते समय चाण्डाल के हाथ से तलवार छूटकर गिर जाती है और उसी समय वसन्तसेना आकर कहती है "आर्याः ! एषा अहं मन्दभागिनी यस्याः कारणादेष व्यापाद्यते ।” (पृ० ६१९ ) इस उक्ति तक 'प्राप्त्याशा' है। षष्ठ अंक में चेटी के मुख से वसन्तसेना को यह मालूम होता है कि उद्यान में मिलने के लिए उसे जाना है। उसकी मिलने की आशा बन जाती है। परन्तु संयोगवश गाड़ियों का विपर्यय हो जाने से वह शकार के पास पहुँच जाती है। इससे उसकी आशा पुनः निराशा में परिणत हो जाती है। इसी प्रकार चारुदत्त भी गाड़ी में वसन्तसेना के आने की आशा करता है किन्तु गोपालपुत्र 'आर्यक' को देखकर उसकी आशा भी निराशा में बदल जाती है। न्यायालय में उसे वसन्तसेना की हत्या के आरोप में मृत्युदण्ड दिया जाता है तब तो उसकी आशा पूर्णतया समाप्त होने लगती है। किन्तु चाण्डाल के हाथ से तलवार छूटकर गिरती है और उसी समय भिक्षुक के साथ वसन्तसेना वहाँ अचानक आ जाती है इससे उन दोनों का मिलन हो जाता है।