भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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भूमिका ६३


विघ्नों के दूर हो जाने पर जब फलप्राप्ति का पूर्णनिश्चय हो जाता है तब 'नियताप्ति' कही जाती है। दशम अंक में चाण्डाल की इस उक्ति "त्वरितं का पुनरेषांसपतता चिकुरभारेण।" (१०।३८) के आगे चारुदत्त के प्राणों की रक्षा होती है। उसके बाद राजा पालक के मारे जाने पर असहाय शकार चारुदत्त की शरण में आ जाता है। सभी विघ्न बाधायें दूर हो जाती हैं और फलप्राप्ति का निश्चय हो जाता है।

जहाँ कार्य का सम्पूर्ण फल प्राप्त हो जाता है वहाँ 'फलागम' होता है। दशम अंक में चारुदत्त उचित समय पर पहुँच कर अपनी पत्नी धूता को अग्निदाह से बचा लेता है और उसी समय वसन्तसेना को लक्षित करके शर्विलक यह कहता है— "आर्ये वसन्तसेने ! परितुष्टो राजा भवतीं वधूशब्देनानुगृह्णाति ।" ( पृ० ६४७ )

पाँच सन्धियाँ :

नाटकीय कथावस्तु की उपर्युक्त पाँच अर्थप्रकृतियाँ तथा कार्यावस्थायें मिलने पर जो भाग बनते हैं उन्हें "पञ्चसन्धि" कहा जाता है—मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श, निर्वहण । बीज + आरम्भ = मुख । बिन्दु + यत्न = प्रतिमुख । पताका + प्राप्त्याशा = गर्भ । [ इसमें पताका होना सर्वत्र अनिवार्य नहीं माना गया है । ] प्रकरी + नियताप्ति = विमर्श । [ इसमें प्रकरी होना अनिवार्य नहीं है । ] कार्य + फलागम = निर्वहण ।

(१) जहाँ 'बीज' नाना रसों की अभिव्यञ्जना के साथ उदित होता है वहाँ 'मुखसन्धि' होती है। प्रथम अंक में "चतुरो मधुरश्चायमुपन्यासः" । (पृ० १२१) इस वसन्तसेना के स्वगत कथन तक 'मुखसन्धि' है।

(२) जहाँ बीज का उद्भेद इस प्रकार हो कि वह कहीं प्रतीत हो और कहीं नहीं, वहाँ 'प्रतिमुखसन्धि' होती है । प्रथम अंक में वसन्तसेना के इस कथन से "आर्ये ! यद्येवमहमार्थस्य अनुग्राह्या" ( पृ० १२२ ) से लेकर पञ्चम अंक के अन्त तक यह 'प्रतिमुख सन्धि' चलती है । इसमें पताका होना अनिवार्य नहीं है केवल 'प्राप्त्याशा' से भी यह होती है ।

(३) दिखलाई देकर नष्ट हो जाने वाले 'बीज' का बार-बार अन्वेषण 'गर्भसन्धि' है । षष्ठ अंक के आरम्भ से लेकर दशम अंक में चाण्डाल के हाथ से अचानक छटक कर तलवार के गिर जाने पर भाग कर आती हुई वसन्तसेना की इस उक्ति "आर्याः ! एषा अहं मन्दभागिनी, यस्याः कारणादेष व्यापायते ।" ( पृ० ६१९ ) तक 'गर्भसन्धि' है ।

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