भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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मृच्छकटिक

(४) गर्भसन्धि की अपेक्षा ‘बीज’ अधिक विकसित हो जाता है और शापादि के कारण विघ्नयुक्त भी दिखाई देता है, वहाँ ‘विमर्शसन्धि’ होती है। इसे ‘अवमर्श’ भी कहा जाता है। इसमें ‘प्रकरी’ होना अनिवार्य नहीं है। दशम अंक में चाण्डाल की इस उक्ति “त्वरितं का पुनरेषांसपतता चिकुरभारेण।” (१०।३८) से लेकर “आश्चर्यं पुनरुज्जीवितोऽस्मि” (पृ० ६४०) इस शकार की उक्ति तक यह ‘विमर्श’ सन्धि है।

(५) जहाँ इधर उधर बिखरे हुये अर्थों का एक प्रधान फल में उपसंहार कर दिया जाता है वहाँ ‘निर्वहण’ सन्धि होती है। दशम अंक में ‘नेपथ्ये कलकलः’ (पृ० ६४०) से लेकर समाप्ति तक यह ‘सन्धि’ चलती है।

पाश्चात्त्य समीक्षकों के अनुसार नाटक की कथावस्तु पाँच भागों में विभक्त की जाती है—आरम्भ, आरोह, केन्द्र, अवरोह, परिणाम। मृच्छकटिक में इसका सुन्दर समन्वय होता है।

मृच्छकटिक में रस

भारतीय समीक्षकों ने काव्य में रस को अत्यधिक महत्त्व दिया है। साहित्यदर्पणकार ने तो “वाक्यं रसात्मकं काव्यम्’ यहाँ तक कह डाला। ‘‘एक एव भवे-दर्द्धी शृङ्गारो वीर एव वा’’ इस उक्ति के अनुसार शृङ्गार की मुख्यता स्पष्ट है। अन्य रस गौणरूप से होते हैं। विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के योग से सहृदयों के मन में एक लोकोत्तर आनन्द की अनुभूति होती है वही ‘रस’ है। इसी का अनुभव कराना काव्यों के अध्ययन का प्रयोजन है।

मृच्छकटिक एक ‘प्रकरण’ है। इसमें अङ्गी रस शृङ्गार है। इसके दो भेद होते हैं—(१) संभोग, (२) विप्रलम्भ। इस प्रकरण में सम्भोग शृङ्गार अंगी है। इसके अतिरिक्त विप्रलम्भ शृङ्गार, हास्य, करुण, बीभत्स, वीर तथा शान्त आदि रस अंगरूप से आये हैं।

संभोग शृङ्गार

मृच्छकटिक में चारुदत्त तथा वसन्तसेना के प्रगाढ़ प्रेम का सुन्दर सजीव चित्रण है। इसमें गणिका वसन्तसेना नायिका है। यह ‘सामान्या’ है। अतः इसका प्रेम ‘रस’ की कोटि में नहीं आना चाहिये, रसाभास होना चाहिये तथापि इसे एक कुलनारी के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। इसका प्रेम एकमात्र चारुदत्त में है। इसी लिये यह सामाजिक प्रतिष्ठा के अनुरूप ‘वधू’ बनने की इच्छा रखती है जो अन्त में राजा के आदेश से पूरी हो जाती है।