भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 760 में से

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भूमिका ६५

प्रथम अंक में ऐसा ज्ञात होता है कि कामदेवायतन उद्यान में चारुदत्त को देखने के बाद यह उस पर पूर्णतया आसक्त हो जाती है। जब प्रथम बार इन दोनों का मिलन होता है तब चारुदत्त के मन में भी, सोया हुआ अनुराग जाग उठता है। द्वितीय तथा चतुर्थ अंक में विप्रलम्भ रहता है। इससे संभोग शृंगार और पुष्ट होता है। इसके बाद पञ्चम अंक में वसन्तसेना अभिसारिका बन कर मिलने के लिये आती है। यहाँ मेघों का गर्जन और वर्षा तथा बिजली की चमक उद्दीपन करते हैं। उन्हें देखकर चारुदत्त अति प्रसन्न होने लगता है और उनकी निन्दा करने वाले विदूषक को मना करता है। वर्षा तेज होने पर वे दोनों घर के भीतर चले जाते हैं वहाँ वसन्तसेना का आलिङ्गन करता हुआ चारुदत्त अपने सुन्दर मनोभाव व्यक्त करता है।

षष्ठ अंक में वसन्तसेना पुनर्मिलन के लिये अत्युत्सुक दिखाई देती है। सप्तम अंक में चारुदत्त वसन्तसेना से मिलने के लिये अत्यधिक आतुर दिखाई देता है।

चारुदत्त जिस वसन्तसेना को अपना जीवन मानकर बैठा है उसी की हत्या का आरोप उस पर लगता है और मृत्युदण्ड की स्थिति आ जाती है। वह वसन्तसेना से रहित अपने जीवन को व्यर्थ समझकर मृत्यु ही अच्छी मानने लगता है। परन्तु करुण विप्रलम्भ की स्थिति से पहले ही अचानक वसन्तसेना आ जाती है और चारुदत्त का आलिङ्गन (वक्षस्थल पर गिरना) करती है। भावाकुल चारुदत्त प्रियसंगम के प्रभाव को कह उठता है। इसके बाद राजा के आदेश से 'वधू' बनाकर वसन्तसेना सदा के लिये उसे प्राप्त हो जाती है।

यहाँ संभोग शृङ्गार के बीच-बीच में विप्रलम्भ के कारण उसका अति सुन्दर परिपाक होता है। अतः यही अङ्गी रस है।

शकार भी वसन्तसेना से प्रेम करता है। इसके लिये वह सभी सम्भव उपायों का सहारा लेता है। परन्तु एकपक्षीय तथा अनुचित ढंग के कारण यह शृङ्गारा-भास है।

विप्रलम्भ शृङ्गार

संभोग शृङ्गार के परिपाक के लिए मृच्छकटिक में विप्रलम्भ के अति सुन्दर स्थल हैं क्योंकि विप्रलम्भ के बिना सम्भोग की परिपुष्टि नहीं मानी जाती है।

विप्रलम्भ की सर्वप्रथम प्रतीति द्वितीय अंक में होती है। वसन्तसेना उत्कण्ठित होकर मन में कुछ सोचती है। वह इतनी व्याकुल है कि अपनी माता के स्नानादि के आदेश को भी नहीं मानती है। उसकी इस अवस्था से उसकी सखी प्रसन्न है। क्योंकि अब उसे प्रेमभावयुक्त देखकर उसके भावी सुख की कल्पना करने लगती है। द्वितीय अंक के अन्त में भी कर्णपूरक की सूचना के अनुसार वह चारुदत्त को देखने के लिये अपने भवन के ऊपर चढ़ जाती है।

मृ० भू० ५

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