मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ मृच्छकटिक
चतुर्थ अंक के प्रारम्भ में अपनी व्याकुलता दूर करने के लिये वसन्तसेना चारुदत्त का चित्र बनाती है। और मदनिका की सम्मति के लिए उसे दिखाती है। चतुर्थ अंक के अन्त में वह चारुदत्त के पास जाने के लिये निकलना चाहती है।
पञ्चम अंक में जब वसन्तसेना के व्यवहार से क्षुब्ध होकर विदूषक वापस आता है और चारुदत्त से वेश्या का संसर्ग छोड़ने को कहता है तब वह अपनी उत्कण्ठा नहीं छिपा पाता है और कह देता है—"गुणहार्यो ह्यसौ जनः"। (५।६) अपनी दरिद्रता को देखकर विरहवेदना भी व्यक्त करने लगता है।
षष्ठ और सप्तम अंक में विप्रलम्भ का उभयपक्षीय चित्रण है। दोनों एक दूसरे से मिलने को आतुर हैं। इस प्रकार विप्रलम्भ के साथ सम्भोग शृङ्गार का सुन्दर परिपाक दिखाया गया है।
हास्य रस
संस्कृत-रूपकों में हास्य रस की अभिव्यक्ति की ओर ग्रन्थकारों का विशेष ध्यान नहीं रहा है। परन्तु मृच्छकटिक इस आरोप का अपवाद है। दूसरे शब्दों में, हास्य रस की दृष्टि से मृच्छकटिक बेजोड़ है। ग्रन्थकार ने विभिन्न माध्यमों से हास्य रस की अभिव्यंजना का स्तुत्य प्रयास किया है। इसमें 'शकार' तो सम्भवतः इसी उद्देश्य से कल्पित किया गया है। विदूषक ने भी कहीं-कहीं हास्य के अच्छे उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। इनका संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है।
शकार यह राजा 'पालक' की रखैल स्त्री का भाई है। राजश्यालक होने का इसको घमण्ड है। अपनी योग्यता दिखाने के लिये यह प्रायः उल्टी सीधी बातें बोला करता है जिससे सामाजिकों का अच्छा मनोरंजन होता है। इस विषय में प्रथम अंक के श्लोक—१८, १६, २१, २२, २५, २८, २६, ३०, ३९, ४१, ४७, ५२, अष्टम अंक में—भिक्षुक के साथ वार्तालाप, अपने कण्ठस्वर की प्रशंसा, गाड़ीवान स्थावरक चेट के साथ बातचीत, वसन्तसेना के साथ वार्तालाप में श्लोक १८, १९, २०, २२, ३४, ३५, ३६, ३७, ४०, ४५, नवम अंक में—न्यायालय के अधिकारियों के साथ वादविवाद, वसन्तसेना की माता को डांटने और विदूषक के साथ झगड़ने में हास्य रस की सुन्दर अभिव्यंजना है। दशम अंक में २९वे श्लोक में और आगे के वक्तव्य में, चारुदत्त को अपने समक्ष दण्ड देने के आदेश मे, राज-परिवर्तन हो जाने पर कर्मचारियों द्वारा बांध कर लाये जाने पर श्लोक ५३ में और अन्त में वसन्तसेना से रक्षा की प्रार्थना करने में "गर्भदासीपुत्रि ! प्रसीद, प्रसीद, न पुनर्मारयिष्यामि। तत् परित्रायस्व।" (पृ० ६३८) हास्य रस की अभिव्यंजना दर्शनीय है।
हास्य रस की अभिव्यक्ति में विदूषक का भी योगदान है। प्रथम अंक में विट आदि से बात करते समय, वसन्तसेना के साथ जाने से इन्कार करते समय