मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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(पृ० १२३), तृतीय अंक में चारुदत्त के घर सेंध कट जाने पर सोते समय बड़बड़ाते हुये (पृ० २०८-१०), रदनिका तथा चारुदत्त से बात करते समय (पृ० २१५), चतुर्थ अंक में वसन्तसेना के भवनों में परिचारिकाओं के साथ चलते समय (पृ० २७२), बन्धुलों को देखते हुये, वसन्तसेना की माता को देखते हुये, जो कहा है (पृ० ४३०) उससे हास्य रस की अनुभूति होती है। पंचम अंक में वसन्तसेना के विट के साथ प्रश्नोत्तरकाल में (पृ० ३१५), वसन्तसेना के आ जाने पर भोली-भाली बातें करते समय भी हास्य है।
द्वितीय अंक में जुआरियों का दृश्य और षष्ठ अंक में वीरक तथा चन्दनक का विवाद भी हास्य-रसजनक है।
शृङ्गार तथा हास्य के अतिरिक्त करुण रस का भी सुन्दर परिपाक दिखाई देता है।
अलङ्कार-योजना मृच्छकटिक में स्वाभाविक रूप से अर्थालंकारों का प्रयोग है। कहीं भी अनावश्यक रूप से अलंकार प्रयुक्त नहीं है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अप्रस्तुत-प्रशंसा, काव्यलिङ्ग, विशेषोक्ति, समासोक्ति तथा अर्थान्तरन्यास आदि अलंकारों का प्रयोग दर्शनीय है।
छन्दोयोजना मृच्छकटिक जैसे विशाल रूपक में सैकड़ों श्लोकों में विभिन्न छोटे-बड़े छन्दों का प्रसङ्गानुसार सुन्दर प्रयोग है। इन्हें पीछे परिशिष्ट में देखा जा सकता है। संस्कृत के अतिरिक्त प्राकृत के विविध छन्दों का भी प्रयोग है।
भाषा-शैली मृच्छकटिक में संस्कृत तथा विभिन्न प्राकृत भाषाओं और विभाषाओं का सरल रूप में प्रयोग है। इसमें इनका परिष्कृत रूप कम दिखाई देता है। समास का प्रयोग कम किया गया है। वाक्य छोटे-छोटे हैं। इसी लिये इसमें सैकड़ों सूक्तियाँ बन गयीं हैं। इसकी संस्कृत कहीं-कहीं पाणिनीय व्याकरण से पूर्णतया नियन्त्रित नहीं है। कहीं-कहीं अप्रचलित शब्दों का भी प्रयोग है। श्लोकों में पादपूर्ति के लिए अनावश्यक अव्ययों का भी प्रयोग है।
एक ओर इसकी भाषा नाटक के सर्वथा योग्य है वहीं चतुर्थ अंक में वसन्तसेना के भवनों के वर्णन में कृत्रिमता की बहुलता है। उसे पढ़ने से यह लगता ही नहीं कि यह नाटक की भाषा है। वहां का वर्णन प्रवाह का बाधक और उबाऊ है।
प्राकृत भाषाओं के प्रयोग में मृच्छकटिक अपनी समानता नहीं रखता है। इसमें विविध प्राकृतों का प्रयोग है। प्राकृतों के विषय में प्राचीन व्याख्याकार पृथ्वीधर का कथन प्रामाणिक प्रतीत होता है। यहाँ सात भाषा तथा विभाषाओं