मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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का प्रयोग है—(१) शौरसेनी, (२) अवन्तिजा, (३) प्राच्या, (४) मागधी, (५) शकारी, (६) चाण्डाली, (७) ढक्की। पृथ्वीधर ने अपनी व्याख्या के प्रारम्भ में प्राकृत तथा इनके प्रयोक्ताओं के विषय में निम्न विचार व्यक्त किये हैं :—
शौरसेनी—इसको बोलने वालों में—सूत्रधार, नटी, रदनिका, मदनिका, बसन्तसेना और इसकी माता, चेटी, कर्णपूरक, चारुदत्त की पत्नी धूता, शोधनक, तथा श्रेष्ठी—ये ग्यारह पात्र हैं। संस्कृत के तीन ष, श, स, के स्थान पर इसमें केवल 'स' ही होता है।
अवन्तिजा—इसको बोलने वाले दो पात्र हैं—वीरक तथा चन्दनक। इसमें एक मात्र 'स' है।
प्राच्या—इसको बोलने वाला विदूषक है। इसमें भी केवल 'स' मिलता है।
मागधी—(१) संवाहक और (२) चारुदत्त, वसन्तसेना तथा शकार—इन तीनों के ३ चेट लोग—वर्धमानक, कुम्भीलक, स्थावरक, (३) भिक्षु, (४) चारुदत्त का पुत्र रोहसेन—ये मागधी बोलते हैं। इसमें तीनों श, ष, स, के स्थान पर केवल 'श' होता है।
शकारी—इस अपभ्रंश को बोलने वाला अकेला राष्ट्रिय राजश्यालक शकार है। इसमें 'श' का बाहुल्य है। और रेफ का 'ल' होता है।
चाण्डाली—दोनों चाण्डाल इसे बोलते हैं। इसमें भी केवल 'श' है। रेफ का 'ल' होता है।
ढक्की—इसको बोलने वाले माथुर तथा द्यूतकर हैं। इसमें 'व' की प्रचुरता है और 'स' 'श' दोनों हैं।¹
मृच्छकटिक की घटनाओं का स्थान
प्रस्तावना के छठे श्लोक से यह स्पष्ट है कि प्रस्तुत 'प्रकरण' के नायक चारुदत्त और नायिका वसन्तसेना अवन्तिपुरी (उज्जैन) में रहते थे। अतः इसकी कथा का स्थान उज्जयिनी नगरी है।
प्रथम अंक की कथा का स्थान पहले राजमार्ग है और बाद में चारुदत्त का भवन। द्वितीय अङ्क की घटनायें पहले राजमार्ग पर और बाद में बसन्तसेना के भवन में घटती हैं। तृतीय अंक की सारी कथा चारुदत्त के घर पर ही घटती है। चतुर्थ अंक की घटनाओं का स्थल वसन्तसेना का विशाल भवन है। पंचम अंक की घटनायें राजमार्ग पर और बाद में चारुदत्त के घर पर होती हैं। षष्ठ अंक की
१. शौरसेन्यवन्तिजाप्राच्या—एतासु दन्त्यसकारता। तत्रावन्तिजा लोकोक्तिबहुला। प्राच्या स्वार्थिकककारप्राया। मागधी तालव्यशकारवती। शकारीचाण्डाल्योस्तालव्यशकारता। रेफस्य च लकारता। वकारप्राया ढक्काविभाषा। संस्कृतप्रायत्वे दन्त्यतालव्य-स-श-कार-द्वययुक्ता च। पृथ्वीधर पृ० ७-८