भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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भूमिका ६६

घटनायें प्रारम्भ में चारुदत्त के घर पर और आगे राजमार्ग पर होती हैं । सप्तम तथा अष्टम इन दोनों अंकों की घटनायें जीर्ण पुष्पकरण्डक उद्यान में ही घटित होती हैं । नवम अंक की घटनाओं का स्थान न्यायालय है । दशम अंक की घटनाओं का स्थान राजमार्ग, वधस्थान और ( अग्निप्रवेश के लिये ) राजप्रासाद के दाहिनी ओर का मैदान है ।

मृच्छकटिक की घटनाओं का समय

मृच्छकटिक की घटनाओं के घटित होने में बहुत अधिक समय नहीं प्रतीत होता है । प्रस्तावना में सूत्रधार का संगीताभ्यास के कारण अति क्षुधार्त्त होना और घर जाकर कुछ भोजन प्राप्त करना वर्णित है । यह सम्भवतः प्रातः आठ बजे के लगभग होना चाहिये । वहाँ सूत्रधार की नटी कहती है कि उसने 'अभिरूपपति' नामक व्रत रखा है । आगे तृतीय अंक में चारुदत्त की पत्नी धूता के 'रत्नषष्ठी' व्रत का उल्लेख । किन्तु इनके विषय में कहीं कोई शास्त्रीय या लौकिक उल्लेख नहीं मिलता है । अतः इनसे समय के निर्धारण में कोई सहायता नहीं मिल सकती ।

प्रस्तावना में यह कहा गया कि सूत्रधार के निमन्त्रण को विदूषक अस्वीकार कर देता है। और जूर्णवृद्ध द्वारा प्रदत्त जातीकुसुमवासित प्रावारक (दुपट्टा) चारुदत्त को देने के लिये जाता है। (पृ० ३७) जब चारुदत्त के पास पहुँचता है तब वह सायं समाधि से निवृत्त हुआ रहता है। यह समय सायं ६ या ७ के पास होना चाहिये । अब तिथि पर भी विचार करना आवश्यक है । प्रथम अंक में शकार वसन्तसेना का पीछा करता हुआ कहता है—‘‘भाव ! भाव ! एषा गर्भदासी कामदेवायतनोद्यानात् प्रभृति तस्य दरिद्रचारुदत्तस्य अनुरक्ता न मां कामयते ।’’ (पृ० ८०) यह कामदेव का महोत्सव वही है जिसका अन्य ग्रन्थों में ‘वसन्तमहोत्सव’ ‘मदनमहोत्सव’ नाम है। यह माघशुक्ल पञ्चमी=‘वसन्तपञ्चमी’ को होता है । इस दिन वसन्तसेना ने चारुदत्त को देखा । उस पर आसक्त हुई । उसके प्रेम को परिपक्व होने के लिये लगभग पन्द्रह दिन का समय आवश्यक है । अतः फाल्गुन कृष्ण षष्ठी के लगभग इस रूपक की घटना प्रारम्भ होती है । यद्यपि ‘न स्याज्जाती वसन्ते’ इस परम्परा के अनुसार जातीकुसुमवासित दुपट्टा की बात ठीक नहीं लगती है, ऐसा कहा जा सकता है । परन्तु इसका एक उत्तर यह भी है कि दुर्लभ जातीकुसुम चारुदत्त की सेवा में प्रस्तुत करना एक विशेष बात भी हो सकती है । प्रथम अंक में ही जब वसन्तसेना चारुदत्त के घर में प्रविष्ट हो जाती है । और अंधेरे के कारण पहचान में नहीं आती है तब चारुदत्त कहता है—‘‘मारुताभिलाषी प्रदोषसमय-शीतार्तो रोहसेनः ।’’ (पृ० ११५) यह स्थिति भी फाल्गुन में होती है । आभूषणों के बदले रत्नमाला देने के लिये विदूषक वसन्तसेना के भवन में जाता है और वहाँ अशोक वृक्ष का वर्णन करता है—‘‘एषोऽशोकवृक्षो नवनिर्गमकुसुमपल्लवो भाति ।’’ (४।३१)