मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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अशोक वसन्त में विकसित होता है, इस लिये यह मानना उचित है कि इस नाटक की घटनाओं का आरम्भ फाल्गुन कृष्ण-षष्ठी से है। कुछ विद्वान वैशाख से मानते हैं, वह तर्कसंगत नहीं है। जैसा कि लिखा जा चुका है चारुदत्त देवपूजा कर चुके तब उसे जातीकुसुमवासित दुपट्टा देना है। इसमें 'सिद्धीकृतदेवकार्यस्य' के स्थान पर "षष्ठीव्रतकृतदेवकार्यस्य" यह पाठ भी है। अतः फाल्गुन कृष्ण षष्ठी ही प्रारम्भिक तिथि उचित है। वसन्तसेना का पीछा किये जाते समय प्रदोष वेला है। और उसको घर वापस पहुँचाते समय चारुदत्त चन्द्रोदय का वर्णन करता है। यह लगभग ११ बजे रात का समय होना चाहिये। इस प्रकार सायं ६ बजे से ११ बजे रात्रि तक प्रथम अंक की कथा घटित हो जाती है।
द्वितीय अंक की घटना का काल प्रथम अंक के द्वितीय दिन का है। कारण यह है कि चारुदत्त को जो सुगन्धित दुपट्टा दिया गया था, जिसे वसन्तसेना भी देख चुकी थी, वही भिक्षु की रक्षा करने और दुष्ट हाथी का वध करने में पुरस्कार रूप में चारुदत्त ने कर्णपूरक को दिया था। वह उसी दुपट्टे को वसन्तसेना को देने आया था। उससे पूर्व एक चेटी वसन्तसेना से स्नान करके पूजनादि के लिये कहती है। अतः यहाँ प्रातः काल का समय है। जुये में हारे हुये संवाहक का आना, भिक्षुकरूप धारण करना, कर्णपूरक द्वारा हाथी से उसकी प्राणरक्षा करना--इनमें लगभग चार घण्टे का समय चाहिये। वसन्तसेना का कर्णपूरक से चारुदत्त के गमन का ज्ञान करके ऊपर छत पर चढ़ कर देखना--यह सब प्रातः से दोपहर १२ बजे तक घटित हो जाता है।
तृतीय अंक की घटना लगभग १५ दिनों बाद की प्रतीत होती है। आधी रात के समय चारुदत्त संगीत-कार्यक्रम सुनकर घर वापस आता है। चन्द्रमा अस्त होने जा रहा है। इससे शुक्ल पक्ष अष्टमी की रात लगती है। वह और विदूषक सो जाते हैं। मध्यरात्रि के बाद शर्विलक का सेंध काट कर घुसना और स्वर्णभाण्ड लेकर निकलना, रदनिका के जागने और विदूषक को जगाने तथा चारुदत्त द्वारा सेंध को बन्द करने की आज्ञा में और सन्ध्यावन्दनादि के लिये जाने में प्रातः ४ बजे का समय हो गया होगा। अतः इसमें मध्य रात्रि से प्रातः ४ बजे तक की घटनायें हैं।
चतुर्थ अंक की घटनाओं का काल तृतीय अंक के दूसरे दिन अर्थात् फाल्गुन शुक्ल नवमी है। क्योंकि प्रातः ६ बजे के लगभग शर्विलक मदनिका से मिलकर कहता है-- "अद्य रात्रौ मया भीरु त्वदर्थे साहसं कृतम्" 'अयि, प्रभाते श्रुतं मया'। वसन्तसेना शर्विलक से बातचीत करके मदनिका को उसे दे देती है और वह चल देता है। इसमें लगभग दो तीन घंटे अर्थात् दोपहर तक का समय लगा होगा। उधर विदूषक के आने और वसन्तसेना द्वारा रत्नमाला प्राप्त करके उसी सायं चारुदत्त से मिलने का वादा करने में अपराह्न का समय लगा होगा।