मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ७१
पंचम अंक की घटनायें चतुर्थ अंक के दिन ही घटती हैं। सायं से लेकर मध्य-रात्रि के लगभग की हैं। क्योंकि वसन्तसेना प्रदोष काल में चारुदत्त के घर पहुँच कर वह रात वहीं बिताती है।
छठे अंक की घटनायें पञ्चम अंक की घटनाओं के दूसरे दिन (फाल्गुन शुक्ल दशमी) की हैं। प्रातः काल बसन्तसेना जीर्ण पुष्पकरण्डक उद्यान जाने को तैयार होती है। वह कहती है "सुष्ठु न निष्ध्यातो रात्रौ, तदद्य प्रत्यक्षं प्रेक्षिष्ये।" (पृ० २६८) गाड़ियों का बदलना, वीरक तथा चन्दनक का झगड़ा और आर्यक का आगे पहुँचना आदि में पूर्वाह्न दश बजे तक का समय बीता होगा।
छठे अंक की घटनाओं के बाद दोपहर से पूर्व सप्तम अंक की घटनाये प्रारम्भ होती हैं। चारुदत्त के गाड़ीवान वर्धमानक का आर्यक को लेकर चारुदत्त के पास जाना वहाँ बातचीत के बाद हथकड़ी बेड़ियों से मुक्त कराना और सभी का चला जाना—इसमें दोपहर ११ बजे तक का समय होना चाहिये।
छठे अंक के दिन ही सप्तम अंक की घटनाओं के बाद चारुदत्त उद्यान से चला जाता है। दोपहर की धूप तेज हो जाती है। अष्टम अंक में एक भिक्षु चीवर सुखाने के लिये पुष्पकरण्डक उद्यान में आता है। शकार उसे पीटकर वहाँ से भगा देता है। वह अपनी गाड़ी की प्रतीक्षा करने लगता है। भूख से व्याकुल है। वह कहता है “नभो मध्यगतः सूर्यः” (८।१०) "माध्याह्निकः सूर्यः ।” (पृ० ४४४) शकार की गाड़ी आना, वसन्तसेना को गाड़ी से उतारना, मनाना, अपने विट, चेट से कहना और अन्त में स्वयं वसन्तसेना का गला दबाकर मारना, विट का विलाप—इनमें तीन घण्टे का समय लगा होगा। उसी समय बौद्ध भिक्षुक का आना, चीवर सुखाने के लिये स्थान खोजना, वसन्तसेना को पहचानना, होश में करके ले चलने में कम से कम १ घण्टे का समय लगा होगा। अतः सायं चार बजे तक इस अंक की घटनायें समाप्त हो जाती हैं।
षष्ठ, सप्तम और अष्टम इन तीन अंकों की घटनायें एक ही दिन फाल्गुन शुक्ल पक्ष दशमी की हैं।
नवम अंक की घटनायें अगले दिन (फाल्गुन शुक्ल एकादशी) की हैं। कारण यह है कि शकार और वीरक दोनों ने किसी तरह रात बिता कर प्रातः होते ही न्यायालय में प्रवेश किया है। प्रातः ६ बजे के लगभग इस अंक की घटनायें प्रारम्भ होती हैं। साक्ष्य के लिये वसन्तसेना की माता को बुलाकर गवाही लेना, वीरक का उद्यान में जाकर मरी स्त्री को देखना, विदूषक का आना तथा शकार के साथ झगड़ा करना, विदूषक के पास से गहने गिरना, उनकी पहचान करना,