मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 81, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ें७२
मृच्छकटिक
चारुदत्त का अपराधी सिद्ध होना और राजा के पास दण्डनिर्णय के लिये जाना तथा मृत्युदण्ड की घोषणा—इन सभी में कम से कम ५ घण्टे का समय लगा होगा। अतः इस अंक की घटनायें प्रातः ९ से दोपहर २, ३ बजे तक की हैं।
नवम अंक के दिन ( फाल्गुन शुक्ल एकादशी को ) ही दशम अंक की घटनायें होती हैं। मृत्युदण्ड के लिये चारुदत्त को ले जाया जाना, इस अशुभ समाचार का पूरे उज्जैन में फैलना, धूता का अग्निप्रवेश का आग्रह करना, भिक्षुक के साथ वसन्तसेना का अचानक आ जाना, यज्ञ करते हुये राजा 'पालक' का वध करके 'आर्यक' का राजा बनना, वधस्थान पर शर्विलक का आना और सबको यथोचित आदेश सुनाना—इन सभी में कई घण्टे का समय लगना चाहिये। अतः दोपहर बाद से लेकर सायं काल तक इस अंक की घटनाओं का समय है, इससे कम समय में इतनी घटनायें असम्भव हैं।
इस प्रकार यह कहा जा सकता हैं कि मृच्छकटिक की घटनाये माघ शुक्ल षष्ठी से प्रारम्भ होकर फाल्गुन कृष्ण एकादशी तक लगभग २१ दिन में घटित हो जाती हैं। प्रथम अंक और तृतीय अंक की घटनाओं के बीच में करीब १५ दिन का व्यवधान है। तृतीय अंक फाल्गुन कृष्ण अष्टमी का है। नवमी को चतुर्थ तथा पञ्चम अंकों की और दशमी को षष्ठ, सप्तम, अष्टम अंकों की ओर नवम तथा दशम अंकों की घटनायें एकादशी को घटित होती हैं।
मृच्छकटिक कालीन समाज-व्यवस्था
'साहित्य समाज का दर्पण हैं' यह उक्ति बहुत अंशों में मृच्छकटिक में चरितार्थ है। स्वकालीन सत्यता व्यक्त करने में कवि ने क्रान्तिकारी कदम उठाये हैं। उसने किसी की आलोचना की चिन्ता के बिना कटु सत्य सामने रखने का प्रयास किया हैं। इस तथ्य को प्रायः सभी समीक्षक स्वीकार करते हैं। कुछ प्रमुख बातें यहाँ प्रस्तुत हैं-
सामाजिक स्थिति—
मृच्छकटिक एक 'प्रकरण' है। इसमें तत्कालीन समाज के उच्च मध्यमश्रेणी के व्यक्तियों का चित्रण प्रमुखरूप से और निम्न श्रेणी के व्यक्तियों का चित्रण गौण रूप से किया गया है। चूंकि इसका कथानक लोकाश्रित है, अतः ऐसा करना आवश्यक था।
तत्कालीन समाज में जातिप्रथा थी। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—यह विभाजन था। उच्चजाति के लोग अपनी जाति का गर्व करते थे। ब्राह्मण का स्थान सर्वोपरि था। शास्त्रानुसार उसे कुछ विशेष सुविधायें प्राप्त थीं। जाति-