भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 82

भूमिका ७६

प्रथा जन्म से थी। अतः लोग दूसरे कर्म भी करते थे। चारुदत्त के पूर्वज जन्म से ब्राह्मण थे किन्तु व्यापारादि द्वारा उन्होंने विपुल सम्पत्ति अर्जित की थी। वे यज्ञादि अनुष्ठान करते थे तथा कूप, तडाग, धर्मशाला आदि भी बनवाते थे। (पृ० ५५४) चरित्रवान और विद्वान ब्राह्मण समाज में पूजनीय माने जाते थे। (वसन्तसेना—"पूजनीयो मे ब्राह्मणः।" (पृ० १३१) महत्वपूर्ण कार्य में ब्राह्मण को आगे किया जाता था। (विदूषक—"समीहितसिद्धयै प्रवृत्तेन ब्राह्मणोऽग्रे कर्तव्यः।" (पृ० ६४४) जघन्य अपराध करने पर भी उसे सम्पत्तिसहित उस राज्य से बाहर कर दिया जाता था। (अयं हि पातकी विप्रो न वध्यो मनुरब्रवीत्। राष्ट्रादस्मात्तु निर्वास्यो विभवै-रक्षतैः सह।) (९।३९) दान लेना, भोजन करना आदि ब्राह्मणों के काम थे। अपने कर्तव्य से भ्रष्ट ब्राह्मण हीनभावना रखते थे। विदूषक भी इसी प्रकार का था। (पृ० १६१) क्षत्रियों के विषय में कोई विशेष उल्लेख नहीं किया गया है।

वैश्य लोग सम्पन्न थे। व्यापार उन्नत अवस्था में था। देश-विदेश तक व्यापार फैला था। नौका आदि से दूर की यात्रायें होती थीं। (पृ० २६१) बैलगाड़ी से सामान इधर उधर भेजा जाता था। लोगों को लाने ले जाने में भी इनका प्रयोग होता था। वसन्तसेना बैलगाड़ी से ही उद्यान गयी थी। व्यापार में अर्जित सम्पत्ति समाज के उपकार में भी लगाई जाती थी। कायस्थ का स्थान अच्छा नहीं था। (कायस्थसर्पास्पदम्)। (६।१४) शूद्र भी उच्च पदों पर नियुक्त थे। वीरक तथा चन्दनक इसी प्रकार के थे। चाण्डाल भी थे। उनका काम दण्डप्राप्त व्यक्तियों का वध करना था। किन्तु वे भी सज्जन का वध करने में हिचकिचाते थे और उस कार्य के लिये राजा या शासन को दोषी मानते थे। (चाण्डालः—दीर्घायुः ! अत्र राजनियोगः खलु अपराध्यति, न खलु वयम् ! ) (पृ० ५६२)

समाज में लोग सजातियों के साथ अथवा समान कर्मवालों के साथ रहते थे। चारुदत्त के पूर्वज ब्राह्मण होकर भी व्यापार करते थे। अतः श्रेष्ठिचत्वर में रहते थे।

शिक्षा का प्रचार-प्रसार विशेष नहीं था। ब्राह्मण (द्विज) पढ़ते लिखते थे। शर्विलक के पूर्वज चारों वेदों के ज्ञाता और अप्रतिग्राही थे। प्राकृत जनों को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं था। (वेदार्थान् प्राकृतस्त्वं वदसि……६।२१) स्त्री-शिक्षा का प्रचलन सम्भवतः नहीं था। वे घरों में ही पढ़ती थीं। शकुन-अपशकुन भी माने जाते थे। चारुदत्त न्यायालय जाते समय अपशकुनों से घबड़ा जाता है। वध करते समय तलवार गिरने को चाण्डाल शुभ मानता है। (पृ० ६१८)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक) · पृष्ठ 82, कुल 760 में से · BharatKosha