भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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५८ मृच्छकटिक

(पृ० २२५) इसका उद्देश्य स्पष्ट था कि विदूषक उसे चारुदत्त को देकर वसन्तसेना के पास भिजवा दें। इस कारण चारुदत्त की प्रतिष्ठा सुरक्षित रह जाती है।

यह चारुदत्त का अनिष्ट सुनना भी पसन्द नहीं करती है। दशम अंक में यह स्पष्ट शब्दों में कहती है कि आर्यपुत्र के अमंगल [ मृत्यु ] सुनने की अपेक्षा अपने प्राण छोड़ना पसन्द करती है। यह अपने प्रिय पुत्र से कहती है 'जात ! मुञ्च माम्, मा विघ्नं कुरुष्व । बिभेमि आर्यपुत्रस्यामङ्गल.कर्णात् ।" (पृ० ६४३)

यह अपने पति को ही सबसे बड़ा आभूषण मानती है। इसीलिये जब वसन्त-सेना इसके घर आकर दासी के द्वारा रत्नावली वापस भिजवाती है तब यह लेने से इन्कार करती हुई कहती है कि आर्यपुत्र ने प्रसन्न होकर आपको भेंट की है अतः यह आपके ही पास रहे। 'मेरे तो आर्यपुत्र ही सबसे बड़े आभूषण हैं--

"आर्यपुत्रेण युष्माकं प्रसादीकृता, न युक्तं ममैतां ग्रहीतुम् । आर्यपुत्र एव ममाभरण-विशेष इति जानातु भवती ।" ( पृ० ३७० )

मृच्छकटिक में दो नायिकायें हैं-(१) निर्धन तथापि कुलीन और विवेकी धर्म-पत्नी धूता, (२) अतिसम्पन्न रूपवती गणिका वसन्तसेना। ग्रन्थकार ने वसन्तसेना की तुलना में धूता को अपने चरित्र-सम्बन्धी वैशिष्ट्य को प्रदर्शित करने का अवसर कम दिया है। फिर भी यह स्पष्ट है कि इसका व्यक्तित्व वसन्तसेना से कम नहीं है। यह अपनी निर्धनता को पूरी तरह जानती हुई भी बिना संकोच के बहुमूल्य रत्नावली वसन्तसेना को दिलवा देती है। उसके द्वारा वापस किये जाने पर भी नहीं लेती है। दूसरी बात, वेश्यासंसर्गी पति और वेश्या दोनों को स्वाभा-विक रीति से महत्त्व देती है। निर्लोभता और पति का अन्य स्त्रीसम्पर्क सहन कर लेना-इन दोनों विशेषताओं के कारण धूता एक आदर्श सहनशील भारतीय नारी के रूप में प्रतिष्ठित हो जाती है।

मदनिका

यह वसन्तसेना की दासी है। इस पर वसन्तसेना को बहुत अधिक विश्वास है। इसी लिये वसन्तसेना अपने और चारुदत्त के प्रेम की बात सबसे पहले इसे ही बताती है। मदनिका पूरी कोशिश करती है कि इसकी सखी को अधिक से अधिक सुख प्राप्त हो। यह दासी होने पर भी अच्छे स्वभाववाली है। इसका प्रेमी शर्विलक चतुर्थ अंक में जब इससे मिलता है और चारुदत्त के घर चोरी करने की बात कहता है तो यह चारुदत्त के किसी भी अनिष्ट की सम्भावना से घबड़ा जाती है। ( पृ० २४७) बाद में वस्तुस्थिति जानने पर समाश्वस्त होती है। यह वसन्तसेना के गहनें देने का सत्यपरामर्श देती है। शर्विलक इससे बहुत प्रभावित