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मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

५८ मृच्छकटिक

(पृ० २२५) इसका उद्देश्य स्पष्ट था कि विदूषक उसे चारुदत्त को देकर वसन्तसेना के पास भिजवा दें। इस कारण चारुदत्त की प्रतिष्ठा सुरक्षित रह जाती है।

यह चारुदत्त का अनिष्ट सुनना भी पसन्द नहीं करती है। दशम अंक में यह स्पष्ट शब्दों में कहती है कि आर्यपुत्र के अमंगल [ मृत्यु ] सुनने की अपेक्षा अपने प्राण छोड़ना पसन्द करती है। यह अपने प्रिय पुत्र से कहती है 'जात ! मुञ्च माम्, मा विघ्नं कुरुष्व । बिभेमि आर्यपुत्रस्यामङ्गल.कर्णात् ।" (पृ० ६४३)

यह अपने पति को ही सबसे बड़ा आभूषण मानती है। इसीलिये जब वसन्त-सेना इसके घर आकर दासी के द्वारा रत्नावली वापस भिजवाती है तब यह लेने से इन्कार करती हुई कहती है कि आर्यपुत्र ने प्रसन्न होकर आपको भेंट की है अतः यह आपके ही पास रहे। 'मेरे तो आर्यपुत्र ही सबसे बड़े आभूषण हैं--

"आर्यपुत्रेण युष्माकं प्रसादीकृता, न युक्तं ममैतां ग्रहीतुम् । आर्यपुत्र एव ममाभरण-विशेष इति जानातु भवती ।" ( पृ० ३७० )

मृच्छकटिक में दो नायिकायें हैं-(१) निर्धन तथापि कुलीन और विवेकी धर्म-पत्नी धूता, (२) अतिसम्पन्न रूपवती गणिका वसन्तसेना। ग्रन्थकार ने वसन्तसेना की तुलना में धूता को अपने चरित्र-सम्बन्धी वैशिष्ट्य को प्रदर्शित करने का अवसर कम दिया है। फिर भी यह स्पष्ट है कि इसका व्यक्तित्व वसन्तसेना से कम नहीं है। यह अपनी निर्धनता को पूरी तरह जानती हुई भी बिना संकोच के बहुमूल्य रत्नावली वसन्तसेना को दिलवा देती है। उसके द्वारा वापस किये जाने पर भी नहीं लेती है। दूसरी बात, वेश्यासंसर्गी पति और वेश्या दोनों को स्वाभा-विक रीति से महत्त्व देती है। निर्लोभता और पति का अन्य स्त्रीसम्पर्क सहन कर लेना-इन दोनों विशेषताओं के कारण धूता एक आदर्श सहनशील भारतीय नारी के रूप में प्रतिष्ठित हो जाती है।

मदनिका

यह वसन्तसेना की दासी है। इस पर वसन्तसेना को बहुत अधिक विश्वास है। इसी लिये वसन्तसेना अपने और चारुदत्त के प्रेम की बात सबसे पहले इसे ही बताती है। मदनिका पूरी कोशिश करती है कि इसकी सखी को अधिक से अधिक सुख प्राप्त हो। यह दासी होने पर भी अच्छे स्वभाववाली है। इसका प्रेमी शर्विलक चतुर्थ अंक में जब इससे मिलता है और चारुदत्त के घर चोरी करने की बात कहता है तो यह चारुदत्त के किसी भी अनिष्ट की सम्भावना से घबड़ा जाती है। ( पृ० २४७) बाद में वस्तुस्थिति जानने पर समाश्वस्त होती है। यह वसन्तसेना के गहनें देने का सत्यपरामर्श देती है। शर्विलक इससे बहुत प्रभावित

भूमिका ६१

शकार की उक्ति है—“भाव ! भाव ! एषा गर्भदासी कामदेवायतनोद्यानात् प्रभृति तस्य दरिद्रचारुदत्तस्य अनुरक्ता ।” (पृ० ८०) यह इसका ‘बीज’ है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि कामदेवायतन उद्यान में किसी उत्सव में वसन्तसेना ने चारुदत्त को देखा और उस पर आसक्त हो गई। जब किसी अवान्तर घटना के कारण मूल कथा विच्छिन्न सी प्रतीत होने लगती है तो उसको जोड़ने वाला वृत्त “बिन्दु” कहा जाता है। द्वितीय अंक में जुआरियों की कथा से मूल कथा विच्छिन्न-सी होने लगती है तभी कर्णपूरक की घटना आती है। कर्णपूरक चारुदत्त से प्राप्त सुगन्धित दुपट्टा वसन्तसेना को देता है। उसे पाकर वह पुनः प्रसन्न होकर उसे ओढ़ लेती है। (पृ० १७६) इस प्रकार टूटी हुई कथा फिर जुड़ जाती है। अतः कर्णपूरक की कथा ‘बिन्दु’ है।

शर्विलक का चरित्र तृतीय अंक से प्रारम्भ होता है। शर्विलक को मदनिका की प्राप्ति चतुर्थ अंक में ही यद्यपि हो जाती है किन्तु उसका अभिनय अन्त तक चलता रहता है। वह अन्त में यह घोषणा करता है कि राजा आर्यक ने वसन्तसेना को चारुदत्त की ‘वधू’ के रूप में माना है। यह लम्बी कथा होने से ‘पताका’ है।

द्वितीय अंक में बना हुआ भिक्षुक अष्टम अंक से आगे दशम अंक तक अभिनय करता है। उसकी कथा ‘प्रकरी’ समझनी चाहिये।

पञ्चम अर्थप्रकृति है—‘कार्य’। इस प्रकरण में वसन्तसेना और चारुदत्त का मिलन रूप फल ‘कार्य’ है, ऐसा सामान्यतः माना जाता है। परन्तु इस सन्दर्भ में पूज्य श्री कान्तानाथ शास्त्री का यह वक्तव्य ध्यान देने योग्य है कि 'वसन्तसेना के मन में चारुदत्त की वधू बनने की उत्कट अभिलाषा थी, वह दशम अंक में नये राजा आर्यक की घोषणा के साथ पूरी होती है—“शर्विलकः—आर्ये वसन्तसेने ! परितुष्टो राजा भवतीं वधूशब्देनानुगृह्णाति ।” (पृ० ६४७)

‘वधू’ बनना ही फल मानना तर्कसंगत है क्योंकि वसन्तसेना एक धनी गणिका है। वह किसी से भी मिलने के लिये स्वतन्त्र है। वह चारुदत्त से कई बार मिल भी चुकी है। परन्तु वह समाज में एक प्रतिष्ठित स्थान चाहती है। वह एक पत्नी का पद प्राप्त करना चाहती है। अतः उपर्युक्त फल ही ‘कार्य’ समझना चाहिये।

कार्य की पाँच अवस्थायें :

कथावस्तु में जो ‘कार्य’ [ मुख्यफल ] होता है उसके लिये पाँच अवस्थायें मानी हैं—१. आरंभ, २. यत्न, ३. प्राप्त्याशा, ४. नियताप्ति, ५. फलागम।

जहाँ फल की प्राप्ति के लिये उत्सुकता दिखाई दे, वहाँ ‘प्रारम्भ’ माना जाता है। प्रथम अंक में शकार आदि के द्वारा पीछा की जाती हुई वसन्तसेना जब

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मौका पाकर अंधेरे में चारुदत्त के घर में प्रविष्ट हो जाती है । तब उसे अपनी दासी समझ कर चारुदत्त अपने पुत्र को ओढ़ाने के लिये उस पर सुगन्धवासित दुपट्टा डाल देता है। उसे सूंघकर वसन्तसेना मन ही मन उसके अनुदासीन यौवन का का ज्ञान करके खुश हो जाती है। वहीं चारुदत्त उससे कही गयीं बातें याद करके उत्सुकता प्रकट करता है। जब वस्तुस्थिति प्रकट होती है तब एक दूसरे से औपचारिता के लिये क्षमायाचना करने लगते हैं और चारुदत्त कहता है—"तिष्ठतु प्रणयः ।” (पृ० १२१) वहाँ का दोनों का वार्तालाप परस्पर में उत्सुकताजनक है।

फल की प्राप्ति के लिये शीघ्रतापूर्वक जो उपाय किये जाते हैं उन्हें 'यत्न' कहते हैं। प्रथम अंक में वसन्तसेना चारुदत्त की प्रणयप्रार्थना यद्यपि नहीं स्वीकार करती है तथापि वह लगातार मिलने जुलने के लिये अपने गहने उसके घर पर धरोहर के रूप में रख देती है। द्वितीय अंक में मदनिका के साथ बातचीत में वसन्तसेना इसी रहस्य को प्रकट भी कर देती है। इस अलङ्कारन्यास की घटना से लेकर पञ्चम अङ्क तक यही स्थिति चलती रहती है। पञ्चम अंक में चारुदत्त के बहाना के समान बहाना बनाकर वह अपनी चेटी से कहलवाती है कि आपकी भेजी हुई रत्नावली जुये में हार गयीं हैं। अतः उसके बदले में यह अलङ्कारभाण्ड ले लीजिये। इससे चारुदत्त से मिलते रहने का अवसर पुनः सुलभ हो जाता है।

उपाय और विघ्नों की आशंका होते-होते जब फलप्राप्ति की सम्भावना हो जाती है तब 'प्राप्त्याशा' होती है। षष्ठ अंक के आरम्भ से लेकर दशम अंक में जहाँ चारुदत्त का वध करते समय चाण्डाल के हाथ से तलवार छूटकर गिर जाती है और उसी समय वसन्तसेना आकर कहती है "आर्याः ! एषा अहं मन्दभागिनी यस्याः कारणादेष व्यापाद्यते ।” (पृ० ६१९ ) इस उक्ति तक 'प्राप्त्याशा' है। षष्ठ अंक में चेटी के मुख से वसन्तसेना को यह मालूम होता है कि उद्यान में मिलने के लिए उसे जाना है। उसकी मिलने की आशा बन जाती है। परन्तु संयोगवश गाड़ियों का विपर्यय हो जाने से वह शकार के पास पहुँच जाती है। इससे उसकी आशा पुनः निराशा में परिणत हो जाती है। इसी प्रकार चारुदत्त भी गाड़ी में वसन्तसेना के आने की आशा करता है किन्तु गोपालपुत्र 'आर्यक' को देखकर उसकी आशा भी निराशा में बदल जाती है। न्यायालय में उसे वसन्तसेना की हत्या के आरोप में मृत्युदण्ड दिया जाता है तब तो उसकी आशा पूर्णतया समाप्त होने लगती है। किन्तु चाण्डाल के हाथ से तलवार छूटकर गिरती है और उसी समय भिक्षुक के साथ वसन्तसेना वहाँ अचानक आ जाती है इससे उन दोनों का मिलन हो जाता है।

भूमिका ६३


विघ्नों के दूर हो जाने पर जब फलप्राप्ति का पूर्णनिश्चय हो जाता है तब 'नियताप्ति' कही जाती है। दशम अंक में चाण्डाल की इस उक्ति "त्वरितं का पुनरेषांसपतता चिकुरभारेण।" (१०।३८) के आगे चारुदत्त के प्राणों की रक्षा होती है। उसके बाद राजा पालक के मारे जाने पर असहाय शकार चारुदत्त की शरण में आ जाता है। सभी विघ्न बाधायें दूर हो जाती हैं और फलप्राप्ति का निश्चय हो जाता है।

जहाँ कार्य का सम्पूर्ण फल प्राप्त हो जाता है वहाँ 'फलागम' होता है। दशम अंक में चारुदत्त उचित समय पर पहुँच कर अपनी पत्नी धूता को अग्निदाह से बचा लेता है और उसी समय वसन्तसेना को लक्षित करके शर्विलक यह कहता है— "आर्ये वसन्तसेने ! परितुष्टो राजा भवतीं वधूशब्देनानुगृह्णाति ।" ( पृ० ६४७ )

पाँच सन्धियाँ :

नाटकीय कथावस्तु की उपर्युक्त पाँच अर्थप्रकृतियाँ तथा कार्यावस्थायें मिलने पर जो भाग बनते हैं उन्हें "पञ्चसन्धि" कहा जाता है—मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श, निर्वहण । बीज + आरम्भ = मुख । बिन्दु + यत्न = प्रतिमुख । पताका + प्राप्त्याशा = गर्भ । [ इसमें पताका होना सर्वत्र अनिवार्य नहीं माना गया है । ] प्रकरी + नियताप्ति = विमर्श । [ इसमें प्रकरी होना अनिवार्य नहीं है । ] कार्य + फलागम = निर्वहण ।

(१) जहाँ 'बीज' नाना रसों की अभिव्यञ्जना के साथ उदित होता है वहाँ 'मुखसन्धि' होती है। प्रथम अंक में "चतुरो मधुरश्चायमुपन्यासः" । (पृ० १२१) इस वसन्तसेना के स्वगत कथन तक 'मुखसन्धि' है।

(२) जहाँ बीज का उद्भेद इस प्रकार हो कि वह कहीं प्रतीत हो और कहीं नहीं, वहाँ 'प्रतिमुखसन्धि' होती है । प्रथम अंक में वसन्तसेना के इस कथन से "आर्ये ! यद्येवमहमार्थस्य अनुग्राह्या" ( पृ० १२२ ) से लेकर पञ्चम अंक के अन्त तक यह 'प्रतिमुख सन्धि' चलती है । इसमें पताका होना अनिवार्य नहीं है केवल 'प्राप्त्याशा' से भी यह होती है ।

(३) दिखलाई देकर नष्ट हो जाने वाले 'बीज' का बार-बार अन्वेषण 'गर्भसन्धि' है । षष्ठ अंक के आरम्भ से लेकर दशम अंक में चाण्डाल के हाथ से अचानक छटक कर तलवार के गिर जाने पर भाग कर आती हुई वसन्तसेना की इस उक्ति "आर्याः ! एषा अहं मन्दभागिनी, यस्याः कारणादेष व्यापायते ।" ( पृ० ६१९ ) तक 'गर्भसन्धि' है ।

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(४) गर्भसन्धि की अपेक्षा ‘बीज’ अधिक विकसित हो जाता है और शापादि के कारण विघ्नयुक्त भी दिखाई देता है, वहाँ ‘विमर्शसन्धि’ होती है। इसे ‘अवमर्श’ भी कहा जाता है। इसमें ‘प्रकरी’ होना अनिवार्य नहीं है। दशम अंक में चाण्डाल की इस उक्ति “त्वरितं का पुनरेषांसपतता चिकुरभारेण।” (१०।३८) से लेकर “आश्चर्यं पुनरुज्जीवितोऽस्मि” (पृ० ६४०) इस शकार की उक्ति तक यह ‘विमर्श’ सन्धि है।

(५) जहाँ इधर उधर बिखरे हुये अर्थों का एक प्रधान फल में उपसंहार कर दिया जाता है वहाँ ‘निर्वहण’ सन्धि होती है। दशम अंक में ‘नेपथ्ये कलकलः’ (पृ० ६४०) से लेकर समाप्ति तक यह ‘सन्धि’ चलती है।

पाश्चात्त्य समीक्षकों के अनुसार नाटक की कथावस्तु पाँच भागों में विभक्त की जाती है—आरम्भ, आरोह, केन्द्र, अवरोह, परिणाम। मृच्छकटिक में इसका सुन्दर समन्वय होता है।

मृच्छकटिक में रस

भारतीय समीक्षकों ने काव्य में रस को अत्यधिक महत्त्व दिया है। साहित्यदर्पणकार ने तो “वाक्यं रसात्मकं काव्यम्’ यहाँ तक कह डाला। ‘‘एक एव भवे-दर्द्धी शृङ्गारो वीर एव वा’’ इस उक्ति के अनुसार शृङ्गार की मुख्यता स्पष्ट है। अन्य रस गौणरूप से होते हैं। विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के योग से सहृदयों के मन में एक लोकोत्तर आनन्द की अनुभूति होती है वही ‘रस’ है। इसी का अनुभव कराना काव्यों के अध्ययन का प्रयोजन है।

मृच्छकटिक एक ‘प्रकरण’ है। इसमें अङ्गी रस शृङ्गार है। इसके दो भेद होते हैं—(१) संभोग, (२) विप्रलम्भ। इस प्रकरण में सम्भोग शृङ्गार अंगी है। इसके अतिरिक्त विप्रलम्भ शृङ्गार, हास्य, करुण, बीभत्स, वीर तथा शान्त आदि रस अंगरूप से आये हैं।

संभोग शृङ्गार

मृच्छकटिक में चारुदत्त तथा वसन्तसेना के प्रगाढ़ प्रेम का सुन्दर सजीव चित्रण है। इसमें गणिका वसन्तसेना नायिका है। यह ‘सामान्या’ है। अतः इसका प्रेम ‘रस’ की कोटि में नहीं आना चाहिये, रसाभास होना चाहिये तथापि इसे एक कुलनारी के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। इसका प्रेम एकमात्र चारुदत्त में है। इसी लिये यह सामाजिक प्रतिष्ठा के अनुरूप ‘वधू’ बनने की इच्छा रखती है जो अन्त में राजा के आदेश से पूरी हो जाती है।

भूमिका ६५

प्रथम अंक में ऐसा ज्ञात होता है कि कामदेवायतन उद्यान में चारुदत्त को देखने के बाद यह उस पर पूर्णतया आसक्त हो जाती है। जब प्रथम बार इन दोनों का मिलन होता है तब चारुदत्त के मन में भी, सोया हुआ अनुराग जाग उठता है। द्वितीय तथा चतुर्थ अंक में विप्रलम्भ रहता है। इससे संभोग शृंगार और पुष्ट होता है। इसके बाद पञ्चम अंक में वसन्तसेना अभिसारिका बन कर मिलने के लिये आती है। यहाँ मेघों का गर्जन और वर्षा तथा बिजली की चमक उद्दीपन करते हैं। उन्हें देखकर चारुदत्त अति प्रसन्न होने लगता है और उनकी निन्दा करने वाले विदूषक को मना करता है। वर्षा तेज होने पर वे दोनों घर के भीतर चले जाते हैं वहाँ वसन्तसेना का आलिङ्गन करता हुआ चारुदत्त अपने सुन्दर मनोभाव व्यक्त करता है।

षष्ठ अंक में वसन्तसेना पुनर्मिलन के लिये अत्युत्सुक दिखाई देती है। सप्तम अंक में चारुदत्त वसन्तसेना से मिलने के लिये अत्यधिक आतुर दिखाई देता है।

चारुदत्त जिस वसन्तसेना को अपना जीवन मानकर बैठा है उसी की हत्या का आरोप उस पर लगता है और मृत्युदण्ड की स्थिति आ जाती है। वह वसन्तसेना से रहित अपने जीवन को व्यर्थ समझकर मृत्यु ही अच्छी मानने लगता है। परन्तु करुण विप्रलम्भ की स्थिति से पहले ही अचानक वसन्तसेना आ जाती है और चारुदत्त का आलिङ्गन (वक्षस्थल पर गिरना) करती है। भावाकुल चारुदत्त प्रियसंगम के प्रभाव को कह उठता है। इसके बाद राजा के आदेश से 'वधू' बनाकर वसन्तसेना सदा के लिये उसे प्राप्त हो जाती है।

यहाँ संभोग शृङ्गार के बीच-बीच में विप्रलम्भ के कारण उसका अति सुन्दर परिपाक होता है। अतः यही अङ्गी रस है।

शकार भी वसन्तसेना से प्रेम करता है। इसके लिये वह सभी सम्भव उपायों का सहारा लेता है। परन्तु एकपक्षीय तथा अनुचित ढंग के कारण यह शृङ्गारा-भास है।

विप्रलम्भ शृङ्गार

संभोग शृङ्गार के परिपाक के लिए मृच्छकटिक में विप्रलम्भ के अति सुन्दर स्थल हैं क्योंकि विप्रलम्भ के बिना सम्भोग की परिपुष्टि नहीं मानी जाती है।

विप्रलम्भ की सर्वप्रथम प्रतीति द्वितीय अंक में होती है। वसन्तसेना उत्कण्ठित होकर मन में कुछ सोचती है। वह इतनी व्याकुल है कि अपनी माता के स्नानादि के आदेश को भी नहीं मानती है। उसकी इस अवस्था से उसकी सखी प्रसन्न है। क्योंकि अब उसे प्रेमभावयुक्त देखकर उसके भावी सुख की कल्पना करने लगती है। द्वितीय अंक के अन्त में भी कर्णपूरक की सूचना के अनुसार वह चारुदत्त को देखने के लिये अपने भवन के ऊपर चढ़ जाती है।

मृ० भू० ५

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चतुर्थ अंक के प्रारम्भ में अपनी व्याकुलता दूर करने के लिये वसन्तसेना चारुदत्त का चित्र बनाती है। और मदनिका की सम्मति के लिए उसे दिखाती है। चतुर्थ अंक के अन्त में वह चारुदत्त के पास जाने के लिये निकलना चाहती है।

पञ्चम अंक में जब वसन्तसेना के व्यवहार से क्षुब्ध होकर विदूषक वापस आता है और चारुदत्त से वेश्या का संसर्ग छोड़ने को कहता है तब वह अपनी उत्कण्ठा नहीं छिपा पाता है और कह देता है—"गुणहार्यो ह्यसौ जनः"। (५।६) अपनी दरिद्रता को देखकर विरहवेदना भी व्यक्त करने लगता है।

षष्ठ और सप्तम अंक में विप्रलम्भ का उभयपक्षीय चित्रण है। दोनों एक दूसरे से मिलने को आतुर हैं। इस प्रकार विप्रलम्भ के साथ सम्भोग शृङ्गार का सुन्दर परिपाक दिखाया गया है।

हास्य रस

संस्कृत-रूपकों में हास्य रस की अभिव्यक्ति की ओर ग्रन्थकारों का विशेष ध्यान नहीं रहा है। परन्तु मृच्छकटिक इस आरोप का अपवाद है। दूसरे शब्दों में, हास्य रस की दृष्टि से मृच्छकटिक बेजोड़ है। ग्रन्थकार ने विभिन्न माध्यमों से हास्य रस की अभिव्यंजना का स्तुत्य प्रयास किया है। इसमें 'शकार' तो सम्भवतः इसी उद्देश्य से कल्पित किया गया है। विदूषक ने भी कहीं-कहीं हास्य के अच्छे उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। इनका संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार है।

शकार यह राजा 'पालक' की रखैल स्त्री का भाई है। राजश्यालक होने का इसको घमण्ड है। अपनी योग्यता दिखाने के लिये यह प्रायः उल्टी सीधी बातें बोला करता है जिससे सामाजिकों का अच्छा मनोरंजन होता है। इस विषय में प्रथम अंक के श्लोक—१८, १६, २१, २२, २५, २८, २६, ३०, ३९, ४१, ४७, ५२, अष्टम अंक में—भिक्षुक के साथ वार्तालाप, अपने कण्ठस्वर की प्रशंसा, गाड़ीवान स्थावरक चेट के साथ बातचीत, वसन्तसेना के साथ वार्तालाप में श्लोक १८, १९, २०, २२, ३४, ३५, ३६, ३७, ४०, ४५, नवम अंक में—न्यायालय के अधिकारियों के साथ वादविवाद, वसन्तसेना की माता को डांटने और विदूषक के साथ झगड़ने में हास्य रस की सुन्दर अभिव्यंजना है। दशम अंक में २९वे श्लोक में और आगे के वक्तव्य में, चारुदत्त को अपने समक्ष दण्ड देने के आदेश मे, राज-परिवर्तन हो जाने पर कर्मचारियों द्वारा बांध कर लाये जाने पर श्लोक ५३ में और अन्त में वसन्तसेना से रक्षा की प्रार्थना करने में "गर्भदासीपुत्रि ! प्रसीद, प्रसीद, न पुनर्मारयिष्यामि। तत् परित्रायस्व।" (पृ० ६३८) हास्य रस की अभिव्यंजना दर्शनीय है।

हास्य रस की अभिव्यक्ति में विदूषक का भी योगदान है। प्रथम अंक में विट आदि से बात करते समय, वसन्तसेना के साथ जाने से इन्कार करते समय

भूमिका | ६७

(पृ० १२३), तृतीय अंक में चारुदत्त के घर सेंध कट जाने पर सोते समय बड़बड़ाते हुये (पृ० २०८-१०), रदनिका तथा चारुदत्त से बात करते समय (पृ० २१५), चतुर्थ अंक में वसन्तसेना के भवनों में परिचारिकाओं के साथ चलते समय (पृ० २७२), बन्धुलों को देखते हुये, वसन्तसेना की माता को देखते हुये, जो कहा है (पृ० ४३०) उससे हास्य रस की अनुभूति होती है। पंचम अंक में वसन्तसेना के विट के साथ प्रश्नोत्तरकाल में (पृ० ३१५), वसन्तसेना के आ जाने पर भोली-भाली बातें करते समय भी हास्य है।

द्वितीय अंक में जुआरियों का दृश्य और षष्ठ अंक में वीरक तथा चन्दनक का विवाद भी हास्य-रसजनक है।

शृङ्गार तथा हास्य के अतिरिक्त करुण रस का भी सुन्दर परिपाक दिखाई देता है।

अलङ्कार-योजना मृच्छकटिक में स्वाभाविक रूप से अर्थालंकारों का प्रयोग है। कहीं भी अनावश्यक रूप से अलंकार प्रयुक्त नहीं है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अप्रस्तुत-प्रशंसा, काव्यलिङ्ग, विशेषोक्ति, समासोक्ति तथा अर्थान्तरन्यास आदि अलंकारों का प्रयोग दर्शनीय है।

छन्दोयोजना मृच्छकटिक जैसे विशाल रूपक में सैकड़ों श्लोकों में विभिन्न छोटे-बड़े छन्दों का प्रसङ्गानुसार सुन्दर प्रयोग है। इन्हें पीछे परिशिष्ट में देखा जा सकता है। संस्कृत के अतिरिक्त प्राकृत के विविध छन्दों का भी प्रयोग है।

भाषा-शैली मृच्छकटिक में संस्कृत तथा विभिन्न प्राकृत भाषाओं और विभाषाओं का सरल रूप में प्रयोग है। इसमें इनका परिष्कृत रूप कम दिखाई देता है। समास का प्रयोग कम किया गया है। वाक्य छोटे-छोटे हैं। इसी लिये इसमें सैकड़ों सूक्तियाँ बन गयीं हैं। इसकी संस्कृत कहीं-कहीं पाणिनीय व्याकरण से पूर्णतया नियन्त्रित नहीं है। कहीं-कहीं अप्रचलित शब्दों का भी प्रयोग है। श्लोकों में पादपूर्ति के लिए अनावश्यक अव्ययों का भी प्रयोग है।

एक ओर इसकी भाषा नाटक के सर्वथा योग्य है वहीं चतुर्थ अंक में वसन्तसेना के भवनों के वर्णन में कृत्रिमता की बहुलता है। उसे पढ़ने से यह लगता ही नहीं कि यह नाटक की भाषा है। वहां का वर्णन प्रवाह का बाधक और उबाऊ है।

प्राकृत भाषाओं के प्रयोग में मृच्छकटिक अपनी समानता नहीं रखता है। इसमें विविध प्राकृतों का प्रयोग है। प्राकृतों के विषय में प्राचीन व्याख्याकार पृथ्वीधर का कथन प्रामाणिक प्रतीत होता है। यहाँ सात भाषा तथा विभाषाओं

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का प्रयोग है—(१) शौरसेनी, (२) अवन्तिजा, (३) प्राच्या, (४) मागधी, (५) शकारी, (६) चाण्डाली, (७) ढक्की। पृथ्वीधर ने अपनी व्याख्या के प्रारम्भ में प्राकृत तथा इनके प्रयोक्ताओं के विषय में निम्न विचार व्यक्त किये हैं :—

शौरसेनी—इसको बोलने वालों में—सूत्रधार, नटी, रदनिका, मदनिका, बसन्तसेना और इसकी माता, चेटी, कर्णपूरक, चारुदत्त की पत्नी धूता, शोधनक, तथा श्रेष्ठी—ये ग्यारह पात्र हैं। संस्कृत के तीन ष, श, स, के स्थान पर इसमें केवल 'स' ही होता है।

अवन्तिजा—इसको बोलने वाले दो पात्र हैं—वीरक तथा चन्दनक। इसमें एक मात्र 'स' है।

प्राच्या—इसको बोलने वाला विदूषक है। इसमें भी केवल 'स' मिलता है।

मागधी—(१) संवाहक और (२) चारुदत्त, वसन्तसेना तथा शकार—इन तीनों के ३ चेट लोग—वर्धमानक, कुम्भीलक, स्थावरक, (३) भिक्षु, (४) चारुदत्त का पुत्र रोहसेन—ये मागधी बोलते हैं। इसमें तीनों श, ष, स, के स्थान पर केवल 'श' होता है।

शकारी—इस अपभ्रंश को बोलने वाला अकेला राष्ट्रिय राजश्यालक शकार है। इसमें 'श' का बाहुल्य है। और रेफ का 'ल' होता है।

चाण्डाली—दोनों चाण्डाल इसे बोलते हैं। इसमें भी केवल 'श' है। रेफ का 'ल' होता है।

ढक्की—इसको बोलने वाले माथुर तथा द्यूतकर हैं। इसमें 'व' की प्रचुरता है और 'स' 'श' दोनों हैं।¹

मृच्छकटिक की घटनाओं का स्थान

प्रस्तावना के छठे श्लोक से यह स्पष्ट है कि प्रस्तुत 'प्रकरण' के नायक चारुदत्त और नायिका वसन्तसेना अवन्तिपुरी (उज्जैन) में रहते थे। अतः इसकी कथा का स्थान उज्जयिनी नगरी है।

प्रथम अंक की कथा का स्थान पहले राजमार्ग है और बाद में चारुदत्त का भवन। द्वितीय अङ्क की घटनायें पहले राजमार्ग पर और बाद में बसन्तसेना के भवन में घटती हैं। तृतीय अंक की सारी कथा चारुदत्त के घर पर ही घटती है। चतुर्थ अंक की घटनाओं का स्थल वसन्तसेना का विशाल भवन है। पंचम अंक की घटनायें राजमार्ग पर और बाद में चारुदत्त के घर पर होती हैं। षष्ठ अंक की


१. शौरसेन्यवन्तिजाप्राच्या—एतासु दन्त्यसकारता। तत्रावन्तिजा लोकोक्तिबहुला। प्राच्या स्वार्थिकककारप्राया। मागधी तालव्यशकारवती। शकारीचाण्डाल्योस्तालव्यशकारता। रेफस्य च लकारता। वकारप्राया ढक्काविभाषा। संस्कृतप्रायत्वे दन्त्यतालव्य-स-श-कार-द्वययुक्ता च। पृथ्वीधर पृ० ७-८

भूमिका ६६

घटनायें प्रारम्भ में चारुदत्त के घर पर और आगे राजमार्ग पर होती हैं । सप्तम तथा अष्टम इन दोनों अंकों की घटनायें जीर्ण पुष्पकरण्डक उद्यान में ही घटित होती हैं । नवम अंक की घटनाओं का स्थान न्यायालय है । दशम अंक की घटनाओं का स्थान राजमार्ग, वधस्थान और ( अग्निप्रवेश के लिये ) राजप्रासाद के दाहिनी ओर का मैदान है ।

मृच्छकटिक की घटनाओं का समय

मृच्छकटिक की घटनाओं के घटित होने में बहुत अधिक समय नहीं प्रतीत होता है । प्रस्तावना में सूत्रधार का संगीताभ्यास के कारण अति क्षुधार्त्त होना और घर जाकर कुछ भोजन प्राप्त करना वर्णित है । यह सम्भवतः प्रातः आठ बजे के लगभग होना चाहिये । वहाँ सूत्रधार की नटी कहती है कि उसने 'अभिरूपपति' नामक व्रत रखा है । आगे तृतीय अंक में चारुदत्त की पत्नी धूता के 'रत्नषष्ठी' व्रत का उल्लेख । किन्तु इनके विषय में कहीं कोई शास्त्रीय या लौकिक उल्लेख नहीं मिलता है । अतः इनसे समय के निर्धारण में कोई सहायता नहीं मिल सकती ।

प्रस्तावना में यह कहा गया कि सूत्रधार के निमन्त्रण को विदूषक अस्वीकार कर देता है। और जूर्णवृद्ध द्वारा प्रदत्त जातीकुसुमवासित प्रावारक (दुपट्टा) चारुदत्त को देने के लिये जाता है। (पृ० ३७) जब चारुदत्त के पास पहुँचता है तब वह सायं समाधि से निवृत्त हुआ रहता है। यह समय सायं ६ या ७ के पास होना चाहिये । अब तिथि पर भी विचार करना आवश्यक है । प्रथम अंक में शकार वसन्तसेना का पीछा करता हुआ कहता है—‘‘भाव ! भाव ! एषा गर्भदासी कामदेवायतनोद्यानात् प्रभृति तस्य दरिद्रचारुदत्तस्य अनुरक्ता न मां कामयते ।’’ (पृ० ८०) यह कामदेव का महोत्सव वही है जिसका अन्य ग्रन्थों में ‘वसन्तमहोत्सव’ ‘मदनमहोत्सव’ नाम है। यह माघशुक्ल पञ्चमी=‘वसन्तपञ्चमी’ को होता है । इस दिन वसन्तसेना ने चारुदत्त को देखा । उस पर आसक्त हुई । उसके प्रेम को परिपक्व होने के लिये लगभग पन्द्रह दिन का समय आवश्यक है । अतः फाल्गुन कृष्ण षष्ठी के लगभग इस रूपक की घटना प्रारम्भ होती है । यद्यपि ‘न स्याज्जाती वसन्ते’ इस परम्परा के अनुसार जातीकुसुमवासित दुपट्टा की बात ठीक नहीं लगती है, ऐसा कहा जा सकता है । परन्तु इसका एक उत्तर यह भी है कि दुर्लभ जातीकुसुम चारुदत्त की सेवा में प्रस्तुत करना एक विशेष बात भी हो सकती है । प्रथम अंक में ही जब वसन्तसेना चारुदत्त के घर में प्रविष्ट हो जाती है । और अंधेरे के कारण पहचान में नहीं आती है तब चारुदत्त कहता है—‘‘मारुताभिलाषी प्रदोषसमय-शीतार्तो रोहसेनः ।’’ (पृ० ११५) यह स्थिति भी फाल्गुन में होती है । आभूषणों के बदले रत्नमाला देने के लिये विदूषक वसन्तसेना के भवन में जाता है और वहाँ अशोक वृक्ष का वर्णन करता है—‘‘एषोऽशोकवृक्षो नवनिर्गमकुसुमपल्लवो भाति ।’’ (४।३१)

७० मृच्छकटिक

अशोक वसन्त में विकसित होता है, इस लिये यह मानना उचित है कि इस नाटक की घटनाओं का आरम्भ फाल्गुन कृष्ण-षष्ठी से है। कुछ विद्वान वैशाख से मानते हैं, वह तर्कसंगत नहीं है। जैसा कि लिखा जा चुका है चारुदत्त देवपूजा कर चुके तब उसे जातीकुसुमवासित दुपट्टा देना है। इसमें 'सिद्धीकृतदेवकार्यस्य' के स्थान पर "षष्ठीव्रतकृतदेवकार्यस्य" यह पाठ भी है। अतः फाल्गुन कृष्ण षष्ठी ही प्रारम्भिक तिथि उचित है। वसन्तसेना का पीछा किये जाते समय प्रदोष वेला है। और उसको घर वापस पहुँचाते समय चारुदत्त चन्द्रोदय का वर्णन करता है। यह लगभग ११ बजे रात का समय होना चाहिये। इस प्रकार सायं ६ बजे से ११ बजे रात्रि तक प्रथम अंक की कथा घटित हो जाती है।

द्वितीय अंक की घटना का काल प्रथम अंक के द्वितीय दिन का है। कारण यह है कि चारुदत्त को जो सुगन्धित दुपट्टा दिया गया था, जिसे वसन्तसेना भी देख चुकी थी, वही भिक्षु की रक्षा करने और दुष्ट हाथी का वध करने में पुरस्कार रूप में चारुदत्त ने कर्णपूरक को दिया था। वह उसी दुपट्टे को वसन्तसेना को देने आया था। उससे पूर्व एक चेटी वसन्तसेना से स्नान करके पूजनादि के लिये कहती है। अतः यहाँ प्रातः काल का समय है। जुये में हारे हुये संवाहक का आना, भिक्षुकरूप धारण करना, कर्णपूरक द्वारा हाथी से उसकी प्राणरक्षा करना--इनमें लगभग चार घण्टे का समय चाहिये। वसन्तसेना का कर्णपूरक से चारुदत्त के गमन का ज्ञान करके ऊपर छत पर चढ़ कर देखना--यह सब प्रातः से दोपहर १२ बजे तक घटित हो जाता है।

तृतीय अंक की घटना लगभग १५ दिनों बाद की प्रतीत होती है। आधी रात के समय चारुदत्त संगीत-कार्यक्रम सुनकर घर वापस आता है। चन्द्रमा अस्त होने जा रहा है। इससे शुक्ल पक्ष अष्टमी की रात लगती है। वह और विदूषक सो जाते हैं। मध्यरात्रि के बाद शर्विलक का सेंध काट कर घुसना और स्वर्णभाण्ड लेकर निकलना, रदनिका के जागने और विदूषक को जगाने तथा चारुदत्त द्वारा सेंध को बन्द करने की आज्ञा में और सन्ध्यावन्दनादि के लिये जाने में प्रातः ४ बजे का समय हो गया होगा। अतः इसमें मध्य रात्रि से प्रातः ४ बजे तक की घटनायें हैं।

चतुर्थ अंक की घटनाओं का काल तृतीय अंक के दूसरे दिन अर्थात् फाल्गुन शुक्ल नवमी है। क्योंकि प्रातः ६ बजे के लगभग शर्विलक मदनिका से मिलकर कहता है-- "अद्य रात्रौ मया भीरु त्वदर्थे साहसं कृतम्" 'अयि, प्रभाते श्रुतं मया'। वसन्तसेना शर्विलक से बातचीत करके मदनिका को उसे दे देती है और वह चल देता है। इसमें लगभग दो तीन घंटे अर्थात् दोपहर तक का समय लगा होगा। उधर विदूषक के आने और वसन्तसेना द्वारा रत्नमाला प्राप्त करके उसी सायं चारुदत्त से मिलने का वादा करने में अपराह्न का समय लगा होगा।

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पंचम अंक की घटनायें चतुर्थ अंक के दिन ही घटती हैं। सायं से लेकर मध्य-रात्रि के लगभग की हैं। क्योंकि वसन्तसेना प्रदोष काल में चारुदत्त के घर पहुँच कर वह रात वहीं बिताती है।

छठे अंक की घटनायें पञ्चम अंक की घटनाओं के दूसरे दिन (फाल्गुन शुक्ल दशमी) की हैं। प्रातः काल बसन्तसेना जीर्ण पुष्पकरण्डक उद्यान जाने को तैयार होती है। वह कहती है "सुष्ठु न निष्ध्यातो रात्रौ, तदद्य प्रत्यक्षं प्रेक्षिष्ये।" (पृ० २६८) गाड़ियों का बदलना, वीरक तथा चन्दनक का झगड़ा और आर्यक का आगे पहुँचना आदि में पूर्वाह्न दश बजे तक का समय बीता होगा।

छठे अंक की घटनाओं के बाद दोपहर से पूर्व सप्तम अंक की घटनाये प्रारम्भ होती हैं। चारुदत्त के गाड़ीवान वर्धमानक का आर्यक को लेकर चारुदत्त के पास जाना वहाँ बातचीत के बाद हथकड़ी बेड़ियों से मुक्त कराना और सभी का चला जाना—इसमें दोपहर ११ बजे तक का समय होना चाहिये।

छठे अंक के दिन ही सप्तम अंक की घटनाओं के बाद चारुदत्त उद्यान से चला जाता है। दोपहर की धूप तेज हो जाती है। अष्टम अंक में एक भिक्षु चीवर सुखाने के लिये पुष्पकरण्डक उद्यान में आता है। शकार उसे पीटकर वहाँ से भगा देता है। वह अपनी गाड़ी की प्रतीक्षा करने लगता है। भूख से व्याकुल है। वह कहता है “नभो मध्यगतः सूर्यः” (८।१०) "माध्याह्निकः सूर्यः ।” (पृ० ४४४) शकार की गाड़ी आना, वसन्तसेना को गाड़ी से उतारना, मनाना, अपने विट, चेट से कहना और अन्त में स्वयं वसन्तसेना का गला दबाकर मारना, विट का विलाप—इनमें तीन घण्टे का समय लगा होगा। उसी समय बौद्ध भिक्षुक का आना, चीवर सुखाने के लिये स्थान खोजना, वसन्तसेना को पहचानना, होश में करके ले चलने में कम से कम १ घण्टे का समय लगा होगा। अतः सायं चार बजे तक इस अंक की घटनायें समाप्त हो जाती हैं।

षष्ठ, सप्तम और अष्टम इन तीन अंकों की घटनायें एक ही दिन फाल्गुन शुक्ल पक्ष दशमी की हैं।

नवम अंक की घटनायें अगले दिन (फाल्गुन शुक्ल एकादशी) की हैं। कारण यह है कि शकार और वीरक दोनों ने किसी तरह रात बिता कर प्रातः होते ही न्यायालय में प्रवेश किया है। प्रातः ६ बजे के लगभग इस अंक की घटनायें प्रारम्भ होती हैं। साक्ष्य के लिये वसन्तसेना की माता को बुलाकर गवाही लेना, वीरक का उद्यान में जाकर मरी स्त्री को देखना, विदूषक का आना तथा शकार के साथ झगड़ा करना, विदूषक के पास से गहने गिरना, उनकी पहचान करना,

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चारुदत्त का अपराधी सिद्ध होना और राजा के पास दण्डनिर्णय के लिये जाना तथा मृत्युदण्ड की घोषणा—इन सभी में कम से कम ५ घण्टे का समय लगा होगा। अतः इस अंक की घटनायें प्रातः ९ से दोपहर २, ३ बजे तक की हैं।

नवम अंक के दिन ( फाल्गुन शुक्ल एकादशी को ) ही दशम अंक की घटनायें होती हैं। मृत्युदण्ड के लिये चारुदत्त को ले जाया जाना, इस अशुभ समाचार का पूरे उज्जैन में फैलना, धूता का अग्निप्रवेश का आग्रह करना, भिक्षुक के साथ वसन्तसेना का अचानक आ जाना, यज्ञ करते हुये राजा 'पालक' का वध करके 'आर्यक' का राजा बनना, वधस्थान पर शर्विलक का आना और सबको यथोचित आदेश सुनाना—इन सभी में कई घण्टे का समय लगना चाहिये। अतः दोपहर बाद से लेकर सायं काल तक इस अंक की घटनाओं का समय है, इससे कम समय में इतनी घटनायें असम्भव हैं।

इस प्रकार यह कहा जा सकता हैं कि मृच्छकटिक की घटनाये माघ शुक्ल षष्ठी से प्रारम्भ होकर फाल्गुन कृष्ण एकादशी तक लगभग २१ दिन में घटित हो जाती हैं। प्रथम अंक और तृतीय अंक की घटनाओं के बीच में करीब १५ दिन का व्यवधान है। तृतीय अंक फाल्गुन कृष्ण अष्टमी का है। नवमी को चतुर्थ तथा पञ्चम अंकों की और दशमी को षष्ठ, सप्तम, अष्टम अंकों की ओर नवम तथा दशम अंकों की घटनायें एकादशी को घटित होती हैं।

मृच्छकटिक कालीन समाज-व्यवस्था

'साहित्य समाज का दर्पण हैं' यह उक्ति बहुत अंशों में मृच्छकटिक में चरितार्थ है। स्वकालीन सत्यता व्यक्त करने में कवि ने क्रान्तिकारी कदम उठाये हैं। उसने किसी की आलोचना की चिन्ता के बिना कटु सत्य सामने रखने का प्रयास किया हैं। इस तथ्य को प्रायः सभी समीक्षक स्वीकार करते हैं। कुछ प्रमुख बातें यहाँ प्रस्तुत हैं-

सामाजिक स्थिति—

मृच्छकटिक एक 'प्रकरण' है। इसमें तत्कालीन समाज के उच्च मध्यमश्रेणी के व्यक्तियों का चित्रण प्रमुखरूप से और निम्न श्रेणी के व्यक्तियों का चित्रण गौण रूप से किया गया है। चूंकि इसका कथानक लोकाश्रित है, अतः ऐसा करना आवश्यक था।

तत्कालीन समाज में जातिप्रथा थी। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—यह विभाजन था। उच्चजाति के लोग अपनी जाति का गर्व करते थे। ब्राह्मण का स्थान सर्वोपरि था। शास्त्रानुसार उसे कुछ विशेष सुविधायें प्राप्त थीं। जाति-

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प्रथा जन्म से थी। अतः लोग दूसरे कर्म भी करते थे। चारुदत्त के पूर्वज जन्म से ब्राह्मण थे किन्तु व्यापारादि द्वारा उन्होंने विपुल सम्पत्ति अर्जित की थी। वे यज्ञादि अनुष्ठान करते थे तथा कूप, तडाग, धर्मशाला आदि भी बनवाते थे। (पृ० ५५४) चरित्रवान और विद्वान ब्राह्मण समाज में पूजनीय माने जाते थे। (वसन्तसेना—"पूजनीयो मे ब्राह्मणः।" (पृ० १३१) महत्वपूर्ण कार्य में ब्राह्मण को आगे किया जाता था। (विदूषक—"समीहितसिद्धयै प्रवृत्तेन ब्राह्मणोऽग्रे कर्तव्यः।" (पृ० ६४४) जघन्य अपराध करने पर भी उसे सम्पत्तिसहित उस राज्य से बाहर कर दिया जाता था। (अयं हि पातकी विप्रो न वध्यो मनुरब्रवीत्। राष्ट्रादस्मात्तु निर्वास्यो विभवै-रक्षतैः सह।) (९।३९) दान लेना, भोजन करना आदि ब्राह्मणों के काम थे। अपने कर्तव्य से भ्रष्ट ब्राह्मण हीनभावना रखते थे। विदूषक भी इसी प्रकार का था। (पृ० १६१) क्षत्रियों के विषय में कोई विशेष उल्लेख नहीं किया गया है।

वैश्य लोग सम्पन्न थे। व्यापार उन्नत अवस्था में था। देश-विदेश तक व्यापार फैला था। नौका आदि से दूर की यात्रायें होती थीं। (पृ० २६१) बैलगाड़ी से सामान इधर उधर भेजा जाता था। लोगों को लाने ले जाने में भी इनका प्रयोग होता था। वसन्तसेना बैलगाड़ी से ही उद्यान गयी थी। व्यापार में अर्जित सम्पत्ति समाज के उपकार में भी लगाई जाती थी। कायस्थ का स्थान अच्छा नहीं था। (कायस्थसर्पास्पदम्)। (६।१४) शूद्र भी उच्च पदों पर नियुक्त थे। वीरक तथा चन्दनक इसी प्रकार के थे। चाण्डाल भी थे। उनका काम दण्डप्राप्त व्यक्तियों का वध करना था। किन्तु वे भी सज्जन का वध करने में हिचकिचाते थे और उस कार्य के लिये राजा या शासन को दोषी मानते थे। (चाण्डालः—दीर्घायुः ! अत्र राजनियोगः खलु अपराध्यति, न खलु वयम् ! ) (पृ० ५६२)

समाज में लोग सजातियों के साथ अथवा समान कर्मवालों के साथ रहते थे। चारुदत्त के पूर्वज ब्राह्मण होकर भी व्यापार करते थे। अतः श्रेष्ठिचत्वर में रहते थे।

शिक्षा का प्रचार-प्रसार विशेष नहीं था। ब्राह्मण (द्विज) पढ़ते लिखते थे। शर्विलक के पूर्वज चारों वेदों के ज्ञाता और अप्रतिग्राही थे। प्राकृत जनों को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं था। (वेदार्थान् प्राकृतस्त्वं वदसि……६।२१) स्त्री-शिक्षा का प्रचलन सम्भवतः नहीं था। वे घरों में ही पढ़ती थीं। शकुन-अपशकुन भी माने जाते थे। चारुदत्त न्यायालय जाते समय अपशकुनों से घबड़ा जाता है। वध करते समय तलवार गिरने को चाण्डाल शुभ मानता है। (पृ० ६१८)

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पर्दा-प्रथा प्रचलित नहीं थी । इसी लिये दशम अंक में धूता ( चारुदत्त की पत्नी ) सबके सामने आती है । वसन्तसेना द्वारा वधू बनाई गई मदनिका भी पर्दा नहीं करती है। उसे 'वधू' शब्द ही अवगुण्ठन दिया गया है । अन्त में वसन्तसेना को भी 'वधू' बनाया गया है परन्तु पर्दा का कोई संकेत नहीं है । सती-प्रथा का संकेत मिलता है । क्योंकि धूता आत्मदाह करने का प्रयास करती है ।

वेश्या-प्रथा बहुत अधिक प्रचलित थी । उनके दो भेद थे—गणिका और वेश्या । गणिकायें संगीत आदि के माध्यम से लोगों को खुश करके धन अर्जित करती थीं । वसन्तसेना भी इसी प्रकार की थी । उसके पास अतुल वैभव था । वह ऐश्वर्य में कुबेर के समान थी । वेश्याओं के साथ सम्बन्ध रखना साधारण था किन्तु समाज में प्रतिष्ठित नहीं था । इसीलिये शर्विलक उनकी निन्दा करता है । (४।१०-१७) और न्यायालय में पूछे जाने पर चारुदत्त वसन्तसेना के साथ अपना सम्बन्ध बताने में लज्जा का अनुभव करता है । ( पृ० ५३५ ) कुछ साहसी लोग वेश्याओं को पत्नी बनाना चाहते थे । शर्विलक ने मदनिका को वधू बनाया और चारुदत्त के लिये राजा आर्यक ने वसन्तसेना को 'वधू' बनाकर यह सिद्ध किया है ।

दासप्रथा और बंधकप्रथा थी । द्वितीय अंक में जुआ में हारा हुआ संवाहक अपने को बेचकर ऋणमुक्त होना चाहता है । वसन्तसेना के यहाँ अनेक दासियाँ इसी प्रकार बंधक बनाकर रखी गयी थीं । इसी लिये अपनी प्रेयसी मदनिका को छुड़वाने के लिये शर्विलक चोरी करके धन लाता है । शकार का स्थावरक चेट भी इसी प्रकार का था । इसीलिये अन्त में उसे मुक्त करा दिया जाता है ।

जुआ खेलने का बहुत प्रचलन था । उसकी विभिन्न चालें और ढंग प्रचलित थे । उसमें हार जीत का हिसाब रखा जाता था । ( २।२ ) जुये में लिये गये ऋण को वापस करना पड़ता था । इसके लिये न्यायालय भी जाया जाता था । मण्डली से घिर जाने पर जुआ खेलना पड़ता था । उसके कुछ नियम भी प्रचलित थे ।

मदिरालय भी थे । वहाँ लोग जाकर मदिरापान करते थे । मदिरा के विभिन्न रूप प्रचलित थे । ( सीधुसुरासवमत्ता० ४।३० )

राजनीतिक स्थिति—

उस समय की राजनीतिक स्थिति अच्छी नहीं थी । सर्वत्र अराजकता और अव्यवस्था थी । राजा स्वेच्छाचारी था । विलासिता के लिये वह राजमहिषियों के अतिरिक्त कुछ रखैल स्त्रियाँ भी रखता था । 'पालक' राजा ने इसी प्रकार की रखैल शकार की बहिन भी रखी थी । राजा के सम्बन्धी अपने पद का दुरुपयोग करने

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में नहीं हिचकिचाते थे । दूससे लोग उनसे भय खाते थे । उनकी स्वेच्छाचारिता से सभी आक्रान्त थे । सायंकाल से ही राजमार्ग पर निकलना सुरक्षित और सम्मानजनक नहीं था । धूर्त, विट, चेट आदि शाम से ही राजमार्गों पर घूमने लगते थे ।

लोगों से कर वसूल किया जाता था । (७।१) न्यायव्यवस्था प्रायः मनु के अनुसार होती थी । न्याय निःशुल्क था । न्याय देने में अधिक समय नहीं लगता था । हत्या जैसे घोर अपराध का भी निर्णय एक दिन में हो जाता था । गवाही के लिये कोई औपचारिकता नहीं थीं । न्यायालय में आवश्यकतानुसार किसी को तत्काल बुलाया जा सकता था । प्रतिष्ठित व्यक्ति अपराध के आरोप में बुलाये जाने पर सम्मानजनक रीति से पूछे जाते थे । उन्हें आसन भी दिया जाता था । न्यायाधीश निष्पक्ष न्याय करना चाहते थे किन्तु अपनी विवशताओं के कारण वे वैसा नहीं कर पाने से दुःखी रहते थे । कभी वादी-प्रतिवादी की धूर्तता से और कभी राजा या उसके सम्बन्धी के हस्तक्षेप से गलत निर्णय भी हो जाते थे । प्रायः एक न्यायाधिकारी होता था । श्रेष्ठी और कायस्थ उसकी सहायता करते थे । लोगों के बयान लिखे जाते थे । न्यायाधीशों का स्थानान्तरण भी होता था । अतः कभी कभी अप्रिय निर्णय हो जाते थे । न्यायाधिकारी केवल निर्णय का परामर्श देता था । अन्तिम निर्णय राजा ही करता था । ( अधिकरणिकः—निर्णये वयं प्रमाणं शेषे तु राजा । पृ० ५६४ ) ।

दण्डव्यवस्था मनु के आधार पर होती थी । न्यायाधिकारी के परामर्श का अतिक्रमण करके भी दण्ड दिया जाता था । इसी लिये चारुदत्त को राजा ने अपनी ओर से मृत्युदण्ड दिया था । मृत्युदण्ड प्राप्त व्यक्ति को एक विशेष वेषभूषा में सजाया जाता था । दण्ड देने के पहले उसके कुलगोत्र और नाम का उच्चारण करके उसके अपराध और दण्ड की घोषणा कई बार की जाती थी । ( पृ० ६१६ )

शासन पर राजा की पकड़ बहुत अच्छी नहीं थी । अधिकारी और कर्मचारी केवल आजीविका के लिये नौकरी करते थे । कर्तव्य-पालन की विशेष भावना नहीं थी । राजा से अपमानित होने पर वे उसका विद्रोह करने वालों के सहायक बनते थे । (४।२६) इसी लिये 'आर्यक' बन्धन तुड़ा कर जेल से भागने में सफल हुआ । आगे वीरक और चन्दनक के कलह से वह सुरक्षित बच निकला । कर्मचारियों के असन्तोष का परिणाम राजसत्ता का परिवर्तन तक होता था । इसी लिये यज्ञशाला में वर्तमान तत्कालीन राजा पालक को मारने में आर्यक के समर्थक सफल हो सके । ऐसे परिवर्तन प्रायः हुआ करते थे । इसी लिये मृत्युदण्ड प्राप्त व्यक्ति का

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तत्काल वध करने में चाण्डाल हिचकिचाते थे । (पृ० ६१०) इसी कारण चारुदत्त को शीघ्र नहीं मारा गया था ।

धार्मिक-स्थिति--

तत्कालीन समाज में सामान्यतया लोग धर्म-परिपालन करते थे । वैदिक धर्म का प्रचार था । यज्ञानुष्ठान आदि होते थे । चारुदत्त के पूर्वज यज्ञ करने के कारण प्रसिद्ध थे । वह स्वयं भी हर अवस्था में धर्मपालन करता था । दरिद्र होने पर भी धर्म में उसकी पूरी आस्था थी । वह मृत्युदण्ड पाकर भी अपने धर्माचरण के प्रभाव से सुरक्षित रहने की कल्पना करता था । (१०।३४) वह धर्माचरण को नित्य कर्तव्य मानता था । राजा 'पालक' भी यज्ञादि करता था । उसी में उसका वध भी किया गया था । वसन्तसेना की कोटि की गणिकायें भी देवपूजा स्वयं करती थीं और कभी-कभी ब्राह्मणों से भी पूजा करवातीं थीं । (पृ० १२९) व्रत तथा उपवास का भी खूब प्रचलन था । नटी ने 'अभिरूपपति' व्रत रखा था । चारुदत्त की पत्नी ने 'रत्नषष्ठी' व्रत का पालन किया था ।

वैदिक धर्म के साथ बौद्धधर्म भी प्रचलित था । बौद्धभिक्षु अपने आचरण में पूर्णतया सावधान रहते थे । वे स्त्रियों के सम्पर्क से दूर रहते थे । बौद्ध विहार थे । उनमें कुलपति नियुक्त किये जाते थे । संवाहक बौद्ध भिक्षुक को सभी विहारों का कुलपति नियुक्त किया गया था । (पृ०) परन्तु सामान्यतया उनका दर्शन अमंगलसूचक माना जाता था । "कथम् अनाभ्युदयिकं श्रमणदर्शनम् ?" (पृ० ४२५)

कला और संगीत की स्थिति--

मृच्छकटिक-कालीन समाज में विभिन्न प्रकार की कलाओं का विकास हो चुका था । नाट्यकला अपने समुन्नत रूप में थी । इसी लिये मृच्छकटिक जैसे विशालकाय रूपक को अभिनय करने के लिये लिखा गया । रंगमंच के विषय में लोगों का ज्ञान था । (इयं रङ्गप्रवेशेन कलानां चोपशिक्षया । १।४२)

संगीत का प्रचार-प्रसार खूब था । सूत्रधार स्वयं चिरकाल तक संगीत का अभ्यास करता था । रेभिल जैसे गायक और तन्त्रीवादक को सुनने के लिये चारुदत्त जैसे सम्भ्रान्त व्यक्ति देर रात तक रुके रहते थे । उसके शास्त्रीय ज्ञान को प्रशंसा चारुदत्त ने स्पष्ट शब्दों में की है (३।५) शर्विलक चोर चारुदत्त के घर में घुसकर संगीत शास्त्र के उपकरणों को देखकर उस घर को नाट्याचार्य का घर मानने लगता है । (पृ० २०८) शकार भी अपने को अच्छा गायक समझता है । वह कण्ठ को मधुर बनाने की अनेक विधियाँ बताता है । (८।१३-१४) । वसन्तसेना के

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भवन का वर्णन करते समय संगीत के विभिन्न रूपों का भी उल्लेख किया गया है ।

चित्रकला का भी विकास हो चुका था । वसन्तसेना ने स्वयं चारुदत्त का चित्र बनाया था । पत्थर तथा काष्ठ की प्रतिमायें भी बनती थीं । हारा हुआ संवाहक मूर्तिरहित मन्दिर में काष्ठप्रतिमा के समान निश्चलभाव से खड़ा हो जाता है ।

चौर्य कला का खूब विकास था । लोग उसकी शिक्षा लेते थे, गुरु बनाते थे । उनके कुछ सिद्धान्त होते थे । शर्विलक शिक्षित चोर था ।

उपर्युक्त विवेचन का निष्कर्ष यह है कि मृच्छकटिक-कालीन समाज आर्थिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध होता हुआ भी राजनीतिक दृष्टि से अच्छा नहीं था । न्यायव्यवस्था में मनमानापन था । कर्मचारी सन्तुष्ट नहीं थे । सत्ता-परिवर्तन एक सहज कार्य हो चुका था । शासन में अवसरवादिता का बोलवाला था । पद का दुरुपयोग किया जाता था ।

उपसंहार

मृच्छकटिक संस्कृत साहित्य के इने गिने रूपकों में से एक है । लोक-कथानक पर आश्रित होने के कारण इसकी लोकप्रियता प्राचीन काल से है । इसीलिये विभिन्न भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है ।

इसमें तत्कालीन समाज का यथार्थ चित्रण है । इसमें उच्च मध्यमवर्ग के ब्राह्मण युवा को नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो अपनी उदारता से अतिनिर्धन हो चुका है तथापि उसके स्वभाव में कार्पण्य नहीं है । उसके गुणों से प्रभावित होकर आसक्त होने वाली नवयौवना गणिका वसन्तसेना उससे कुलस्त्री के समान व्यवहार करती है । दूसरी ओर उसकी पत्नी भी अपने व्यक्तित्व का अच्छा प्रदर्शन करती है । इसके अतिरिक्त समाज के साधारण वर्ग के लोगों के दैनिक जीवन की सही झलक दिखाई देती है । रूपक में भय, दया, करुणा, प्रेम और हास्य आदि का सुन्दर निरूपण किया गया है । जीवन की अनेक अवस्थाओं का वास्तविक रूप प्रस्तुत करने से इसका महत्त्व और बढ़ गया है । इसमें एक ओर चारुदत्त जैसे आदर्श चरित्र हैं तो दूसरी ओर शकार जैसे निकृष्ट ।

इसकी कथावस्तु की घटनाओं में प्रायः गतिशीलता है । कहीं-कहीं प्रवाह में बाधा भी है; उदाहरणार्थ - चतुर्थ अंक में वसन्तसेना के भवनों के वर्णन में तथा

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पंचम अंक के वर्षा के वर्णन में । इन दोनों में अभिनय की दृष्टि से त्रुटि रहने पर भी साहित्यिक दृष्टि से विशेषता प्रतीत होती है ।

इतने विशाल रूपक में कुछ त्रुटियाँ स्वाभाविक हैं । उदाहरणार्थ—प्रथम अंक में वसन्तसेना के घर जाने और वापस आने में चारुदत्त को एक क्षण भी नहीं लगता है। वह कहता है 'इदं भवत्या गृहम् ।' द्वितीय अंक में हारा हुआ संवाहक वसन्तसेना के द्वारा ऋणमुक्त करा दिया जाता है। वह भिक्षु बनने की बात करता है । कुछ ही देर में कर्णपूरक की बातों से ज्ञात होता है कि उस भिक्षुको हाथी ने पकड़ लिया था। उसने उसे बचाया। वास्तव में उसे भिक्षुक वेश बनाने के लिये कुछ समय देना आवश्यक था। तृतीय अंक में शर्विलक चोर रेभिल के घर में रहता है। वह चोरी के लिए चारुदत्त के घर में सेंध लगाता है। पास रहते हुए भी उसे चारुदत्त की दरिद्रता का ज्ञान नहीं हो पाता है, यह ठीक नहीं है। चतुर्थ अंक में वसन्तसेना के भवन का अति विस्तृत वर्णन अभिनय की दृष्टि से सर्वथा अयोग्य है। षष्ठ अंक में यह नहीं ज्ञात हो पाता है कि चारुदत्त ने वसन्तसेना को छोड़कर अकेले जीर्णकरण्डक उद्यान में इतने सबेरे जाने का प्रयास क्यों किया । सप्तम अंक में प्रवहण-विपर्यय से शकार की गाड़ी वसन्तसेना को लेकर जीर्ण पुष्पकरण्डक उद्यान के लिये पहले चलती है और बाद में पहुँचती है। दूसरी ओर चारुदत्त की गाड़ी वसन्तसेना के स्थान पर आर्यक को लेकर बाद में चलती है फिर भी पहले पहुँचती है। एक ही उद्यान में चारुदत्त और शकार का रहना भी उचित नहीं प्रतीत होता है। अष्टम अंक में वसन्तसेना की हत्या करके उसका आरोप चारुदत्त पर लगाने के लिये शकार कहता है—"साम्प्रतम् अधिकरणं गत्वा व्यवहारं लेखयामि ।" परन्तु वह उसी दिन मध्याह्न में न जाकर दूसरे दिन प्रातः ( नवम अंक में ) न्यायालय पहुँचता है। नवम अंक में न्यायाधिकारी चारुदत्त को निरपराध समझते हैं और उससे गहनों के विषय में सच कहने को बार-बार प्रेरित करते हैं परन्तु न तो चारुदत्त हीं कुछ बोलता है और न विदूषक । जब हत्या जैसा आरोप सिद्ध हो रहा हो तब दोनों का सही बात न कह पाना उचित नहीं है। दशम अंक में एक ही दिन में अनेक महत्वपूर्ण और समयसापेक्ष घटनाओं का चित्रण भी अभिनय की दृष्टि से अच्छा नहीं कहा जा सकता ।

सम्पूर्ण रूपक में कई अवान्तर कथायें जोड़कर अनावश्यक रूप से कलेवर की वृद्धि की गयी है ।

परन्तु उक्त कुछ सामान्य दोष रहते हुये भी इसका महत्त्व सर्वविदित है । इसके संवाद छोटे-छोटे सरल और प्रभावकारी हैं। भाषा-प्रयोग की दृष्टि से भी

भूमिका ७९

सुन्दर है। संस्कृत के अतिरिक्त सप्तविध प्राकृत भाषाओं का एक अनूठा प्रयोग हैं। बड़े-बड़े छन्दों का प्रचुर प्रयोग करने की अपेक्षा छोटे छन्दों का प्रयोग करना अच्छा रहता ।

कवि को निर्धनता का कटु अनुभव है, परन्तु गुणों की तुलना में वह धन को महत्त्व नहीं देता है। इसी लिये गणिका वसन्तसेना अति वैभवसम्पन्न होकर भी अपने को चारुदत्त की गुणनिर्जिता दासी मानती है। सेवक भी धनी की अपेक्षा गुणी स्वामी की सेवा करना ठीक मानता है।

कवि ने क्रान्तिकारी विचार प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इसमें बहुत अंशों में वह सफल भी हुआ है। अनेक पत्नी रखना, ब्राह्मण का वेश्या को 'वधू' रूप में स्वीकार करना, चोरी करना, राजा और उसके सम्बन्धियों की स्वेच्छाचारिता, न्यायपालिका पर आतंक, राजा द्वारा अपमानित व्यक्तियों का राज-विद्रोह में सम्मिलित होना और स्वेच्छाचारी राजा का विनाश करना--आदि घटनाओं के चित्रण का सफल प्रयास किया गया है। इसमें क्षत्रिय वर्ग की किसी महत्त्वपूर्ण बात की चर्चा नहीं की गयी है। ऐसा प्रतीत होता है कि शूद्रक इस विषय में कुछ कहना ठीक नहीं समझता था।

अन्त में यह कहा जा सकता हैं कि मृच्छकटिक में कालिदास की रचनाओं के समान यद्यपि स्वाभाविकता और चमत्कार-जनकता नहीं है और न भवभूति के समान कृत्रिमता । फिर भी इसकी कुछ ऐसी विशेषतायें हैं जिनसे इसको न केवल संस्कृत-साहित्य की अपितु विश्वसाहित्य की उत्कृष्ट कृति मानने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिये ।