भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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भूमिका ७९

सुन्दर है। संस्कृत के अतिरिक्त सप्तविध प्राकृत भाषाओं का एक अनूठा प्रयोग हैं। बड़े-बड़े छन्दों का प्रचुर प्रयोग करने की अपेक्षा छोटे छन्दों का प्रयोग करना अच्छा रहता ।

कवि को निर्धनता का कटु अनुभव है, परन्तु गुणों की तुलना में वह धन को महत्त्व नहीं देता है। इसी लिये गणिका वसन्तसेना अति वैभवसम्पन्न होकर भी अपने को चारुदत्त की गुणनिर्जिता दासी मानती है। सेवक भी धनी की अपेक्षा गुणी स्वामी की सेवा करना ठीक मानता है।

कवि ने क्रान्तिकारी विचार प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इसमें बहुत अंशों में वह सफल भी हुआ है। अनेक पत्नी रखना, ब्राह्मण का वेश्या को 'वधू' रूप में स्वीकार करना, चोरी करना, राजा और उसके सम्बन्धियों की स्वेच्छाचारिता, न्यायपालिका पर आतंक, राजा द्वारा अपमानित व्यक्तियों का राज-विद्रोह में सम्मिलित होना और स्वेच्छाचारी राजा का विनाश करना--आदि घटनाओं के चित्रण का सफल प्रयास किया गया है। इसमें क्षत्रिय वर्ग की किसी महत्त्वपूर्ण बात की चर्चा नहीं की गयी है। ऐसा प्रतीत होता है कि शूद्रक इस विषय में कुछ कहना ठीक नहीं समझता था।

अन्त में यह कहा जा सकता हैं कि मृच्छकटिक में कालिदास की रचनाओं के समान यद्यपि स्वाभाविकता और चमत्कार-जनकता नहीं है और न भवभूति के समान कृत्रिमता । फिर भी इसकी कुछ ऐसी विशेषतायें हैं जिनसे इसको न केवल संस्कृत-साहित्य की अपितु विश्वसाहित्य की उत्कृष्ट कृति मानने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिये ।