भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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७८ मृच्छकटिक

पंचम अंक के वर्षा के वर्णन में । इन दोनों में अभिनय की दृष्टि से त्रुटि रहने पर भी साहित्यिक दृष्टि से विशेषता प्रतीत होती है ।

इतने विशाल रूपक में कुछ त्रुटियाँ स्वाभाविक हैं । उदाहरणार्थ—प्रथम अंक में वसन्तसेना के घर जाने और वापस आने में चारुदत्त को एक क्षण भी नहीं लगता है। वह कहता है 'इदं भवत्या गृहम् ।' द्वितीय अंक में हारा हुआ संवाहक वसन्तसेना के द्वारा ऋणमुक्त करा दिया जाता है। वह भिक्षु बनने की बात करता है । कुछ ही देर में कर्णपूरक की बातों से ज्ञात होता है कि उस भिक्षुको हाथी ने पकड़ लिया था। उसने उसे बचाया। वास्तव में उसे भिक्षुक वेश बनाने के लिये कुछ समय देना आवश्यक था। तृतीय अंक में शर्विलक चोर रेभिल के घर में रहता है। वह चोरी के लिए चारुदत्त के घर में सेंध लगाता है। पास रहते हुए भी उसे चारुदत्त की दरिद्रता का ज्ञान नहीं हो पाता है, यह ठीक नहीं है। चतुर्थ अंक में वसन्तसेना के भवन का अति विस्तृत वर्णन अभिनय की दृष्टि से सर्वथा अयोग्य है। षष्ठ अंक में यह नहीं ज्ञात हो पाता है कि चारुदत्त ने वसन्तसेना को छोड़कर अकेले जीर्णकरण्डक उद्यान में इतने सबेरे जाने का प्रयास क्यों किया । सप्तम अंक में प्रवहण-विपर्यय से शकार की गाड़ी वसन्तसेना को लेकर जीर्ण पुष्पकरण्डक उद्यान के लिये पहले चलती है और बाद में पहुँचती है। दूसरी ओर चारुदत्त की गाड़ी वसन्तसेना के स्थान पर आर्यक को लेकर बाद में चलती है फिर भी पहले पहुँचती है। एक ही उद्यान में चारुदत्त और शकार का रहना भी उचित नहीं प्रतीत होता है। अष्टम अंक में वसन्तसेना की हत्या करके उसका आरोप चारुदत्त पर लगाने के लिये शकार कहता है—"साम्प्रतम् अधिकरणं गत्वा व्यवहारं लेखयामि ।" परन्तु वह उसी दिन मध्याह्न में न जाकर दूसरे दिन प्रातः ( नवम अंक में ) न्यायालय पहुँचता है। नवम अंक में न्यायाधिकारी चारुदत्त को निरपराध समझते हैं और उससे गहनों के विषय में सच कहने को बार-बार प्रेरित करते हैं परन्तु न तो चारुदत्त हीं कुछ बोलता है और न विदूषक । जब हत्या जैसा आरोप सिद्ध हो रहा हो तब दोनों का सही बात न कह पाना उचित नहीं है। दशम अंक में एक ही दिन में अनेक महत्वपूर्ण और समयसापेक्ष घटनाओं का चित्रण भी अभिनय की दृष्टि से अच्छा नहीं कहा जा सकता ।

सम्पूर्ण रूपक में कई अवान्तर कथायें जोड़कर अनावश्यक रूप से कलेवर की वृद्धि की गयी है ।

परन्तु उक्त कुछ सामान्य दोष रहते हुये भी इसका महत्त्व सर्वविदित है । इसके संवाद छोटे-छोटे सरल और प्रभावकारी हैं। भाषा-प्रयोग की दृष्टि से भी