भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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भूमिका ७७

भवन का वर्णन करते समय संगीत के विभिन्न रूपों का भी उल्लेख किया गया है ।

चित्रकला का भी विकास हो चुका था । वसन्तसेना ने स्वयं चारुदत्त का चित्र बनाया था । पत्थर तथा काष्ठ की प्रतिमायें भी बनती थीं । हारा हुआ संवाहक मूर्तिरहित मन्दिर में काष्ठप्रतिमा के समान निश्चलभाव से खड़ा हो जाता है ।

चौर्य कला का खूब विकास था । लोग उसकी शिक्षा लेते थे, गुरु बनाते थे । उनके कुछ सिद्धान्त होते थे । शर्विलक शिक्षित चोर था ।

उपर्युक्त विवेचन का निष्कर्ष यह है कि मृच्छकटिक-कालीन समाज आर्थिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध होता हुआ भी राजनीतिक दृष्टि से अच्छा नहीं था । न्यायव्यवस्था में मनमानापन था । कर्मचारी सन्तुष्ट नहीं थे । सत्ता-परिवर्तन एक सहज कार्य हो चुका था । शासन में अवसरवादिता का बोलवाला था । पद का दुरुपयोग किया जाता था ।

उपसंहार

मृच्छकटिक संस्कृत साहित्य के इने गिने रूपकों में से एक है । लोक-कथानक पर आश्रित होने के कारण इसकी लोकप्रियता प्राचीन काल से है । इसीलिये विभिन्न भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है ।

इसमें तत्कालीन समाज का यथार्थ चित्रण है । इसमें उच्च मध्यमवर्ग के ब्राह्मण युवा को नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो अपनी उदारता से अतिनिर्धन हो चुका है तथापि उसके स्वभाव में कार्पण्य नहीं है । उसके गुणों से प्रभावित होकर आसक्त होने वाली नवयौवना गणिका वसन्तसेना उससे कुलस्त्री के समान व्यवहार करती है । दूसरी ओर उसकी पत्नी भी अपने व्यक्तित्व का अच्छा प्रदर्शन करती है । इसके अतिरिक्त समाज के साधारण वर्ग के लोगों के दैनिक जीवन की सही झलक दिखाई देती है । रूपक में भय, दया, करुणा, प्रेम और हास्य आदि का सुन्दर निरूपण किया गया है । जीवन की अनेक अवस्थाओं का वास्तविक रूप प्रस्तुत करने से इसका महत्त्व और बढ़ गया है । इसमें एक ओर चारुदत्त जैसे आदर्श चरित्र हैं तो दूसरी ओर शकार जैसे निकृष्ट ।

इसकी कथावस्तु की घटनाओं में प्रायः गतिशीलता है । कहीं-कहीं प्रवाह में बाधा भी है; उदाहरणार्थ - चतुर्थ अंक में वसन्तसेना के भवनों के वर्णन में तथा