मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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तत्काल वध करने में चाण्डाल हिचकिचाते थे । (पृ० ६१०) इसी कारण चारुदत्त को शीघ्र नहीं मारा गया था ।
धार्मिक-स्थिति--
तत्कालीन समाज में सामान्यतया लोग धर्म-परिपालन करते थे । वैदिक धर्म का प्रचार था । यज्ञानुष्ठान आदि होते थे । चारुदत्त के पूर्वज यज्ञ करने के कारण प्रसिद्ध थे । वह स्वयं भी हर अवस्था में धर्मपालन करता था । दरिद्र होने पर भी धर्म में उसकी पूरी आस्था थी । वह मृत्युदण्ड पाकर भी अपने धर्माचरण के प्रभाव से सुरक्षित रहने की कल्पना करता था । (१०।३४) वह धर्माचरण को नित्य कर्तव्य मानता था । राजा 'पालक' भी यज्ञादि करता था । उसी में उसका वध भी किया गया था । वसन्तसेना की कोटि की गणिकायें भी देवपूजा स्वयं करती थीं और कभी-कभी ब्राह्मणों से भी पूजा करवातीं थीं । (पृ० १२९) व्रत तथा उपवास का भी खूब प्रचलन था । नटी ने 'अभिरूपपति' व्रत रखा था । चारुदत्त की पत्नी ने 'रत्नषष्ठी' व्रत का पालन किया था ।
वैदिक धर्म के साथ बौद्धधर्म भी प्रचलित था । बौद्धभिक्षु अपने आचरण में पूर्णतया सावधान रहते थे । वे स्त्रियों के सम्पर्क से दूर रहते थे । बौद्ध विहार थे । उनमें कुलपति नियुक्त किये जाते थे । संवाहक बौद्ध भिक्षुक को सभी विहारों का कुलपति नियुक्त किया गया था । (पृ०) परन्तु सामान्यतया उनका दर्शन अमंगलसूचक माना जाता था । "कथम् अनाभ्युदयिकं श्रमणदर्शनम् ?" (पृ० ४२५)
कला और संगीत की स्थिति--
मृच्छकटिक-कालीन समाज में विभिन्न प्रकार की कलाओं का विकास हो चुका था । नाट्यकला अपने समुन्नत रूप में थी । इसी लिये मृच्छकटिक जैसे विशालकाय रूपक को अभिनय करने के लिये लिखा गया । रंगमंच के विषय में लोगों का ज्ञान था । (इयं रङ्गप्रवेशेन कलानां चोपशिक्षया । १।४२)
संगीत का प्रचार-प्रसार खूब था । सूत्रधार स्वयं चिरकाल तक संगीत का अभ्यास करता था । रेभिल जैसे गायक और तन्त्रीवादक को सुनने के लिये चारुदत्त जैसे सम्भ्रान्त व्यक्ति देर रात तक रुके रहते थे । उसके शास्त्रीय ज्ञान को प्रशंसा चारुदत्त ने स्पष्ट शब्दों में की है (३।५) शर्विलक चोर चारुदत्त के घर में घुसकर संगीत शास्त्र के उपकरणों को देखकर उस घर को नाट्याचार्य का घर मानने लगता है । (पृ० २०८) शकार भी अपने को अच्छा गायक समझता है । वह कण्ठ को मधुर बनाने की अनेक विधियाँ बताता है । (८।१३-१४) । वसन्तसेना के