भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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भूमिका

७५.

में नहीं हिचकिचाते थे । दूससे लोग उनसे भय खाते थे । उनकी स्वेच्छाचारिता से सभी आक्रान्त थे । सायंकाल से ही राजमार्ग पर निकलना सुरक्षित और सम्मानजनक नहीं था । धूर्त, विट, चेट आदि शाम से ही राजमार्गों पर घूमने लगते थे ।

लोगों से कर वसूल किया जाता था । (७।१) न्यायव्यवस्था प्रायः मनु के अनुसार होती थी । न्याय निःशुल्क था । न्याय देने में अधिक समय नहीं लगता था । हत्या जैसे घोर अपराध का भी निर्णय एक दिन में हो जाता था । गवाही के लिये कोई औपचारिकता नहीं थीं । न्यायालय में आवश्यकतानुसार किसी को तत्काल बुलाया जा सकता था । प्रतिष्ठित व्यक्ति अपराध के आरोप में बुलाये जाने पर सम्मानजनक रीति से पूछे जाते थे । उन्हें आसन भी दिया जाता था । न्यायाधीश निष्पक्ष न्याय करना चाहते थे किन्तु अपनी विवशताओं के कारण वे वैसा नहीं कर पाने से दुःखी रहते थे । कभी वादी-प्रतिवादी की धूर्तता से और कभी राजा या उसके सम्बन्धी के हस्तक्षेप से गलत निर्णय भी हो जाते थे । प्रायः एक न्यायाधिकारी होता था । श्रेष्ठी और कायस्थ उसकी सहायता करते थे । लोगों के बयान लिखे जाते थे । न्यायाधीशों का स्थानान्तरण भी होता था । अतः कभी कभी अप्रिय निर्णय हो जाते थे । न्यायाधिकारी केवल निर्णय का परामर्श देता था । अन्तिम निर्णय राजा ही करता था । ( अधिकरणिकः—निर्णये वयं प्रमाणं शेषे तु राजा । पृ० ५६४ ) ।

दण्डव्यवस्था मनु के आधार पर होती थी । न्यायाधिकारी के परामर्श का अतिक्रमण करके भी दण्ड दिया जाता था । इसी लिये चारुदत्त को राजा ने अपनी ओर से मृत्युदण्ड दिया था । मृत्युदण्ड प्राप्त व्यक्ति को एक विशेष वेषभूषा में सजाया जाता था । दण्ड देने के पहले उसके कुलगोत्र और नाम का उच्चारण करके उसके अपराध और दण्ड की घोषणा कई बार की जाती थी । ( पृ० ६१६ )

शासन पर राजा की पकड़ बहुत अच्छी नहीं थी । अधिकारी और कर्मचारी केवल आजीविका के लिये नौकरी करते थे । कर्तव्य-पालन की विशेष भावना नहीं थी । राजा से अपमानित होने पर वे उसका विद्रोह करने वालों के सहायक बनते थे । (४।२६) इसी लिये 'आर्यक' बन्धन तुड़ा कर जेल से भागने में सफल हुआ । आगे वीरक और चन्दनक के कलह से वह सुरक्षित बच निकला । कर्मचारियों के असन्तोष का परिणाम राजसत्ता का परिवर्तन तक होता था । इसी लिये यज्ञशाला में वर्तमान तत्कालीन राजा पालक को मारने में आर्यक के समर्थक सफल हो सके । ऐसे परिवर्तन प्रायः हुआ करते थे । इसी लिये मृत्युदण्ड प्राप्त व्यक्ति का