मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ५७
के कारण हुई थी। पहले तो अपने पूर्वकृत्य के कारण यह चारुदत्त के सामने जाने में संकोच करता है किन्तु चारुदत्त की उदारता जानकर उसके सामने पहुँच कर सारे नये समाचार सुनाता है। अपना परिचय तत्काल कराने के लिये चारुदत्त के घर की गयी चोरी का स्मरण कराता है। (पृ० ६३२) चारुदत्त उस घटना को बुरा नहीं मानता है और इसका आलिंगन कर लेता है।
चारुदत्त के प्राणों की रक्षा के साथ साथ उसकी पत्नी की भी पूरी चिन्ता रखता है। उसके अग्निप्रवेश की खबर से यह व्याकुल है (पृ० ६४२) और चारुदत्त से अति शीघ्र वहाँ पहुँचकर पत्नी के प्राणों की रक्षा करने को कहता है और इसमें सफल भी होता है।
यह 'शठे शाठ्यं समाचरेत्' इस सिद्धान्त को मानता है। जब चारुदत्त मृत्युदण्ड से मुक्त हो जाता है तब यह षड्यन्त्रकारी शकार को प्राणदण्ड देने का आग्रह करता है। परन्तु चारुदत्त की सदाशयता के आगे इसको झुकना पड़ता है और शकार को छोड़ दिया जाता है।
उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि शर्विलक के व्यक्तित्व में सद्गुणों और दुर्गुणों का अच्छा सामञ्जस्य है। समय-समय पर इसे अपनी कुलीनता का स्मरण होता रहता है। यह सच्चा मित्र और अन्याय का विरोधी है।
धूता
यह चारुदत्त की विवाहिता पत्नी है। इसके सौन्दर्य आदि की कोई चर्चा नहीं की गयी है। अतः यह सामान्य रूपवाली ही प्रतीत होती है। किन्तु इसमें गुणों की कमी नहीं है। यह अपने पति चारुदत्त के सम्मान, सुख और दुःख की पूरी चिन्ता करती है। (पृ० २२४) इसे अपने पति के चरित्र की दुर्बलता का ज्ञान है कि वह गणिका वसन्तसेना से प्रेम करता है किन्तु इसके कारण यह उससे नाराज नहीं होती है। प्रत्युत वसन्तसेना को समुचित आदर देती है। बसन्तसेना के कारण इसके पति को मृत्युदण्ड मिल रहा है, इस पर भी यह वसन्तसेना के लिये अपशब्द नहीं कहती है। दशम अंक में जब वसन्तसेना चारुदत्त के साथ सामने आती है तब यह प्रसन्न होकर उसका आलिंगन करती है। (पृ० ६४७)
वसन्तसेना के गहने इसके पति के पास धरोहर रखे थे। उनकी चोरी हो गयी। यह समाचार पाकर यह बहुत खिन्न हो जाती है। यह समाज में अपने पति की अप्रतिष्ठा नहीं सहन कर सकती है। वसन्तसेना का मुंह बन्द करने के लिये यह अपने मातृगृह से प्राप्त बहुमूल्य रत्नावली विदूषक को दान में देती है।