भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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भूमिका <span style="float: right;">५३</span>

पेटू है। हर समय खान-पान की चिन्ता करता है। चारुदत्त की सम्पन्नता में यह विविध व्यंजनों का आनन्द लिया करता था। उनकी याद करके दुखी हो जाता है। (पृ० ३६) चतुर्थ अंक में वसन्तसेना का वैभव देखकर आश्चर्यचकित हो जाता है। किन्तु उसके द्वारा किये गये केवल मौखिक सत्कार से सन्तुष्ट नहीं होता है। यह चारुदत्त से शिकायत करता है—"एतावर्त्या ऋद्धया न तयाऽहं भणितः—आर्य मैत्रेय ! विश्रम्यताम्, मल्लकेन पानीयमपि पीत्वा गम्यताम् ।" (पृ० ३०६)

यह भीतर से बड़ा डरपोक है। जब चारुदत्त इसे चौराहे पर बलिसमर्पण के लिये जाने को कहता है तब सायंकाल अकेले जाने में डरता है और इसी लिये इन्कार कर देता है। फिर रदनिका को साथ लेकर जाना स्वीकार करता है। प्रथम अंक में ही जब चारुदत्त वसन्तसेना के साथ जाने के लिये कहता है तब भी यह अस्वीकार कर देता है। (पृ० १३३) जब चारुदत्त चलने लगता है तब यह उसका साथ देता है।

तृतीय अंक में वसन्तसेना के स्वर्णाभूषणों का भाण्ड रखने में यह डरता है किन्तु विवश होकर रखता है।

इसे धर्माचारण में रुचि नहीं है। यह देवी-देवताओं की पूजा आदि में विश्वास नहीं करता है। यह ऐसा मानता है कि इस पूजा पाठ का कोई फल नहीं है। क्योंकि नियमपूर्वक पूजा पाठ करने वाला चारुदत्त क्यों विपत्ति में पड़ जाता है। (पृ० ५२)

यह कभी-कभी बड़ी मूर्खता दिखाता है। जब वसन्तसेना के आगमन के समय विट इसे कुछ प्रश्न देता है तो यह उनका उत्तर नहीं कह पाता है और बार-बार चारुदत्त की सहायता लेता है। (पृ० ३१६) यह मजाकिया स्वभाव का है। प्रथम अंक में जब वसन्तसेना चारुदत्त के घर में अपने प्रवेश के लिए क्षमायाचना करती है, दूसरी ओर उसके साथ दासी के समान व्यवहार करने के कारण चारुदत्त भी क्षमायाचना करता है। इस विचित्र स्थिति में यह विदूषक दोनों के सामने हाथ जोड़कर दोनों से क्षमायाचना का सुन्दर अभिनय करता है। (पृ० १२१)

इसे वेश्यासम्पर्क अच्छा नहीं लगता है। इसी कारण यह चारुदत्त से भी वेश्या का सम्पर्क तोड़ने का आग्रह करता है। (पृ० ३०६) यह वेश्यासम्पर्क को बहुत बड़ा प्रत्यवाय मानता है। इसकी दृष्टि में वेश्यामात्र कुटिल होती है। यह वसन्तसेना को भी एक साधारण वेश्या ही समझता है—"सुष्ठूपलक्षितं दुष्टविलासिन्या।" (पृ० २९६) जब वसन्तसेना के भवन में बन्धुलों [जारजसन्तानों] को बहुत