भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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५४ मृच्छकटिक

सुखी देखता है तब इसके मन में भी लालच आता है किन्तु तत्काल ही यह उसकी निन्दा करने लगता है—

“मा तावद् यद्यप्येष उज्ज्वलः स्निग्धश्च ।
तथापि श्मशानवीथ्यां जात इव चम्पक वृक्षोऽनभिगमनीयो जनस्य ।। (४।२९)

यह कभी-कभी जानकर भी अनजान बनने का प्रयास करता है। जब पंचम अंक में वसन्तसेना चारुदत्त के पास दुर्दिन में अभिसार के लिये आयी है तब यह जानता हुआ भी, उससे आगमन का कारण पूछता है। (पृ० ३५० )

इसको संगीत आदि कलाओं में कोई रुचि नहीं है । रेभिल के सुन्दर गाने की यह आलोचना कर देता है । (पृ० १८४ )

विदूषक के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता है चारुदत्त के साथ अटूट मैत्री । यह अपनी मित्रता की कसौटी पर सदैव खरा रहा है। इसने कभी भी कोई ऐसा व्यवहार नहीं किया है जिससे मित्रता पर कोई दोष लगे । यह चारुदत्त की सम्पन्नता के समय उसके घर पर अनेक प्रकार के व्यंजनों का सुखोपभोग किया करता था किन्तु बाद में चारुदत्त के अतिनिर्धन हो जाने पर भी यह उसका साथ नहीं छोड़ता है। इधर-उधर से अपने भोजन की व्यवस्था करके रात में विश्राम के लिये चारुदत्त के घर पर ही आता है “अथवा मयाऽपि मैत्रेयेण परस्यामन्त्रणकानि समीहितव्यानि ।... गृहपारावत इव आवासनिमित्तमत्रागच्छामि ।” ( पृ० ३६ )

प्रथम अंक में जब सबसे पहले चारुदत्त इसे देखता है तो प्रसन्न होकर कहता है “अये ! सर्वकालमित्रं मैत्रेयः प्राप्तः ।” (पृ० ४१) आगे तृतीय अंक में गहनों की चोरी से यह बहुत दुखी हो जाता है। गहनों के बदले में चारुदत्त की पत्नी धूता जब अपनी रत्नावली चारुदत्त के पास इसके हाथों से भिजवाती है । तब चारुदत्त कहता है—

“विभवानुगता भार्या सुखदुःखसुहृद् भवान् । (३।२८)

दशम अंक में चारुदत्त का मृत्युदण्ड सुनकर उसके द्वारा पुत्र को वापस ले जाने का अनुरोध करने पर यह उससे कहता है —“भो वयस्य ! एवं त्वया ज्ञातं त्वया विनाऽहं प्राणान् धारयिष्यामि ?” ( पृ० ६०७ ) आगे भी यह चारुदत्त के बिना अपना जीवन रखना नहीं चाहता है। यही नहीं, जब चारुदत्त की मृत्यु का समाचार सुनकर उसकी पत्नी अग्नि में प्रवेश करना चाहती है तब भी यह उससे पहले अपने प्राण छोड़ने का अनुरोध करता है—“समीहितसिद्धयै प्रवृत्तेन ब्राह्मणोऽग्रे कर्तव्यः । अतो भवत्या अहमग्रणीर्भवामि ।” ( पृ० ६४४ )

यह चारुदत्त की निर्धनता से बहुत दुखी है। अतः यह उसे सदैव सान्त्वना देता रहता है कि आपकी निर्धनता भी एक प्रकार की शोभा है—"भो वयस्य !