भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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५२ मृच्छकटिक

(पृ० ६०६) अपने षड्यन्त्र में सफल होने से प्रसन्न होता है और अपने सामने ही चारुदत्त का वध देखना चाहता है। “तत् प्रेक्षिष्ये, शत्रुविनाशो नाम मम महान् हृदयस्य परितोषो भवति । श्रुतं च मया, यो हि किल शत्रुं व्यापाद्यमानं पश्यति तस्य अन्यस्मिन् जन्मान्तरे अक्षिरोगो न भवति ।” (पृ० ६०१)

अपने पद के दुरुपयोग में यह कभी नहीं चूकता है। नवम अंक में इसके मुकदमा की सुनवाई के लिये न्यायाधिकारी आनाकानी करते हैं तब यह उनके स्थानान्तरण की धमकी देता है जिससे डर कर वे लोग उसी दिन इसका मुकदमा विचार के लिए ले लेते हैं। इससे यह मन में बहुत प्रसन्न होता है कि अब भयभीत न्यायाधिकारियों से अपनी हर बात मनवा लूंगा । “ही, प्रथमं भणन्ति न दृश्यते, सांप्रतं दृश्यते इति । तन्नामा भीतभीता अधिकरणभोजकाः, यद्यदहं भणिष्यामि तत्तत्प्रत्याययिष्यामि ।” (पृ० ५१४)

यह चारुदत्त का अपमान करने का निश्चय कर चुका है। न्यायालय में उसको दिये गये आसन का विरोध करता है। और उसे आसन से उतरवा कर जमीन पर बैठवा देता है ।

यह बड़ा कायर है । दशम अंक में जब वसन्तसेना आ जाती है। सारी सत्यता प्रकट हो जाती है। लोग शकार को पकड़ने के लिए दौड़ते हैं तब यह भाग जाता है। उसी बीच राजपरिवर्तन हो जाता है। और यह पकड़ लिया जाता है। शर्विलक इसको दण्डित करने के लिये कहता है। वहाँ यह अपनी मूर्खता प्रकट करता हुआ वसन्तसेना से कहता है—“गर्भदासि ! प्रसीद प्रसीद, न पुनर्मार-यिष्यामि ।” (पृ० ६३८) किन्तु अपने को असहाय देखकर यह चारुदत्त की ही शरण में जाना उचित समझता है और तत्काल चारुदत्त की शरण में चला जाता है और अपने प्राणों की रक्षा की प्रार्थना करता है। (पृ० ६३७)

इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि शकार एक दुष्ट, धूर्त, मूर्ख और घमण्डी पात्र है। यह मूर्खता और कुटिलता की मूर्ति है। किन्तु यह अपने इन व्यवहारों से दर्शकों को प्रभावित कर लेता है। आज के खलनायक के दृष्टिकोण से इसका चरित्र उत्कृष्ट कोटि का माना जा सकता है।

विदूषक

मृच्छकटिक में विदूषक का नाम मैत्रेय है। यह निकृष्ट ब्राह्मणकुल का है। द्वितीय अंक में रात में पैर धोने के प्रसंग में यह अपना परिचय देता है—“यथा नागानां मध्ये डडुभस्तथा सर्वब्राह्मणानां मध्येऽहं ब्राह्मणः ।” (पृ० १६१) यह