मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ५१
शूरोऽहम् ।” ( पृ० ७२ ) प्रथम अंक में जब विदूषक से क्षमा मांग कर विट चला जाता है। तब यह भी भय-वश जाने लगता है—“तच्छीत्र-मपक्रमावः ।” ( पृ० १३३ )
अष्टम अंक के प्रारम्भ में यह बौद्ध भिक्षु को पीटता हैं। इससे बौद्ध धर्म में इसकी अनास्था प्रतीत होती है ।
यह सुरीले कण्ठ का गायक नहीं है किन्तु अपने मधुर कण्ठ की खूब प्रशंसा करता है । ( देखिये श्लोक—८।१३-१४ )
इसके मूर्खतापूर्ण आचरण का एक अच्छा उदाहरण अष्टम अंक में है। जब स्थावरक चेट गाड़ी ले आने की सूचना देता है तब यह चहारदीवारी को पार कर ही गाड़ी ले आने की जिद करता है । ( पृ० ४५३ ) इसे गाड़ी टूटने, बैल मरने और स्थावरक के मरने की कोई चिन्ता नहीं होती है ।
जब वसन्तसेना के आने का ज्ञान होता है तो अपनी प्रशंसा करने लगता है—“'भाव, भाव ! मां प्रवरपुरुषं मनुष्यं वासुदेवकम् । ... ... तेन ह्यपूर्वा श्रीः समासादिता । तस्मिन् काले मया रोषिता साम्प्रतं पादयोः पतित्वा प्रसादयामि ।” ( पृ० ४५३ )
किन्तु वसन्तसेना इसकी प्रार्थना नहीं सुनती है और प्रसन्न होने की अपेक्षा इसे पैर से मार देती है। तब यह क्रुद्ध होकर उसको मार डालने की धमकी देता है। पहले तो विट और चेट से मारने के लिये कहता है किन्तु उनके इनकार कर देने पर स्वयं गला दबाकर मार डालता है। विट द्वारा पूछे जाने पर अपने इस पाप कृत्य की प्रशंसा करने लगता है। और इसी सन्दर्भ में स्वयं ले जाकर मृत वसन्त-सेना को दिखाता है। जब इस पाप कर्म को विट पर मढ़ना चाहता है तब विट अपनी तलवार खींच लेता है। जिससे यह डर जाता है और बहाना करने लगता है।
इसको स्वर्ग, नरक की चिन्ता नहीं है। मूर्ख होने पर भी इसने बड़ी चतुराई के साथ वसन्तसेना की हत्या का आरोप चारुदत्त पर लगाने में सफलता प्राप्त की। वसन्तसेना द्वारा की गयी उपेक्षा के कारण इसने उसकी हत्या करने में संकोच नहीं किया। साथ ही, उसके प्रेमी चारुदत्त को भी मृत्युदण्ड दिलवा दिया। इसकी निर्दयता असीम है। जब चारुदत्त को मृत्युदण्ड के लिये ले जाया जा रहा था उस समय में उसका पुत्र रोहसेन विदूषक के साथ वहाँ आया था। यह उस पुत्र के साथ ही चारुदत्त के मृत्युदण्ड का आदेश दे देता है—“सपुत्रमेवैतं मारय ।”