मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० मृच्छकटिक
हा सौजन्यनदि, प्रहासपुलिने, हा मादृशामाश्रये,
हा हा नश्यति मन्मथस्य विपणिः सौभाग्यपण्याकरः ॥ ८।३८
शकार
मृच्छकटिक का चारुदत्त यदि गुणों का निधि है तो शकार अवगुणों की खान । भरत के अनुसार शकार का लक्षण —
उज्ज्वलवस्त्राभरणः कुप्यत्यनिमित्ततः प्रसीदति च ।
अधमो मागधभाषी शकारो बहुबुद्धिमान् ॥
साहित्यदर्पणकार ने जो लक्षण लिखा है वह मृच्छकटिक के शकार को लक्ष्य में रख कर ही किया है—
मदमूर्खताभिमानी दुष्कुलतैश्वर्यसंयुक्तः ।
सोऽयमनूढाभ्राता राज्ञः श्यालः शकार इत्युक्तः ॥ सा० द० ३।५४
मृच्छकटिक के शकार का आचरण देखते ही इसकी नीच कुलोत्पत्ति का ज्ञान हो जाता है। यह राजा पालक की रखैल स्त्री का भाई है। अतः इसे राजा का साला होने का बड़ा घमण्ड है। अपने इस सम्बन्ध का दुरुपयोग करने में यह कभी भी नहीं हिचकिचाता है।
प्रथम अंक में विट इसे ‘काणेलीमातः’ कह कर बुलाता है। विदूषक भी इसी प्रकार ‘काणेलीपुत्र’ ‘कुट्टिनीसुत’ आदि गर्हित शब्दों से ही बुलाता है। यह वसन्तसेना को प्राप्त करने के लिये सभी प्रकार के प्रयास करता है किन्तु विट को यह अच्छा नहीं लगता है। अपने लोगों से घिरी हुई वसन्तसेना को विट सांकेतिक शब्दों में भागने का परामर्श देता है। किन्तु जब वसन्तसेना घिर जाती है तब शकार अपने को ‘वर-पुरुष-मनुष्य वासुदेव’ कहकर आत्मप्रशंसा करता हुआ वसन्तसेना को प्रभावित करना चाहता है।
वास्तव में यह महामूर्ख है परन्तु अपनी बहुज्ञता प्रकट करने के लिये अनेक असंगत पौराणिक बातें कहा करता है। (पृ० ७२, ४९६) इसकी अनर्गल बातों से दर्शकों का मनोरंजन होता है।
यह अत्यन्त डरपोक है किन्तु अपनी बहादुरी की डींग हांकता रहता है। स्त्रियों को मारने में अपनी शूरता मानता है। प्रथम अंक में जब वसन्तसेना अपनी परिचारिकाओं को बुलाती है तो यह मनुष्य का आना समझ कर डर जाता है किन्तु जब स्त्री का आना मालूम पड़ता है तब कहता है—“स्त्रीणां शतं मारयामि ।