भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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भूमिका ४९

(पृ० ३७१) जब रदनिका उसे चारुदत्त का पुत्र बतलाती है तब उसका स्नेह उमड़ पड़ता है। वह हाथ फैलाकर कहती है- "एहि मे पुत्रक! आलिङ्ग।" यह कहकर गोद में उठा लेती है। चारुदत्त के समान सुन्दर रूप देखकर मुग्ध हो जाती है। पूछे जाने पर अपना परिचय देती है "ते पितुर्गुणनिर्जिता दासी।" वहाँ बालक की भोली भाली किन्तु मार्मिक बातें सुनकर उसका हृदय द्रवित हो जाता है। वह अति भावुक होकर बोलती है- "जात! मुग्धेन मुखेनातिकरुणं मन्त्रयसि।" वह तत्काल बालक की इच्छा पूरी करने के लिये अपने सभी गहने उतार कर दे देती है और कहती है- "एषेदानीं ते जननी संवृत्ता। तद्गृहाणैतमलंकारम्, सौवर्ण-शकटिकां कारय।" (पृ० ३७३) यहाँ मिट्टी की गाड़ी के बदले सोने की गाड़ी से खेलने की जिद पूरी करती है। इसी घटनाचक्र पर यह नाटक (प्रकरण) केन्द्रित है।

(६) धर्माचरण में प्रवृत्ति

गणिका होने पर भी वह सामान्यतया नित्य स्नान और देवतार्चन आदि करती है। द्वितीय अंक में जब माता की आज्ञा होती है कि स्नान करके देवताओं की पूजा सम्पन्न करो। तब उद्विग्नचित्त होने से वह कह देती है- "चेटि! विज्ञापय मातरम् अद्य न स्नास्यामि। तद् ब्राह्मण एव पूजां निर्वर्तयतु।" (पृ०१२९)

(१०) उपसंहार

इस प्रकार यह ज्ञात होता है कि मृच्छकटिक में वसन्तसेना एक अनुपम सुन्दरी, नवयौवना गणिका के रूप में चित्रित होने पर भी वह अति उदार, सरल, भावुक, बड़ों का सम्मान करने वाली, छोटों पर स्नेह करने वाली, सभी के सुख, दुःख को समझने वाली, पवित्र प्रेम की उपासिका और कुलीन स्त्री के समान आचरण करने का प्रयास करने वाली है। गणिका होने पर भी उसे धन की लिप्सा नहीं है। उसका व्यवहार सभी को प्रभावित करने वाला है। उसका एक-मात्र दोष है गणिका होना, इसी कारण शकार द्वारा चाही जाने पर भी जब उसे नहीं स्वीकार करती है और वह गला दबाकर मार डालता डालता है तब शोकातुर विट कहता है-

"अन्यस्यामपि जातौ मा वेश्या भूस्त्वं हि सुन्दरि।
चारित्र्यगुणसम्पन्ने जायेथाः विमले कुले ॥८।४३

उसी अवसर पर विट के निम्न वचन भी ध्यान देने योग्य है-

दाक्षिण्योदकवाहिनी विगलिता, याता स्वदेशं रति-
र्हा ह्यलंकृतभूषणे, सुवदने, क्रीडारसोद्भासिनि।

मृ० भू०-४