भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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४८मृच्छकटिक

चारुदत्त के साथ ही प्रेम कहती रहती है। इसी कारण क्रुद्ध होकर शकार उसका गला दबा कर मार डालता है। दशम अंक में जब अपनी हत्या के अपराध में चारुदत्त के मृत्युदण्ड का ज्ञान होता है तब अपनी पूरी शक्ति लगा कर दौड़ती हुई आकर उसे मृत्युदण्ड देने से रोकती है और चारुदत्त के वक्षस्थल पर गिर जाती है। उसके इस प्रबल प्रेम के कारण ही नया राजा बना ‘आर्यक’ उसे चारुदत्त की वधू बना देता है––

“आर्ये वसन्तसेने ! परितुष्टो राजा भवतीं बधूशब्देनानुगृह्णाति ।” (पृ० ६४७)

(७) धूता के प्रति आदरभावना

वसन्तसेना अपनी सामाजिक मर्यादा के प्रति सदैव सावधान रहती है। वह जब सबसे पहले चारुदत्त के घर अचानक पहुँचती है और उन लोगों द्वारा पहचान ली जाती है तब वह अपराध समझकर क्षमायाचना करने लगती है––

“एतेनानुचितभूमिकारोहणेनापराद्धयं शीर्षेण प्रणम्य प्रसादयामि ।” (पृ० १२१)

जब उसके गहनों की चोरी के बदले में चारुदत्त अपनी पत्नी धूता की बहुमूल्य रत्नावली उसके पास भेजता है तब वह उसे स्वीकार तो कर लेती है जिससे चारुदत्त के मन को ठेस न पहुँचे। परन्तु धूता के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए स्वयं वापस लौटाने जाती है और वह उस रात में उसके घर रहती है। प्रातः काल चेटी द्वारा धूता के पास रत्नावली भेजती हुई कहती है––

“चेटि ! गृहाणैतां रत्नावलीं मम भगिन्या आर्यधूतायै गत्वा समर्पय । वक्तव्यं च––‘अहं श्रीचारुदत्तस्य गुणनिर्जिता दासी तदा युष्माकमपि । तदेषा तवैव कण्ठाभरणं भवतु ।’” (पृ० ३६५)

इससे धूता के प्रति उसकी अतिशय सम्मानभावना प्रकट होती है। दशम अंक में अग्निप्रवेश के समय जब वह धूता के पास पहुँचती है और चारुदत्त को जीवित देखकर धूता अपना अग्निदाह रोक देती है, वसन्तसेना को साथ में देखकर कहती है “दिष्ट्या कुशलिनी भगिनी ।” तब वसन्तसेना कहती है “अधुना कुशलिनी संवृत्तास्मि ।” (पृ० ६४७) वह चारुदत्त से प्रगाढ़ प्रेम करती हुई भी धूता के प्रति सदैव सम्मान-भावना और सद्भाव रखती है।

(८) रोहसेन के प्रति वात्सल्य

वसन्तसेना गणिका होने के कारण सन्तानसुख से वंचित है। परन्तु उसके मन में स्त्रीसुलभ मातृत्व विद्यमान है। प्रथम अंक में वह चारुदत्त के पुत्र रोहसेन को जान लेती है। षष्ठ अंक में रदनिका जब गोद में लेकर उसे वसन्तसेना के पास लाती है, तब उसको रोता हुआ देख कर उसके बारे में पूछती है––

“रदनिके ! स्वागतं ते, कस्य पुनरयं दारकः अनलंकृतशरीरोऽपि चन्द्रमुख आनन्दयति माम् ।”