भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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भूमिका ४७

अष्टम अंक में जब गाड़ी बदल जाने के कारण शकार के पास पहुँच जाती है और विट इससे अप्रसन्न होकर कुछ कहता है तो उसके प्रश्नों का उत्तर बड़ी कुशलता से देती है । पंचम अंक में विट ने उसकी कलाभिज्ञता स्पष्ट कही है—

'सकलकलाभिज्ञायाः न किंचिदपि उपदेष्टव्यमस्ति ।' (पृ० ३४२)

(६) चारुदत्त से अटूट प्रेमभावना

कामदेवायतन उद्यान में जब से चारुदत्त को देखा है तभी से वह उस पर आसक्त हो जाती है । वह हर मूल्य पर चारुदत्त को पाना चाहती है । प्रथम अंक से ही शकार की बातों से उसका चारुदत्त के साथ प्रेम-सम्बन्ध ज्ञात हो जाता है । उसके इस प्रेम के लिये जब शकारादि उससे कहते हैं तो वह अपने को गर्वान्वित समझती है । जुआ में हार कर कर्जदार बना हुआ संवाहक जब उसके पास आता है तब वह उसे चारुदत्त का सेवक जानकर बहुत प्रसन्न होती है और स्नेहभाव प्रदर्शित करके सोने के कड़े भिजवा कर उसे ऋणमुक्त करा देती है । वहीं मदनिका से बात करती हुई चारुदत्त के साथ अपने प्रेमसम्बन्ध को प्रकट कर देती है । जब मदनिका चारुदत्त की निर्धनता का संकेत करती है तो वह जवाब देती है--“अत एव काम्यते । दरिद्र-पुरुष-संक्रान्तमनाः खलु गणिका लोकेऽवचनीया भवति ।” (पृ० १३३)

प्रथम अंक में जब चारुदत्त भ्रम से उस पर अपना दुपट्टा डाल देता है और वास्तविकता प्रकट होने पर अपने कृत्य के लिये खेद प्रकट करता है । तब वह अपने मन में इसे अच्छा समझती हुई हर्ष प्रकट करती है । कर्णपूरक को प्राप्त हुआ दुपट्टा जब उसे मिलता है, उसमें चारुदत्त का नाम पड़ती है तो आनन्द से तत्काल ओढ़ लेती है । वह अपने गहने भी इसी लिये चारुदत्त के पास धरोहर रखती है कि उस कारण उसे उससे अधिक मिलने का अवसर प्राप्त होता रहेगा । चारुदत्त द्वारा विदूषक के हाथों भिजवायी गई रत्नमाला वापस देने के लिये स्वयं ही आती है । वह गहनों की चोरी की घटना की सारी बातें कहने के बाद विदूषक के मुख से वर्षा का ज्ञान प्राप्त करके शृंगारभाव प्रकट करती हुई पहले स्वयं ही आलिंगन करती है । यह उसके प्रबल अनुराग का स्पष्ट उदाहरण है । वह प्रेम में गुण को प्रमुख कारण मानती है—“गुणः खल्वनुरागस्य कारणम्, न पुनर्बलात्कारः ।” (पृ० ८०) इसी लिए अति सम्पन्न राजश्यालक द्वारा प्रेषित विपुल धनराशि को ठुकरा कर निर्धन जानते हुए भी चारुदत्त से विशुद्ध प्रेम करती है । गाड़ी बदल जाने से भ्रमवश जब शकार के सामने पहुँच जाती है और बलपूर्वक प्रेम करने को बाध्य की जाती है तब भी वह मृत्यु की चिन्ता नहीं करती है और